वो जमाना था, नव विवाहित हम, फौजी पति सूदूर नागालैंड पोस्टेड थे । लगभग छह महीने सगाई से विवाह तक और एक वर्ष शादी के बाद हम लम्बे-लम्बे पत्र लिखते । न मालूम कितने ख़त लिखे थे। वो भी कई-कई पेज के। फौजियों के पोस्ट बॉक्स अलग होते हैं। आर्मी पोस्ट ऑफिस ( APO ) का एड्रेस होता है मतलब कि फौजी की तमाम डाक ए.पी.ओ. के द्वारा आती जाती है और सेंसर भी की जाती है। नतीजन डाक आती थी तो एक साथ सात-आठ चिट्ठियाँ मिलती थी और तारीख़ें भी उलटी- पुलटी। मतलब पहले की तारीख़ पर लिखी बाद में और बाद की तारीख़ वाली पहले मिलती थी। अब उन्हें सिलसिलेवार लगा कर एक अच्छी ख़ासी पोथी बन जाती थी।
आलम यह था कि जब पतिदेव की पीस पोस्टिंग पूना आई। मतलब कि अब हम साथ घर बसा सकते थे, तो जहाँ हम खुश थे वहाँ मेरे जेठ के बेटे ने जो लगभग मेरी ही उम्र का था; फ़िकरा कसा। कहने लगा,
“बेचारे एक पोस्टमैन की नौकरी तो गई !”
पूना में रहते दो बेटियां पैदा हुई और उसके बाद लखनऊ पोस्टिंग। बेटियां अभी तीन व पांच वर्ष की थीं। पति का ट्रांस्फ़र फिर नौन फैमिली स्टेशन यानि फील्ड में हो गया। उस समय मुझे अकेले रहने से बहुत डर लगता था। माँ – बाऊजी ने कहा कि मेरठ आ जाओ । बस फिर क्या था मैं सब सामान ट्रक में लगवा कर मायके चली आई। बेटियों को स्कूल में एडमिशन दिलवा दिया। गर्मी की छुट्टियाँ थी। उन दिनों मेरे दो भतीजे भी आये हुए थे । वे मेरी बेटियों की उम्र के थे।
चारों बच्चे खूब खेलते, धमाचौकड़ी मचाते थे। एक गर्मी की दोपहर में थोड़ी देर नींद लेकर बच्चों की तरफ़ रूख किया। देखा, तो बड़ी मुस्तैदी से वे किसी खेल में मशगूल थे। जम्हाई लेकर मैं वहीं पास में पड़े तख़्त पर आधी लेट गयी। बच्चे बड़े व्यस्त लग रहे थे। अन्दर बाहर भाग रहे थे। सब के कंधों पर थैले लटके थे।
बड़े लाड़ से मैंने अपनी बड़ी पाँच वर्षीय बेटी जो इन सबकी लीडर थी, उसे गोद में लेकर पूछा ,”आज कौन सा खेल खेल रहे हो?
उसने भोलेपन से बताया,
“मम्मा, आज हम पोस्टमैन-पोस्टमैन खेल रहे हैं।”
“अच्छा यह तो बढ़िया खेल है। बताओ कैसे खेल रहे हो।”
“मम्मा, एक बड़े से गत्ते के कार्टन में हमें बहुत सारी चिट्ठियाँ रखी मिलीं, हम उन्हें घर-घर बाँटकर पोस्टमैन- पोस्टमैन खेल रहे हैं।“
मुझे जैसे करेंट लगा। हे भगवान! ये तो वे ही दर्जनों प्रेम -पत्रों का गत्ते का कार्टन था जो उनके हाथ लग गया था।
आस-पड़ोस से हंसीं के ठट्ठे सुनाई पड़े। काटो तो खून नहीं! कानों पे हाथ लगा मैं तो अंदर कमरे में भाग गई। दरवाज़े पर कुंडी भी चढ़ा ली थी!





