कथा-कुसुम
गृहिणी
अनन्या सवेरे 5 बजे ही उठ जाती है। दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो, श्वसुर जी के लिए चाय बनायी। उन्हें छोड़कर किसी को भी बेड टी की आदत नहीं है न! अब बच्चों के टिफिन तैयार करने की बारी। पहले बेटू का टिफिन तैयार किया फिर छुटकू का टिफिन लगाया। बेटू ख़ुद का बेटा; छुटकू से थोड़ा बड़ा, पहले स्कूल जाता है। इसके आधा घण्टे बाद देवरानी का बेटा छुटकू स्कूल जाता है। दोनों को कपड़े पहनाये, उनके स्कूल बेग लगाये। दोनों कर दिए श्वसुर साहब के जिम्मे। दोनों को स्कूल वेन में बैठाने की जिम्मेदारी वही निभाते हैं।
अब जुटती है घर भर के लिए नाश्ता बनाने में रेडीमेड स्नेक्स तले, चाय बनायी और रख आई डायनिंग टेबल पर और ख़ुद घुस गयी बाथरूम में नहाना है जो। जल्दी-जल्दी नहाया। पूजा की। पहुँची डायनिंग टेबल पर; तब तक सास, ससुर, पतिदेव, देवर, देवरानी भी आ पहुँचे थे। सबने एक साथ नाश्ता किया।
डायनिंग टेबल से अनन्या सीधे किचिन में। पतिदेव, देवर और देवरानी का लंच तैयार करना है न! तीनों के लंच बॉक्स लगाये। डायनिंग टेबल पर रखे। फिर खाना बनाकर रखा ही था कि पतिदेव, देवर, देवरानी हाजिर। तीनों ने अपना-अपना खाना परोसा, खाया; लंच बॉक्स लिए और निकल पड़े अपने-अपने ऑफिस के लिए; बाय पापा! बाय ममा!!
इधर अनन्या ने वाशिंग मशीन चालू की। अपने सास, ससुर के, पतिदेव के, बच्चों के कपड़े धोए; सूखने डाले। इधर महरी झाड़ू, पोंछा कर बर्तन साफ कर चुकी थी तो बर्तनों को अपनी जरूरत के मुताबिक रैक में लगाया। सास, ससुर को खाना खिलाया। उन्हें स्वयं परोस कर खाने की आदत नहीं है न!
अब अपने भोजन के लिए समय तो निकालना ही पड़ता है सो खाना खाने बैठ गयी। आचमन ले ही रही थी कि कानों में सास जी का स्वर पड़ता है- “बहू! छुटकू के आने का टैम हो रहा है।”
गेट पर पहुँचते-पहुँचते छुटकू जी की वेन आ जाती है। उन्हें उतारा, अंदर ले जाकर कपड़े बदले। कुछ फल काटकर खाने को दिये।
तीन बजने को हुए तो सास, ससुर को भी फ्रूट सलाद देने बैठक में गयी। इसी बीच वेन की आवाज सुनायी दी। हड़बड़ा कर बाहर निकली, बेटू जी स्वयं वेन से उतर कर उसके पैरों से लिपट गये। अंदर ले जाकर उनके कपड़े बदले और पहले से तैयार फ्रूट-सलाद की प्लेट उन्हें पकड़ा दी।
यह सब करते-करते चार बज चुके थे। इस बेचारी को अब तक कमर सीधी करने की भी फुर्सत नहीं मिली।
“माँ जी! आज शाम के खाने में क्या बनाना ठीक रहेगा?”
“जो तुम्हें ठीक लगे बेटा।”
श्वसुर साहब किसी मित्र से मिलने चले गये थे। अत: अनन्या बैठक में ही सास के पास बैठकर मैथी-भाजी की छँटनी करने लगी। फिर कुछ आलू पील किये। बच्चे पास के ही दीवान पर बैठकर, कभी लेटकर, आड़े-तिरछे होकर अपना होमवर्क कर रहे थे; सो अनन्या बीच-बीच मे उनकी भी मदद करती जा रही थी।
डोरबेल बजी तो उसने मुख्य द्वार खोला। सुदर्शना तीर की तरह भीतर घुसी और बैठक में सोफे पर निढाल होते-होते बोली-
“दीदी, बहुत थक गयी हूँ। एक कप चाय मिल जाये।”
अनन्या दो कप चाय बनाकर लाती है। एक देवरानी और एक सास जी के लिए।
सुदर्शना चाय पीते-पीते- “दफ्तर में बहुत काम रहता है। दिन भर सिर उठाने की भी फुर्सत नहीं मिलती। दीदी, घर पर आपके बहुत मज़े हैं, न अधिक काम की चिंता, न किसी जिम्मेदारी का दबाव; अच्छा हुआ आपने नौकरी नहीं की।”
सास और अनन्या सुदर्शना का मुँह ताक रहे थे।
– डॉ. आर बी भण्डारकर




