ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
कुछ दरिया अब राह बदलने वाले हैं
ये जज़्बे सागर को खलने वाले हैं
इक दूजे को थामे बैठी हैं पलकें
आँखों से सैलाब निकलने वाले हैं
फिर ज़ख़्मों ने हूक उठाई सीने में
फिर इक दर्द के पंख निकलने वाले हैं
कुछ सपनों ने तोड़ी हैं फिर सीमाएँ
फिर चादर से पाँव निकलने वाले हैं
तुझको छोड़ूँ तो वो ख़ुश हो जायेंगे
जो मेरी किस्मत से जलने वाले हैं
अब तुम आ जाओ तो कोई हर्ज नहीं
अब दिल के आसार सम्भलने वाले हैं
कुछ सैलानी आग सुलगती छोड़ गए
अब मीलों तक जंगल जलने वाले हैं
आँखों में ठहरे हैं कुछ रंगीं मंज़र
सपने अब रंगों में ढलने वाले हैं
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ग़ज़ल-
लगा हुआ है जो इक रोग-सा मिरे जी को
मुझे किसी से मुहब्बत ही हो गयी हो तो
तेरा जहां ऐ समंदर! तुझे मुबारक हो
मुझे तो बूँद ही काफ़ी है सब्ज़ रहने को
वजूद मेरा चटकता है तेरी गर्मी से
मैं बर्फ़ हूँ सो मुझे बूँद-बूँद घुलने दो
हो ना-समझ जो कि रखते हो पैरहन पे नज़र
मैं इस लिबास के अंदर हूँ, मुझको देखो तो
चलो अगर है ज़रूरी तो लौट जाओ शहर
ज़रा-सी जेब में मिट्टी तो गाँव की रख लो
फ़लक़ की राह बनाने की बात करता था
वो एक शख़्स था जाने हुआ है क्या उसको
ये रौशनी से तेरा क्या सलूक है ‘निर्मल’
दिए जला के सितारों से बात करती हो
– निर्मल आर्या




