हायकु
हायकु
घुटने लगा
प्राण वायु का सांस
कटे दरख़्त
नभ की शैया
सो रहा है चंद्रमा
बिछा के रात
जलता रहे
मनवा के आले में
यादों का दीप
बारिश पड़ी
खोल धरा का पट
झांका अंकुर
ढला सूरज
धरा को ओढ़ा गया
स्याह चादर
धर दबोचा
बादल योद्धाओं ने
रवि अकेला
है आश्वस्त
बाँधी अपनी पीर
पीर मजार
धूप के सिक्के
चुरा लेती है रात
दिन सिसके
ऊँचे पहाड़
रोक कब पाये हैं
रवि की गति
निगल जाती
रोज़ आग का गोला
डायन रात
माँ बाप लड़ें
घुन जैसे पिसते
मासूम बच्चे
– डॉ. राजीव गोयल




