ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
परिंदों जैसी कभी थी उड़ान आँखों में
पसर गई है मगर अब थकान आँखों में
मिली निगाह तो सैराब हो गयी आँखें
रहा न प्यास का कोई निशान आँखों में
तुम्हारे हिज्र में बेजान हैं सभी मन्ज़र
तुम्हीं को देख के आती है जान आँखों में
हक़ीक़तों की ज़मीं कब दिखाई देती है
सिमटने लगता है जब आसमान आँखों में
हमारे अश्क़ों की तहरीर पढ़के तो देखो
तवील दर्द की है दास्तान आँखों में
बहकने लगता है इक बार देखने वाला
भला है क्या कोई मय की दुकान आँखों में
सदाएँ देते हैं दीवारो-दर तुम्हें ‘सीमा’
तुम्हारी याद का है इक जहान आँखों में
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ग़ज़ल-
सात तालों में छिपे रहते हैं ज़ेवर मेरे
ज़ख़्म फिर कैसे हुए तुम पे उजागर मेरे
चहचहाती हुई आती है नज़र ये अक्सर
तेरी यादों की चिरैया है शजर पर मेरे
इश्क़ के एक खिलौने पे लड़कपन मचले
रोके संजीदा-सी लड़की जो है अंदर मेरे
शर्म के पर्दे मे रहती है उदासी दुल्हन
क़हक़हों खाँस के आना जो आओ घर मेरे
तिश्नगी अब तो निगाहों में उतर आई है
लब पे सहरा है नज़र में है समन्दर मेरे
मेरी तस्वीर से घर तेरा महक जाएगा
फ्रेम में रखना गुलों को तू सजाकर मेरे
दिल में लौ इश्क़ की धड़कन की बजे हैं घण्टी
जिस्म मन्दिर है तेरे नाम का दिलबर मेरे
चूमता है यूँ ही हर एक नज़र का भंवरा
फूल जैसे हैं ये अशआर भी सुन्दर मेरे
दिल के जज़्बात बयां करते हैं ‘सीमा’ अक्सर
इश्क़ के रंग में डूबे हुए आखर मेरे
– सीमा शर्मा मेरठी




