उनके लिए कुछ ऐसा महसूस करती हूँ कि वह अपने साथ सारे धूल -धक्कड़ को साथ लेकर चलती एक नदिया हैं जो जूझती, उफनती, ठहरती, बहती उसको प्रतिबिंबित करने का प्रयास करती रहती हैं और अपने भीतर मीठा पानी रोक लेती हैं। नहीं साथ चलना है उन्हें लेकर अपने साथ उन सभी मृगतृष्णाओं को जो उन्हें रानी की उपाधि से कर दें विभूषित! अपने हाथ-पैर, गले में बांध रत्नजटित घंटियाँ वह मुस्कुराकर झलती रहे पंखा और वह कहे दिन को रात तो वह हिला दे गर्दन अपनी! उसकी हामी में एक नटनी सी ? रानी होने का खिताब नहीं ज़रूरी है उनके लिए। ‘राजा ने कहा ‘रात है’
रचना का व्यंग्य देखें, जिसमें केवल राजा तक ही सीमित न रखकर पूरी बिरादरी को समेट लिया गया है।
सुबह की चाय का पहला घूँट भरते हुए,
राजा ने कहा ‘रात है’
तो ताज्जुब नहीं हुआ था।
राजा तो आखिर राजा है
क्यों नहीं कह सकता है,
दिन को रात
इस रचना में न केवल राजा वरन महामंत्री,सेनापति सभी तो घेरे में लिपटे हैं। उपेक्षाओं के ढोल गले में लटकाकर कवयित्री उन यंत्रणाओं से गुजरती हुई जगमगाती दीवारों की जगह फफूंद और जालों को देखकर चुप्पी नहीं साध पाती। स्तब्ध होती है —
अपने ही कटघरे में खड़ी हूँ।
जीवन की आपाधापी में सब मिलते हैं खड़े एक कतार में,,वह कोई अनोखी नहीं लेकिन वह स्वयं को देखना चाहती हैं अपने आईने में और तभी कह पाती हैं इतनी शिद्दत से ; ‘नकारती हूँ निर्वासन’
मैं कभी समीक्षा का दावा नहीं कर सकती क्योंकि मैं समीक्षक हूँ ही नहीं। हाँ,जब कुछ अक्षर आँखों के द्वार से निकलकर सीधे दिल के गहन,गंभीर समुद्र में डुबकी लगाने लगते हैं, वे उछलते हैं दिल से दिमाग तक और करते हैं बाध्य कुछ सोचने को,कहने को। संभवत: मैं उसे प्रतिक्रिया भर कह सकती हूँ जो देना बन जाती है मजबूरी। स्वयं भी तो झाँकना पड़ता है खुद के आईने में! स्वयं को भी तो साधना पड़ता है। डॉ. प्रभा मुजुमदार मेरे लिए सिर्फ़ गहन रचनाएं लिखने वाली कवयित्री का नाम भर नहीं है। उनकी प्रथम रचना की गवाही मेरे मन के झरोखे में से वर्षों पूर्व से झाँकती है और उनके मूल अस्तित्व की याद दिलाती है।
मुझे इस बात की तसल्ली रही कि प्रभा ने मुझ पर शुरू से ही विश्वास दिखाया है और अपने प्रत्येक संग्रह को ये मेरे पास पहुँचाती रहीं।,जब हम किसी के मूल स्वभाव से परिचित हो जाते हैं तब उसकी बातें हमारे मन में बिना किसी श्रम के पहुँचने लगती हैं। प्रभा की रचनाओं से गुजरते हुए मेरे साथ यह सहजता बनी रही यद्धपि रचनाएं इतनी सरल भी नहीं थीं कि उनकी तह तक बिना चिंतन के पहुँच जा सकता।
प्रभा के जीवन के कुछ अपने नियम हैं जिनसे कंप्रोमाइज़ करना उनके लिए असंभव है। एक शिद्दत से जीवन जीने की उनकी साधना इन रचनाओं को जन्म देती है इसीलिए ये रचनाएँ गहन दृष्टि की मांग करती हैं। इस संग्रह की रचनाओं में उनके अपने परिवेश से जुड़ी सारी बातें संग्रहीत हैं। उनकी संवेदना सरल, सहज शब्दों का चयन करती है जो पाठक को अभिभूत कर देते हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ना नहीं होता, उन सरल शब्दों के भीतर दूर गहराई तक की यात्रा करनी होती है।इस संग्रह में कई रचनाओं के शीर्षक को दो-दो भागों में बाँटकर एक ही भाव को भिन्न आकार देने की सहज प्रस्तुति है।
ज़िद; एक
ज़िद; दो
शब्दों की रोशनी में; एक
शब्दों की रोशनी में; दो
वसंत; एक
वसंत; दो
इसी प्रकार अन्य कई शीर्षक हैं जो एक के बाद दूसरे कथन को जानने की प्रतीक्षा में एक उत्सुकता जागृत करते हैं। सभी रचनाएं दो भागों में विभक्त नहीं हैं, उनके सरोकार सीधे-सीधे टहोके मारते हैं जो प्रभा के लेखन की वास्तविक पहचान है। इस संग्रह में माँ पर भी दो भागों मे विभाजित रचना है, जिनमें माँ ही आधार शिला है किन्तु एक है उनकी भौतिक देह से जुड़ी हुई सहज स्मृति,
छियासी की उम्र में भी
तेज चौकन्ना दिमाग,सौगात है,
गज़ब का आकलन और निरीक्षण
मुझे महसूस होता है आकलन और निरीक्षण वाली यह सौगात प्रभा को माँ से ही सहज रूप से अपने आँचल में आशीर्वाद के रूप में प्राप्त हुई है।
माँ; दो में माँ के नश्वर शरीर की समाप्ति की एक सहज पीड़ा के साथ रक्त के रिश्ते की कसकती स्वाभाविक पीड़ा है;
चिता पर
एक देह ही नहीं जली थी
कितना कुछ
राख हुआ था उसके साथ
धुंधला गए थे
कितने ही प्रतिबिंब ,
आवाज़ें डूब गईं थीं
न मालूम किस दिशा में अपने कार्यकाल में वे कई बार स्थानांतरित हुईं। नए लोग,नए परिवेश,और पुरानों का छूटना टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित होकर रचनाओं के रूप में सिमटा है। इतना करीब से जानने बल्कि पहचानने के बावज़ूद न जाने क्यों मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया था कि इस स्थानांतरण को लेकर भी उनकी संवेदना इतनी गहरी हो सकती है! ‘नकारती हूँ निर्वासन ‘ की रचनाओं के साथ कई बार यात्रा करते हुए मुझे इस बात का एहसास हुआ कि यह भूल थी मेरी! इसका प्रभाव किस प्रकार से उनके संवेदनशील मस्तिष्क पर पड़ा है उसका सहज चित्रण रचनाओं में अनायास ही प्रदर्शित होता है और पाठक स्वयं को उससे रिलेट करने लगता है।
हँसी,कहकहे,शिकायतें,रुलाई
तिलमिलाहट और वेदनाएं —-
समझता-ज़ब्त करता ,
घर का कोना -कोना
कई दिनों से प्रभा के आने घर आने की बात तो हो रही थी। मैंने कहा था गर्मी बहुत है ,आराम से आना और पहले बता देना, हो नहीं पाया ऐसा और अचानक दस तारीख को प्रभा अपनी नव-प्रकाशित पुस्तक के साथ सामने थीं। मुझे पता भी नहीं था कि उस दिन उनका जन्मदिन था। अच्छा लगा उस विशेष दिन उनका उपहार प्राप्त करके! होना तो और कुछ चाहिए था। जब हाथ में पुस्तक आ गई तो पन्ने पलटने से रुका नहीं जा सकता था। प्रभा की रचनाएं पन्ने पलटने से समझ में तो आने वाली थीं नहींसो—एक बार ,दो बार,तीसरी बार उनके साथ यात्रा करने पर लगा कि अब शायद चंद शब्द उकेरे जा सकते हैं। फिर भी इन चिंतनशील रचनाओं में से गुजरने का मोह अभी शेष है। कुछ रचनाएं जानी-पहचानी भी हैं किन्तु कुछ बिल्कुल ही नवीन पोशाक में सुसज्जित हैं।
यही था कभी अपना घर,
अपने लोग,अपना शहर। बस्ती और मोहल्ला, जहाँ परिचय का कोई चिन्ह,
पहचाना कोई चेहरा ढूंढती हूँ मैं आज’रिश्ते’ कविता की अंतिम पंक्तियों की ओर एक दृष्टि —
ज़िंदगी भर
कितनी ही पाठशालाओं के बावजूद
पहेली ही बने रहे
रिश्तों के सूत्र और समीकरण
संग्रह की सभी रचनाएं उनकी लेखनी का गंभीर दस्तावेज़ हैं। शब्द चिंतन को मजबूर तो करते ही है कभी पीड़ित भी करते हैं तो कभी व्यंग्य से मन का द्वार खोलकर भीतर प्रवेश भी कर जाते है।
‘रेवड़ियाँ’ रचना की मरुभूमि की सच्ची सड़क पर चलते हुए कितनी संवेदना के झरोखे खुलते हैं –
आदिम बर्बर कबीले में बदलकर
विवेक को खो देने के बाद ,
प्रतिशोध के सैलाब में
सोच और विचार के बुर्ज
ढहने के बाद ,
रेवड़ियाँ —ही तो हैं
जो अनुगृहीत कर
हमें बाँटी जा रही हैं,
हमारी ही लूटी संपदा से।
ढेरों ढेर असहाय परिस्थितियों से गुजरते हुए भी जिजीविषा झाँकती है गुजरने के उपरांत भी उम्मीदों के दीपों से भर देती हैं—
जीतने के लिए जरूरी नहीं होती
जीत।
और यहीं आरंभ होती है
इतिहास के निर्णायक मोड़ तक ,
पहुँचने की संभावना।
उभर आते हैं
उम्मीदों के असंख्य द्वीप।
आग,राख और धुआँ —
गीली लकड़ी की आँच
सुलगने के क्रम में,
आँखों में देती है जलन,
घुटन और कसैलापन,
जलने और बुझने के बीच
इम्तिहान ले डालती है।
फिर भी उसका सुलगना,
आश्वस्ति है
किसी हांडी में
चावल पकने की।
बिम्ब,प्रतिबिंबों से सहज सरल सजी रचनाएं आह्वान करती हैं। एक विश्वास भरी चुनौती भी है कि
मौसमों की इतनी बदहवास छेड़छाड़ों के बाद भी जीवन है ,
श्वासें हैं और गति है जो हमें ले चलती है कदम दर कदम!
प्रभा के स्वर में सदा एक हुंकार है। वह विचलित हुए बिना एक लंबी दूरी माप जाती हैं। गंभीर पाठक की पहली पसंद प्रभा की गहवन रचनाएँ हो सकती हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
बोधि प्रकाशन से प्रकाशित सुंदर मुखपृष्ठ से सुसज्जित यह काव्य संग्रह पाठक को जबरन अपनी ओर आकर्षित करता है।
कवयित्री प्रभा मुजुमदार को ढेरों स्नेहिल बधाइयाँ । साहित्य-जगत में इन सारगर्भित रचनाओं का स्वागत तो होना ही है। प्रतीक्षा है बस चिंतनशील पाठकों के हाथों में पहुँचने की।
पुस्तक: नकारती हूँ निर्वासन
विधा: कविता संग्रह
कवयित्री: डॉ. प्रभा मजमूदार
प्रकाशन: बोधि प्रकाशन
मूल्य: रु. 275/-





