ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
इक नए दर्द का आसार हुआ जाता है
बेवफ़ा तुझसे मुझे प्यार हुआ जाता है
मुद्दतें बीत गईं उनको भुला भी न सके
दिल ग़मे-इश़्क का बीमार हुआ जाता है
उनको होती ही नहीं अपने गुनाहों की ख़बर
और ये ज़ुल्म कई बार हुआ जाता है
इक हिकारत-सी लिए आप न देखा कीजे
मौसमे-गुल भी मेरा ख़ार हुआ जाता है
उनकी आदत है ख़फा हो के चले जाने की
मर के जीना मेरा दुश्वार हुआ जाता है
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ग़ज़ल-
हर किसी के हाथ में ही तीर खंजर हो गया
मुल्क में अब नफ़रतों का आम मंज़र हो गया
कल तलक पीते रहे हम ज़िदगी के ग़म सभी
ज़ब्त का दरिया बिखर कर इक समंदर हो गया
आरज़ू, हसरत, तमन्ना, ख़्वाब, ख्वाहिश जुस्तजू
देखते ही देखते ये बाग़, बंजर हो गया
हिज़्र की तन्हाइयाँ कुछ कम न थीं मेरे लिए
याद का काँटा चुभा तो हाल बदतर हो गया
लाख महफिल में निगाहें फेर लीं मुझसे मगर
क्या कहोगे आईना जिस दिन मयस्सर हो गया
इस सियासी दौर ने फ़ितरत बदल की वक़्त की
ठोकरों में है बशर, पूजा में पत्थर हो गया
– प्रमिला तिवारी




