ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
हद जो है उससे भी गुज़र जाएँ
आ मुहब्बत में ऐसा कर जाएँ
दिल ने माना है जब तुझे अपना
तेरी चाहत में क्यों न मर जाएँ
अपना किरदार है जुदा सबसे
फिर भला क्यों किसी से डर जाएँ
मत मिलें मुझसे आ के वो लेकिन
राह से हँसते ही गुज़र जाएँ
डोर बाँधी है तुमसे साँसों की
हम नहीं ऐसे जो मुकर जाएँ
बा-अदब बैठें आ के महफ़िल में
बे-अदब उट्ठें अपने घर जाएँ
आरज़ू नाज़ की है बस इतनी
वो हँसें और हम सँवर जाएँ
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ग़ज़ल-
दर्दे-दिल को न दिल में दबाया करो
अश्क़ आँखों में हरगिज़ न लाया करो
पास आओ घड़ी भर तो बैठो ज़रा
वक़्त को दूरियों से न ज़ाया करो
बात अपनी कहो या कि मेरी सुनो
ग़ैर की बात से मत जलाया करो
मान जाया करो जब मनाने लगूँ
दूर रहकर मुझे मत सताया करो
कर सको जिसको पूरा ख़ुशी से वही
नाज़ आँखों में सपना सजाया करो
– मीनाक्षी बेदबाक नाज़




