कविताएँ
हल से हल तक
बीत गए कई साल
हल करते करते हल की समस्या
सुलझाते सुलझाते न जाने कितने
बाबूओं और नेताओं ने अपनी जेबें भर लीं
मगर फिर भी लटकी है
किसी फंदे से हल की समस्या
भूखे मर रहे हैं वे
जिनके भाई, पिता, पति
झूल रहे हैं किसी पेड़ की डाली पर
नहीं आती दया,
नहीं दुखता किसी का दिल
संसद, टीवी, अखबारों में
गूँजता उनका नाम
महज़ बहाना है
अब नहीं किसी को सरोकार
अब नहीं किसी को दरकार
क्योंकि अब उनके पास हल है
विदेशों से आयात होंगे एक दिन
न केवल अनाज
बल्कि हल और किसान
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उदास हैं
उदास हैं
सड़ते अनाज से भरे गोदाम
उदास हैं
बरसात में बर्बाद खेत खलिहान
उदास हैं
सड़क पर सोते भूखे इंसान
उदास है
इंसानियत
उदास है
उसे बनाने वाला
मगर खुश हैं
वे जमाखोर
क्योंकि आज फिर
उनके घर
बदहज़मी की
दावत होगी
बड़ी-सी टेबल पर
चमकदार तश्तरियाँ सजेंगी
भूखमरी, बीमारी
खिड़की से
चोरी छिपे झाँकेंगी
उम्मीद में
किसी जूठी रोटी के टुकड़े के लिए
कुछ बूढ़ी तो कुछ नन्हीं आँखों में
चमकेंगे तारे
पास में बैठा विदेशी कुत्ता
खाएगा शानदार बोटियाँ
मगर आदम की औलाद
फिर ताकेंगी रोटियाँ
– मनीषा




