ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
तुम्हें लगता है वो सचमुच ख़ुदा था
वो जो चुपचाप सब कुछ देखता था
नहीं समझा कभी तुमने उसे भी
हमारा एक ही तो मस’अला था
दबा जो रह गया था मुट्ठियों में
वही इक ख़त तुम्हारे काम का था
ख़ुदा से माँगते कैसे उसे हम
नमाज़ी आँख को वो ही ख़ुदा था
लगे थे एक करने में रुहों को
सो उसका ज़िस्म हम पर हँस पड़ा था
मुबारक हो उसे नमकीन पानी
जो ख़ुद को ही समंदर मानता था
सुना जिसने हुआ त’अज्जुब उसी को
ये कैसा फैसला इक प्यास का था
जवानी, महफिलें या कोई भी शै
बिना उसके मज़ा सब किरकिरा था
कहानी अब खुली कि अब खुली लो
हर इक मंज़र का अपना माजरा था
तुम्हारे आँसुओं ने देर कर दी
हमारा ख़्वाब कब का मर चुका था
भुलाना कौन उसको चाहता है
वो सबसे ख़ूबसूरत हादसा था
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ग़ज़ल-
जो लफ़्ज़ों के मआनी माँगता था
वो मेरी जान यानी माँगता था
मेरे किरदार को मरना पड़ा फिर
वगरना फिर कहानी माँगता था
समन्दर रो पड़ा शर्मिंदगी से
तुम्हारा ख़्वाब पानी माँगता था
बड़ा नादान था हमराह मेरा
मुहब्बत मुँहज़ुबानी माँगता था
मुझे है प्यार उससे, जानता है
मगर सब की बयानी माँगता था
– सरगम अग्रवाल




