ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
यूँ समझ लीजे हवा की ज़िम्मेदारी काट दी
रोशनी जब इक दिए ने इक दिए की काट दी
इस क़दर था ख़ौफ़ बाहर की हवाओं में कि बस
एक चिड़िया ने क़फ़स में उम्र सारी काट दी
ये उदासी तो हमें है आज भी घेरे हुए
काटने को हमने वो यादों की रस्सी काट दी
पहले मैंने कुछ न समझा ज़िन्दगी के खेल को
और अब इस ज़िन्दगी ने मेरी बारी काट दी
मसअले उठते अगर हम बात का देते जवाब
हमने चुप रहकर ही उसकी होशियारी काट दी
इस क़दर बदले ज़माने के चलन, हम क्या कहें
अब तो यूसुफ़ ने ज़ुलैख़ा की ही ऊँगली काट दी
ज़ख़्म खाये, दर्द झेले, शायरी की और बस
पूछिए मत आपके बिन कैसे काटी, काट दी
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ग़ज़ल-
उदास चेहरा न देख पाये
हम उसको तनहा न देख पाये
हमें पता थी हक़ीक़त उसकी
सो हम तमाशा न देख पाये
हम अपनी नीदों से कट गये थे
सो ख़्वाब पूरा न देख पाये
किसी की दुनिया सँवारने में
हम अपनी दुनिया न देख पाये
तो फिर तमाशा-ए-बंदगी क्यूँ
जब उसको बन्दा न देख पाये
उलझ गए हम समंदरों से
तुम एक दरिया न देख पाये
– मीनाक्षी जिजीविषा




