भारतीय/हिन्दी सिनेमा के गीतों का एक अलग ही बहुत खास स्थान है जब भावों की व्यापकता और गहराई को महसूस करना और समझना हो और वह भी इस भांति कि अपने से लगतें हों| ऐसी फिल्में जो किसी उत्कृष्ट साहित्यिक रचना के आधार पर निर्मित हुई हो तो वे यथासंभव उसी प्रभाव को उत्पन्न करने का प्रयास करतीं हैं जो उस फिल्म में प्रस्तुत हुआ है| महाश्वेता देवी द्वारा रचित कहानी ‘रुदाली’ के प्लॉट पर निर्मित कल्पना लाजिमी की फिल्म ‘रुदाली’ एक ऐसा ही उदाहरण है| कैसे समझें कि फिल्म में परिवेश आदि में बदलाव के साथ कहानी की रूह इस फिल्म में उतर आई| कुछ समीक्षाओं पर विचार किया| रिसर्च पेपर खंगालने के बाद यह समझ आया कि वहाँ विमर्शों के दायरे और विषम परिस्थितियों के प्रस्तुतीकरण में तुलनाएँ और सिनेमा और साहित्य माध्यमों की मांग के अनुसार बातें रखी गई हैं| सामान्यत: जब भी किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनती है तो उसे इसी तरह से परखा जाता है| परंतु इस आलेख में यह समझने की कोशिश हुई है कि भले ही माध्यम बदल गए हों, उनकी अपनी तकनीकी सीमाएँ हो सकतीं हैं परंतु जब भी कोई कलात्मक कृति निर्मित होती है तो उसके सूक्ष्म तन्तुओं का तान-बाना प्राक्कलपित विषय को प्रभावशाली ढंग से उकेर ही देता है|
इस अध्ययन में प्रस्तुत विभिन्न उत्कृष्ट गीतों की रचना और उनका सिचुएशनल प्रयोग इस फिल्म को समाज के एक ऐसे खंड का एहसास करा पाने में अवश्य सफल होतें हैं जिसे कहानी में भी महसूस किया जा सकता है| इस आलेख का हाइपोथिसिस यह है कि जिस प्रकार कला के क्षेत्र में ‘इम्प्रेशनिज़म’(19वीं सदी में पेरिस में कलाकारों ने इसकी शुरुआत की जिसमें प्राकृतिक जीवन को छोटे-से ब्रश स्ट्रोक के साथ चित्रित करने और प्रकाश और रंग पर ध्यान केंद्रित किया) के दौर में इस तरह से चित्र रचना होती थी जिनमें बहुत गहरे और स्पष्ट आकृतियाँ उकेरे बिना सक्षम भावों को उत्पन्न करने की क्षमता होती थी, उसी प्रकार इस फिल्म के तमाम गीतों की बुनावट को शब्द और संगीत की विशेषताओं के आधार पर समझते हुए महाश्वेता देवी की कहानी के मर्म को महसूसा जा सकता है| जब भावों का विस्तार होता है तब वह किसी एक व्यक्ति, किरदार, लिंग, जाति, स्थान आदि का नहीं रह जाता अपितु उसका रंग फलक के रंग जैसा अनंत हो जाता है और यही एक सफल कलाकृति का निकष होता है| गीत और संगीत के माध्यम से इस फिल्म में यही प्रयास परिलक्षित होता है|
परिकल्पना (Synthesis) : भावों और चित्त की वृत्तियों को समझने के लिए साहित्य के क्षेत्र में प्रभाववाद एक ऐसी शैली है जो किसी घटना या विचार या भाव के संवेदी प्रभावों को व्यक्त करने के लिए अमूर्त चित्रों और दृश्यों को उपस्थित करता है| समाज का वह हिस्सा जो हाशिये पर पड़ा हुआ है, उसकी वास्तविकता के संवेदनशील प्रभावों को फिल्म में प्रसूत गीतों के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास इस अध्ययन में किया जाएगा| विशेष चरित्र (रुदाली) की धारणा के आधार पर समाज के कटु सच को उजागर कैसे करतें हैं इस पर विचार किया गया है|
मुख्य आलेख
जिस प्रकार सृजन की प्रक्रिया विषमताओं के ताने-बाने से पूर्ण होती है उसी प्रकार रचनाकार की लेखकीय मानसिकता की रचना उस सृजन के लिए की जाने वाली वह पहला बीज बिन्दु है जहाँ असीम संभावनाएँ निहीत होतीं हैं| महाश्वेता देवी का रचना संसार उस महान बीज के स्फुरण से लेकर विशाल वटवृक्ष की परिणति में समाया हुआ है जिसकी अनंत दिशाएँ और अनगिनत रश्मियाँ प्रस्फुटित हो रहीं हैं और मानस को प्रभावित कर रहीं हैं| उनका लेखन आंदोलन को गति और दिशा प्रदान करने का सशक्त ज़रिया है| भारतीय समाज में परंपरित रूढ़ियों के खिलाफ इन्होंने अपनी रचनाओं में आवाज़ उठाई है| इन गली सदी परंपराओं मे कारण चलने वाले शोषणतंत्र को मुखर होकर बेनकाब किया है| सदियों से दमित जन और उसमें भी स्त्री के ऊपर हो रहे अत्याचार और अन्याय को बिना किसी लाग लपेट के उघाड़ कर रख दिया है| इनके उपन्यास और कहानी भारत के उस सामाजिक ढांचे को देखा जा सकता है जिसमें वंचित बेसहारा तबका किस प्रकार जीने के लिए संघर्ष कर रहा है और बेबसी में मरने तक को मजबूर है|”[i] उनका ‘भूख’, ‘1084 की माँ’,’चोटी मुंडा और उसका तीर’,’जंगल के दावेदार’, ‘द्रौपदी’, ’पंचकन्या’, रचनाएँ अपने कथ्य और संवेदना के धरातल पर झकझोर देते हैं| यही कारण है कि रचनात्मक संसार की सशक्त विधा सिनेमा का क्षेत्र इनकी रचनाओं से प्रेरित हुआ| इनकी ‘रुदाली’ के आधार कल्पना लाजमी[ii] ने इसी नाम से फिल्म बनाई| गोविंद निहलानी ने ‘हजार चौरासी की मा’ नाम से फिल्म बनाई|
‘रुदाली’ एक फिल्म के रूप में सफल कलाकृति के रूप में सराही गई| सिनेमा की तकनीक का प्रयोग करके महाश्वेता देवी की कहानी की मूल संवेदना को यथासंभव उभारने का सार्थक प्रयास इस फिल्म में हुआ है| रूदाली का शाब्दिक अर्थ है पेशेवर रोने वाली औरत जिसे उच्चवर्गीय स्त्री द्वारा किसी पुरुष रिश्तेदार के मरने पर बुलाया जाता था क्योंकि उनका रोना कुल की मर्यादा के खिलाफ माना जाता था और वे स्वयं अलग थलग घूँघट में रहने को बाध्य होती थीं|”[iii] महाश्वेता देवी की कहानी जो कि वर्ग के संघर्ष में लिंग को भी शामिल करती है और इसे कल्पना लाजमी ने अपनी फिल्म में भी प्रस्तुत लिया है| इस कहानी को उन्होंने भारत की प्रत्येक ऐसी स्त्री की वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत किया जो केवल बंगाल नहीं बल्कि राजस्थान के गाँव में मौजूद है| फिल्म के माध्यम से कथ्य की कालातीतता को समझ जा सकता है| वर्ग और लिंग के अतिरिक्त उत्पीड़न का तीसरा आयाम गरीबी इस फिल्म के प्रभाव को बढ़ा देता है|
फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर और गीत विषय को और भी अधिक संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करतें हैं| यूं भी संगीत और गीत किसी भी विचार या भाव को सौष्ठव बनाने के साथ साथ संप्रेषणीयता को भी बढ़ाते हैं| रुदाली फिल्म के गीत इस दृष्टि से सफल हुए हैं| हिन्दी फिल्मों में गीतों की भूमिका सिचुएशनल होती है जिसे कहानी की प्रभावोत्पादकता बढ़ जाती है| इस कहानी और फिल्म को देखने और पढ़ने के बाद ‘रुदाली’ जैसे शब्द से हम अवगत हुए| इस उपेक्षित समुदाय के विषय में शायद कोई जानता होगा| भारतीय समाज के परिदृश्य में सबाल्टर्न की अवधारणा और उनके उत्पीड़न के गहरे सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों को समझने के लिय ‘रुदाली’ एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है| राजस्थान की भौतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म ‘शनीचरी’ के इर्द-गिर्द घूमती है जो गाँव के सबसे गरीब आबादी से ताल्लुक रखती है| उसके जन्म के तुरंत बाद उसके पिता गुजर जातें हैं और उसकी माँ उस एचहोद देती है| उसकी शादी एक बंधुआ मजदूर से होती है जो उसी गाँव के जमींदार के यहाँ काम करता है| जैसा कि ऐसे परिवेश में होता है, शराबी पति, बीमार सास, छोटा बच्चा और अंत में सभी को खो देना| संघर्ष और जिजीविषा के जितने चित्र संभावित हैं सभी इस फिल्म में देखे जा सकतें हैं|”[iv] यह बताया जा चुका है कि कल्पना लाजमी ने सक्षम निर्देशन में इस कहानी को कालातीत बना दिया| यह संभव होता है बहुत कुछ इस फिल्म में सूझ-बूझ के साथ प्रयुक्त हुए गीतों से, जिनके माध्यम से विषय के ध्वनित पक्षों का विस्तार हुआ| ये संवेदनाएँ अब केवल ‘रुदाली’ की ही नहीं अपितु प्रत्येक ऐसी स्त्री की संवेदना से जुड़ गई जो किसी न किसी प्रकार से वर्ग, लिंग और समाज की पुरुषप्रधान व्यवस्था के कारण जीवन को सार्थक अथों में जीने के लिए जूझ रही है| भावों का यह विस्तार तभी संभव है जब उसका इस प्रकार साधारणीकरण हो जाए कि वह सबके हो जाएँ| उसका प्रभाव उसी प्रकार से पड़े जैसे चित्रकला की तकनीक इम्प्रेशनिज़म के द्वारा उत्पन्न की जाती है| यह मूर्त-अमूर्त के मध्य की स्थिति होती है जहाँ जो खास है और ऐसा है जो होना चाहिए ही संप्रेषित होता है| इस तकनीक में ‘प्रकाश’ अर्थात विषय कैसा दिखे, यह प्रकाश यानि रचनाकार पर निर्भर करता है| दृष्टि सबसे पहले खास चीज को ही देखती है| किसी रचनात्मक कार्य में घटनाओं और दृश्यों के बजाए, पात्रों के मानसिक पक्षों, भावनाओं, संवेदनाओ और अनुभवों पर ज्यादा ध्यान देने की प्रक्रिया इसी तकनीक का अनुसरण करती है| गीतों के माध्यम से ऐसा प्रभाव उत्पन्न हैं जैसे सूर्य का प्रकाश जब किसी प्रिज़म से होकर गुज़रता है तो उसके सभी रंग मुखरित हो जाते हैं|[v] रुदाली कहानी का सार्थक प्रतिफलन इस फिल्म में इन्ही गीतों ने कैसे किया इसका उदाहरण कुछ गीतों के अंश के साथ प्रस्तुत है|
“[vi]दिल हूम हूम करे/ घबराए/ घन धम धम करे/ गरजाए/ इक बूंद कभी पानी की’ मोरी अँखियों से बरसाए/ दिल हूम हूम करे/ घबराए….”
गुलजार द्वारा लिखे इस गीत को संगीत से सजाया भूपेन हज़ारिका ने और कहानी के मर्म को समझ कर किये फिल्मांकन से बहुत कुछ बिना कहे ही समझ दिया गया| एक पेशेवर रोने वाली के पास जब उसके असली दुख की बात होती है तो वह आँसू की बूंद उमड़ते हुए उसके दिल की बेबसी और लाचारगी को बयान कर रही है|
“तेरी झोरी डारूं/सब सूखे पात जो आये। तेरा छूआ लागे/ मेरी सूखी डार हरियाए”[vii]
अपनी पूरी ज़िंदगी दुख झेलने के बाद जब शनीचरी पहली बार अपनी माँ के पेशे की उत्तराधिकारी बनती है तब उसके आँसून सूख गए होतें हैं| लेकिन जब उसे पता चलता है की दूसरे गाँव की पेशेवर रुदाली ‘भीखनी’ उसकी माँ थी जिसने उसे छोड़ दिया था और अब उसकी चेचक से मौत हो गई है तब उसकी खुद की पीड़ा कारुणिक रुदन के साथ व्यक्त होती है जो असली होतें हैं| निचली जाति की एक स्त्री की आकांक्षाएं और पीड़ाएँ सब एक साथ कैसे इन पक्तियों में व्यक्त हो गए हैं जिसका रोना ही उसके जीने का आधार है, वही उसकी आजीविका है और भूपेन हज़ारिका जी के उत्कृष्ट संगीत और आवाज ने जैसे इन भावों को अनंत विस्तार दे दिया हो|
“समय ओ धीरे चलो
बुझ गई राह से छाँव
दूर है दूर है पी का गाँव
धीरे चलो धीरे चलो
जी को बहला लिया
तूने आस निराश का खेल किया
तूने आस निराश का खेल किया
चार दिनों में कोई जिया ना जिया
चार दिनों में कोई जिया ना जिया
ज़हर ये साँस का पिया ना पिया
ज़हर ये साँस का पिया ना पिया
ये हवा सब ले गई
कारवां के निशां भी उड़ा ले गई
कारवां के निशां भी उड़ा ले गई
उड़ती हवाओं वाले मिलेंगे कहाँ
उड़ती हवाओं वाले मिलेंगे कहाँ
कोई बता दो मेरे पिया का निशाँ
कोई बता दो मेरे पिया का निशाँ”[viii]
यह गीत जीवन के कटु सत्य से रूबरू करवाता है| कठोर संघर्ष कभी खत्म ही नहीं हो रहा| जिजीविषा युक्त भाव इस गीत से अनायास ही दिल को कचोट जातें हैं| समय को पकड़ के रखो क्योंकि अभी तो सारी इच्छाएँ बाकी हैं| अगर यही हाथ से छूट गया तो सब कुछ खत्म हो जाएगा| वह प्रेम जो एक स्त्री की पूंजी है उसे वह किसी भी कीमत पर सँजो लेना चाहती है चाहे फिर उसे समय के पहिये को भी क्यों न रोकना पड़े उसकी गति को ही क्यों न थामना पड़े|
कुल मिलाकर इस फिल्म में प्रयुक्त सभी गीत उस कहानी की बात सफल तरीके से करते हैं जो उस संस्कृति की बात करती है जिसमें सार्वजनिक और व्यवसायिक रूप से रोने को रचनात्मक अभ्यास माना जाता है| इनकी गरीबी और सामाजिक उत्पीड़न इतनी अमानवीय स्थित में ले जाता है कि कभी कभी अपने गहरे दुख का प्रदर्शन उच्च जाति के लिए आजीविका के लिए करना पड़ता है| इन सभी स्थितियों को गीतों के भीतर से होकर गुजरने पर सहज रूप में महसूसा जा सकता है| कुल मिलाकर कहानी और फिल्म भले ही विषय के प्रस्तुतीकरण में थोड़े बहुत अलग हैं लेकिन यदि बात मूल कथ्य और संवेदना की जाए तो वह इन गीतों के माध्यम से बखूबी अपना पुख्ता प्रभाव छोड़ते हैं|
[i] महाश्वेता देवी के लिखे उपन्यास और कहानियां | फेमिनिज़म इन इंडिया
[ii] 25 years of Kalpana Lajmi’s Rudaali – Indian Cultural Forum
[iii] Rudaali | Indian Cinema – The University of Iowa
[iv] 25 years of Kalpana Lajmi’s Rudaali – Indian Cultural Forum
[v] Impressionism in Literature – Definitions and Examples
[vi] गीतकार : गुलजार , फिल्म : रूदाली, संगीत : भूपेन हज़ारिका
[vii] ttps://www.smule.com/song/lata-mangeshkar-hindi-dil-hoom-hoom-kare-rudaali-karaoke-lyrics/10154181_10154181/arrangement
[viii] Source: LyricFind, Songwriters: Bhupen Hazarika / Gulzar
Samay O Dhire Chalo lyrics © Sony/ATV Music Publishing LLC
संदर्भित पाठ्य सामग्री:-
- https://indianculturalforum-in.translate.goog/2018/12/26/25-years-of-kalapana-lajmis-rudaali/
- 3-1-55-469.pdf
- Impressionism in Fiction: A Literary Movement – Hesam Moeini
- RUDALI, Mahashweta Devi, Usha Ganguli, translated by Anjum Katyal
- https://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80
- चोली के पीछे (बांग्ला कहानी) : महाश्वेता देवी






