ग़ज़ल
ग़ज़ल
तड़प कर ये कहूँ मैं आज माँ से
मुझे देखा करो तुम कहकशाँ से
निगाहें ढ़ूँढ़ती रहती हैं हर सू
बता, ले आऊँ मैं तुझको कहाँ से
बिना तेरे वो घर अब घर नहीं है
सदा आती है तेरी उस मकाँ से
जुदा होकर संभल न पाऊंगी मैं
कलि बोले लिपट कर बागबाँ से
नहीं छोड़ूँगी दामन ज़िंदगी भर
कि बस इक बार आजा उस जहाँ से
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ग़ज़ल
है बिखरी ज़िंदगी कुछ यूँ, मुकद्दर के इशारे पर
हो जैसे रेत का इक घर, समंदर के किनारे पर
हिफाज़त करने वाले ख़ार से गुल हो गया घायल
उसी ने कर दिया रुसवा, मैं थी जिसके सहारे पर
फ़लक चाहत का पाना चाहती थीं हसरतें अपनी
समय ने काट डाले पर, तुम्हारे और हमारे पर
निकल कर कहकशाँ की भीड़ से जो झिलमिलाता है
ज़माने की नज़र टिकती है जाकर, उस सितारे पर
गुज़रते वक़्त की एल्बम गुज़रती है जब आँखों से
ज़िया खुद दिल करे सदके, हर इक दिलकश नज़ारे पर
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ग़ज़ल
ऊँची उड़ान भर सकें वो पर तलाश कर
अपनी हदों को तोड़ दे, अम्बर तलाश कर
दुश्मन के काफ़िले में नहीं मिल सके अगर
तो अपनी आस्तीन में विषधर तलाश कर
दर्द-ए-जिगर को शायरी में ढ़ाल तो ज़रा
खुद में छुपा हुआ कोई शायर तलाश कर
रोटी का कौर देखकर जो मुस्कुरा गया
आँखों में उसकी झाँक, समंदर तलाश कर
तनहाइयों में रोती है, हंसती भी है ज़िया
कहने को हाल-ए-दिल कोई दिलबर तलाश कर
– दीपाली जैन ज़िया




