ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
तख़य्युल की उड़ानों को अलग अंदाज़ देती हैं
मेरी ग़ज़लें ज़माने को नई परवाज़ देती हैं
हमारी नस्ले-नौ को देखकर सब रश्क करते हैं
ज़मीनें मुल्क की सरहद को जब जाँबाज़ देती हैं
तुम्हारी पुरकशिश आँखें, गुलाबी लब, सियह ज़ुल्फ़ें
तुम्हारी शख़्सियत को मुनफ़रिद अंदाज़ देती हैं
हमारे दिल में आ आकर किसी की बेवफ़ा यादें
हमारी शायरी को एक नया आग़ाज़ देती है
तुम्हारी बेज़बाँ नज़रों ने जादू कर दिया ‘सर्वत’
मेरी ख़मोशियाँ अक्सर तुम्हें आवाज़ देती हैं
*******************************
ग़ज़ल-
गली अच्छी नहीं लगती नगर अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे बिन हमें जानम ये घर अच्छा नहीं लगता
तिजोरी भर तो ली मैंने ज़रा-सी बेईमानी से
मेरी माँ को मगर ऐसा हुनर अच्छा नहीं लगता
न जाने ज़ह्र से क्या घुल गया है इन हवाओं में
कि ये खौफ़े-मुसलसल देखकर अच्छा नहीं लगता
बड़ी मुद्दत से मैं दश्ते-तमन्ना के सफ़र में हूँ
न जाने क्यूँ हक़ीक़त का सफ़र अच्छा नहीं लगता
परेशानी में शामिल हो कोई कब ये गवारा था
हमें ग़म के सफ़र में हमसफ़र अच्छा नहीं लगता
मेरे बच्चों के आने से मिरा बचपन भी लौट आया
मगर माँ के बिना ‘सर्वत’ ये घर अच्छा नहीं लगता
– सर्वत बानो




