कुछ शहर केवल नक्शे पर नहीं बसते, वे मनुष्य की कल्पनाओं में बसते हैं। कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिन्हें देखने की इच्छा वर्षों तक मन के किसी कोने में दबी पड़ी रहती है और फिर एक दिन अचानक नियति उस इच्छा को वास्तविकता में बदल देती है। मेरे लिए कलकत्ता ऐसा ही एक शहर था।
बचपन से ही जब भी इतिहास, ईस्ट इंडिया कंपनी, बंगाल नवजागरण, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस या फिर सत्यजीत राय का नाम पढ़ता था, तब मेरे मन में एक शहर धीरे-धीरे आकार लेता था- कलकत्ता। यह वही शहर था जहाँ आधुनिक भारत की अनेक अवधारणाओं ने जन्म लिया था। यह वही शहर था जहाँ सबसे पहले मैट्रो का उद्भव हुआ। यह वही शहर था जहाँ अंग्रेजी शासन की प्रशासनिक नींव रखी गई, जहाँ भारतीय राष्ट्रवाद ने अपने आरंभिक स्वर प्राप्त किए, जहाँ साहित्य और विचार ने नए आयाम ग्रहण किए और जहाँ से आधुनिक भारत के बौद्धिक पुनर्जागरण की सबसे प्रबल धारा प्रवाहित हुई।
मैं अक्सर कल्पना करता था कि यदि कभी जीवन में अवसर मिला तो इस शहर को अवश्य देखूँगा। परंतु यह कभी नहीं सोचा था कि यह सपना एक साहित्यिक सम्मान के बहाने पूरा होगा। अप्रैल का महीना था। राजस्थान की तपती धूप धीरे-धीरे अपने तेवर दिखाने लगी थी। उसी समय मुझे सूचना मिली कि मेरे एक लेख के लिए मुझे कलकत्ता में सम्मानित किया जाएगा। यह समाचार मेरे लिए दोहरी प्रसन्नता लेकर आया। एक ओर साहित्यिक उपलब्धि का संतोष था, तो दूसरी ओर बचपन के स्वप्न को साकार करने का अवसर।
15 अप्रैल की सुबह मैं जयपुर से 6ई 207 विमान संख्या द्वारा रवाना हुआ। विमान के बादलों को चीरते हुए आगे बढ़ने के साथ ही मन भी स्मृतियों और कल्पनाओं की उड़ान भरने लगा। खिड़की से बाहर दिखाई देने वाले सफेद बादल मुझे किसी महाकाव्य के दृश्य जैसे लग रहे थे। करीब दो घंटे बाद जब मैं बंगाल की धरती पर उतरा तो पहली अनुभूति यही हुई कि मैं केवल एक राज्य में नहीं बल्कि भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रदेशों में से एक में प्रवेश कर रहा हूँ। हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही कलकत्ता ने अपने विशिष्ट स्वरूप से मेरा स्वागत किया। यहाँ की हवा में समुद्री आर्द्रता थी। लोगों की बातचीत में बांग्ला की मधुरता थी। सड़कें आम महानगर की तरह व्यस्त थीं किन्तु उनमें दिल्ली और मुंबई जैसी आक्रामक बेचैनी कम नजर आ रही थी।
मेरे ठहरने की व्यवस्था हिंदू कॉलेज के ऐतिहासिक छात्रावास में हुई थी। यह व्यवस्था मेरे जेएनयू के दिनों के वरिष्ठ मित्र बृजेश भैया की सहायता से संभव हो सकी। जब मैं छात्रावास पहुँचा तो सामान्यतः यह केवल रहने का स्थान होना चाहिए था परंतु मेरे लिए यह किसी ऐतिहासिक धरोहर से कम नहीं था। आज जिस संस्था को प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, उसका इतिहास भारतीय आधुनिकता के इतिहास से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में हिंदू कॉलेज जो अब हिंदूहॉस्टल के नाम से जाना जाता है, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय का ही हिस्सा है। आज से 209 वर्ष पूर्व 20 जनवरी 1817 में स्थापित हुए एशिया के सबसे प्राचीन शिक्षण संस्थान हिंदू कॉलेज केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं बल्कि वह भारत के बौद्धिक पुनर्जागरण का जन्मस्थल रहा है। यहीं से वह विचारधारा विकसित हुई जिसने भारतीय समाज को मध्यकालीन जड़ताओं से निकालकर आधुनिकता की ओर अग्रसर किया।
छात्रावास के पुराने गलियारों में चलते हुए मैं बार-बार उन विभूतियों को याद कर रहा था जिन्होंने इस संस्था को विश्वव्यापी प्रतिष्ठा दिलाई। गोया कि राजा राममोहन राय, हेनरी विवियन डेरोजियो, माइकल मधुसूदन दत्त, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, जगदीश चंद्र बोस, प्रफुल्ल चंद्र रे, राजेन्द्र प्रसाद, मेघनाद साहा, सत्येन्द्र नाथ बोस, अमर्त्य सेन, अभिजीत बनर्जी। आदि इन नामों को पढ़ना और इनसे जुड़े स्थानों पर खड़ा होना दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं। पुस्तक में इतिहास एक तथ्य होता है किन्तु वास्तविक स्थान पर वही इतिहास एक जीवित अनुभूति बन जाता है। रात को छात्रावास के गलियारे में खड़ा मैं लंबे समय तक परिसर को निहारता रहा। मन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था आखिर ऐसा क्या था जिसने बंगाल को भारत के नवजागरण का केंद्र बनाया?
शायद इसका उत्तर शिक्षा में छिपा हुआ था।
उन्नीसवीं शताब्दी का बंगाल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था; वह विचारों की प्रयोगशाला था। राजा राममोहन राय से लेकर ईश्वरचंद्र विद्यासागर और रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक एक पूरी परंपरा थी जिसने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया। किन्तु विडंबना यह है कि जिस बंगाल ने कभी आधुनिक भारत को शिक्षा का मार्ग दिखाया था, वही बंगाल आज शिक्षा संबंधी अनेक चुनौतियों से जूझता दिखाई देता है। अगले दिन जब मैं शहर में घूमने निकला तो यह विरोधाभास बार-बार मेरे सामने आया। एक ओर महान शैक्षिक विरासत थी, दूसरी ओर अनेक सरकारी विद्यालय और महाविद्यालय संसाधनों तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की समस्याओं से संघर्ष करते दिखाई देते युवा।
एक शोधार्थी होने के नाते मैं कलकत्ता को केवल पर्यटक की दृष्टि से नहीं देख रहा था। मैं हर दृश्य के पीछे छिपे सामाजिक और ऐतिहासिक अर्थों को भी समझने का प्रयास कर रहा था। मेरी पहली मंजिल थी-विक्टोरिया मेमोरियल। जब पहली बार उसकी संगमरमरी आकृति मेरी आँखों के सामने उभरी तो मैं कुछ क्षणों के लिए ठिठक गया। सफेद संगमरमर से निर्मित यह विशाल भवन यूरोपीय महल जैसा आज भी है। उसके विशालकाय खम्बे, गुम्बद, कलात्मक स्तंभ, विस्तृत उद्यान और स्थापत्य की भव्यता देखकर सहज ही समझ में आता है कि अंग्रेज इसे अपनी साम्राज्यिक शक्ति के प्रतीक के रूप में क्यों निर्मित करना चाहते थे। परंतु इस इमारत के सामने खड़े होकर मेरे भीतर एक गहरा द्वंद्व भी जन्म ले रहा था। एक ओर स्थापत्य कला के प्रति प्रशंसा थी तो दूसरी ओर औपनिवेशिक इतिहास की पीड़ा।
मैं सोचने लगा कि सभ्यताएँ कितनी जटिल होती हैं। अंग्रेज भारत आए व्यापारी बनकर। फिर धीरे-धीरे उन्होंने सत्ता पर अधिकार किया, शोषण भी किया और आधुनिक संस्थाओं की कुछ नींव भी रखीं। रेल, डाक, प्रशासनिक संरचना और अनेक भव्य इमारतें दीं लेकिन उसी के साथ उन्होंने आर्थिक और राजनीतिक दासता भी दी। विक्टोरिया मेमोरियल के सामने खड़ा मैं इतिहास के इसी विरोधाभास को महसूस कर रहा था।
एक क्षण के लिए मन में विचार आया कि यदि अंग्रेज भारत से गए ही न होते तो शायद यह देश आज और अधिक विकसित होता पर अगले ही क्षण मंगल पांडे, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियाँ सामने आ खड़ी हुईं। तब लगा कि विकास की कोई भी कीमत स्वतंत्रता नहीं हो सकती। यदि किसी राष्ट्र के पास भव्य इमारतें हों लेकिन स्वतंत्रता न हो, तो वह विकास नहीं बल्कि सुनहरा पिंजरा है। विक्टोरिया मेमोरियल से निकलकर मैं हावड़ा ब्रिज की ओर बढ़ा। हुगली नदी पर फैला यह पुल मेरे लिए केवल एक इंजीनियरिंग संरचना नहीं था। बल्कि यह आधुनिक भारत के निर्माण का प्रतीक था। पुल पर खड़े होकर नीचे बहती नदी को देखना किसी चलचित्र जैसा अनुभव था। घाटों पर स्नान करते लोग, नदी में तैरती नावें, मंदिरों की घंटियाँ, दूर दिखाई देते पुराने भवन और हजारों लोगों की निरंतर आवाजाही-सब मिलकर एक जीवंत दृश्य रच रहे थे।
हुगली की धारा को देखते हुए मुझे बार-बार माँ गंगा की दीर्घ यात्रा का स्मरण हो रहा था। हिमालय से निकलकर हजारों किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद यही नदी आगे चलकर गंगासागर में समुद्र से मिलती है। शायद मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हम सब अपनी-अपनी यात्राएँ करते हैं। कुछ स्मृतियाँ साथ लेकर चलते हैं। कुछ सपने अधूरे छोड़ जाते हैं और अंततः किसी विराट अस्तित्व में विलीन हो जाते हैं। हावड़ा ब्रिज पर खड़े होकर मेरे भीतर यह दार्शनिक विचार बार-बार उठ रहे थे।
शाम तक मैं शहर के अनेक हिस्सों में घूमता रहा। सड़क किनारे चाय की दुकानों पर बैठकर लोगों को देखता रहा। बांग्ला भाषा के मधुर स्वर सुनता रहा। कभी-कभी ऐसा लगता था जैसे मैं किसी शहर में नहीं बल्कि एक लंबे उपन्यास के भीतर चल रहा हूँ। कलकत्ता का सबसे बड़ा आकर्षण शायद यही है कि वह केवल दिखाई नहीं देता बल्कि पढ़ा भी जा सकता है। यह शहर अपने भवनों, गलियों, पुस्तकालयों, कॉलेजों और घाटों के माध्यम से लगातार आपसे संवाद करता रहता है।
उस रात जब मैं पुनः छात्रावास लौटा तो मुझे अनुभव हुआ कि मेरी यात्रा तो अभी आरंभ ही हुई है। अभी कालीघाट की आध्यात्मिकता शेष थी। दक्षिणेश्वर की ऊर्जा शेष थी। साइंस सिटी का आधुनिक विज्ञान शेष था। गंगासागर का मिथकीय वैभव शेष था। मंगल पांडे की स्मृतियाँ शेष थीं। और सबसे बढ़कर स्वयं अपने भीतर चल रहा वह संवाद शेष था जो किसी भी यात्रा का वास्तविक उद्देश्य होता है।
यात्रा का वास्तविक अर्थ केवल स्थान परिवर्तन नहीं होता। यदि ऐसा होता तो संसार का प्रत्येक पर्यटक एक सफल यात्री कहलाता। किन्तु यात्रा तभी सार्थक होती है जब वह मनुष्य के भीतर भी कोई हलचल उत्पन्न करे, जब वह केवल आँखों से नहीं बल्कि चेतना से देखी जाए। कलकत्ता में बिताए गए वे कुछ दिन मेरे लिए इसी प्रकार के अनुभवों से भरे हुए थे। विक्टोरिया मेमोरियल और हावड़ा ब्रिज के दर्शन के पश्चात मेरे मन में जिस स्थान को देखने की सर्वाधिक उत्कंठा थी, वह था काली घाट मंदिर। भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में इस स्थान का महत्व केवल एक मंदिर होने के कारण नहीं है बल्कि इसलिए भी है कि यही वह भूमि है जहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के महान संत रामकृष्ण परमहंस ने अपनी साधना के माध्यम से भारतीय अध्यात्म को नया आयाम प्रदान किया था।
करीब 10-12 बजे के बीच जब मैं दक्षिणेश्वर काली पहुँचा, तब सूर्य की किरणें तीव्र होने लगी थीं। मंदिर के शिखर दूर से ही दिखाई देने लगे थे। जैसे-जैसे मैं परिसर के निकट पहुँचता गया, वातावरण में अचानक एक अलग ही आध्यात्मिकता का स्तर जाग्रत हो चुका था और श्रद्धालुओं की आस्था घुलती चली गई।
मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक विचित्र शांति का अनुभव हुआ। यह वही स्थान था जहाँ रामकृष्ण परमहंस ने माँ काली को साक्षात् अनुभूत किया था। और कहते हैं माँ काली उनके हाथों से भोजन किया करती थीं। यही वह भूमि थी जहाँ से स्वामी विवेकानंद जैसे विश्वविख्यात संन्यासी की आध्यात्मिक यात्रा ने निर्णायक दिशा प्राप्त की। मैं लंबे समय तक मंदिर परिसर में बैठा रहा। एक शोधार्थी होने के कारण मेरे मन में इतिहास के प्रश्न भी उठते रहे और एक आध्यात्मिक व्यक्ति होने के कारण भावनाएँ भी उमड़ती रहीं। मुझे लगा कि भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक या राजनीतिक क्षमता में नहीं बल्कि उसकी आध्यात्मिक परंपरा में भी निहित है। यही वह भूमि है जहाँ ज्ञान और भक्ति, दर्शन और साधना, तर्क और अनुभव साथ-साथ चलते हैं।
दक्षिणेश्वर से लौटते समय हुगली नदी के तट पर खड़े होकर मैंने कुछ समय बिताया। नदी का प्रवाह शांत था, पर उसके भीतर सदियों का इतिहास बह रहा था। इन्हीं जलधाराओं ने कभी अंग्रेजी जहाजों का स्वागत किया था। इन्हीं धाराओं ने व्यापार को जन्म दिया, उपनिवेशवाद को देखा और स्वतंत्रता आंदोलन की अनगिनत घटनाओं की साक्षी बनीं। इसके पश्चात मेरी यात्रा का अगला पड़ाव था कालीघाट शक्तिपीठ। भारतीय शक्ति परंपरा में कालीघाट का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि यहाँ माता सती के दाहिने पैर की अंगुली गिरी थी। मंदिर में प्रवेश करते समय भीड़ अत्यधिक थी किन्तु श्रद्धा का प्रवाह उससे भी अधिक था। भक्तों के चेहरे पर विश्वास और समर्पण स्पष्ट दिखाई देता था।
मंदिर के आसपास का क्षेत्र मुझे एक विरोधाभास की तरह लगा। एक ओर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र, दूसरी ओर अव्यवस्था और स्वच्छता संबंधी चुनौतियाँ। मुझे लगा कि भारत में विरासत संरक्षण और धार्मिक प्रबंधन पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। श्रद्धा और सुव्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हो सकते हैं। यात्रा के दौरान मुझे अनेक स्थानीय लोगों से बातचीत करने का अवसर मिला। इन्हीं अनुभवों में एक अनुभव ऐसा भी था जिसने मुझे गहरे स्तर पर सोचने के लिए विवश किया।
ओला और उबर जैसी सेवाओं का उपयोग करते समय कई बार चालकों द्वारा निर्धारित किराए से अतिरिक्त राशि की माँग की गई। प्रारंभ में मुझे यह सामान्य असुविधा लगी परंतु अगली बार एक चालक से इस विषय पर चर्चा करते-करते बातचीत राजनीति तक पहुँचाई और फिर धर्म तक। जो संवाद सामान्य बातचीत के रूप में आरंभ हुआ था, वह धीरे-धीरे कटुता की ओर बढ़ने लगा। चालक की भाषा और विचारों में ऐसी तीव्रता थी जिसने मुझे असहज कर दिया। मैं अपने धर्म और अपनी मान्यताओं के प्रति सम्मान रखने वाला व्यक्ति हूँ, इसलिए कुछ बातों पर स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया भी हुई। किन्तु शीघ्र ही मुझे यह अहसास हो गया कि मैं एक अपरिचित शहर में हूँ, जहाँ न तो कोई मुझे जानता है और न ही किसी अनावश्यक विवाद का कोई सकारात्मक परिणाम निकलने वाला है।
उस क्षण मैंने मौन को वाणी से अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण पाया। मैंने उसकी बातों का प्रतिवाद करना छोड़ दिया और परिस्थिति को शांतिपूर्वक समाप्त होने दिया। बाद में जब इस घटना पर विचार किया तो लगा कि आज के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता शायद यही है कि हम असहमति के साथ भी संवाद करना सीखें। लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है; वह मतभेदों के बीच सह-अस्तित्व की कला भी है।
कलकत्ता में रहते हुए मैंने कई ऐसी बातें सुनीं जो बाद में तथ्य-जाँच करने पर पूर्णतः सही नहीं निकलीं। कालीघाट मंदिर और तारकेश्वर मंदिर के प्रशासन को लेकर भी कुछ दावे सुनने को मिले। जब मैंने लौटकर उनके बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की तो ज्ञात हुआ कि अनेक बातें आधी-अधूरी या भ्रामक थीं। इस अनुभव ने मुझे पुनः स्मरण कराया कि सूचना के युग में विवेक सबसे बड़ा साधन है। लिहाजा वे दावे अपुष्ट ही कहे जा सकते थे।
मेरी यात्रा का एक अत्यंत रोचक पड़ाव था साइंस सिटी और तारामंडल। साइंस सिटी में प्रवेश करते ही ऐसा लगा जैसे आधुनिक विज्ञान को जनसाधारण की भाषा में समझाने का एक विराट प्रयास मेरे सामने उपस्थित हो। विज्ञान की जटिल अवधारणाएँ वहाँ रोचक प्रयोगों और प्रदर्शनों के माध्यम से प्रस्तुत की गई थीं। विज्ञान और जिज्ञासा का ऐसा लोकतांत्रिक रूप भारतीय समाज में वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
तारामंडल का अनुभव तो और भी अद्भुत था। जब अंधकारमय गुंबद के भीतर बैठकर मैंने तारों, ग्रहों और आकाशगंगाओं की यात्रा देखी, तब कुछ क्षणों के लिए पृथ्वी की सारी सीमाएँ समाप्त होती प्रतीत हुईं। ब्रह्मांड की विराटता के सामने मनुष्य का अहंकार कितना छोटा है, यह अनुभव वहाँ बार-बार होता है। इसके बाद मदर्स वैक्स म्यूज़ियम और इको पार्क की यात्रा हुई। वैक्स म्यूज़ियम में इतिहास, राजनीति, साहित्य, खेल और सिनेमा की अनेक विभूतियाँ मोम की प्रतिमाओं के रूप में उपस्थित थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो समय स्वयं स्थिर होकर हमारे सामने खड़ा हो गया हो।
किन्तु यदि इस यात्रा का कोई सबसे गहरा और आध्यात्मिक पड़ाव था, तो वह निस्संदेह गंगासागर था। गंगासागर की यात्रा केवल पर्यटन नहीं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में प्रवेश करने जैसी अनुभूति है। कहते भी हैं कि- सभी तीर्थ बार-बार गंगा सागर एक बार। सागर द्वीप पर स्थित कपिल मुनि का आश्रम भारतीय पुराणों, दर्शन और आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु के अवतार कपिल मुनि का आश्रम था। महर्षि कर्दम और माता देवहूति के पुत्र कपिल मुनि ने यहीं अपनी माता को सांख्य योग का उपदेश दिया था। भारतीय दर्शन के इतिहास में सांख्य दर्शन का महत्व अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि यह संसार की संरचना और चेतना के संबंध में अत्यंत व्यवस्थित दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत करता है।
यही वह स्थान माना जाता है जहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्र अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की खोज करते हुए पहुँचे थे। घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम के समीप मिला और उन्होंने मुनि पर चोरी का आरोप लगा दिया। उनके इस अपराध से क्रोधित होकर कपिल मुनि ने अपने तपोबल से उन्हें भस्म कर दिया। बाद में राजा अंशुमान और फिर उनके वंशज महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार का उपाय खोजा। दीर्घ तपस्या के पश्चात भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल हुए। गंगा के जल से सगर पुत्रों की आत्माओं को मुक्ति प्राप्त हुई।
जब मैं उस स्थान पर खड़ा था जहाँ आज गंगा और बंगाल की खाड़ी का मिलन होता है, तब पुराण और भूगोल एकाकार होते प्रतीत हुए। समुद्र की लहरें बार-बार तट से टकरा रही थीं और दूर क्षितिज पर जल तथा आकाश का भेद समाप्त होता दिखाई दे रहा था। उस क्षण मुझे लगा कि भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह मिथक को केवल कहानी नहीं मानती; वह उसे सांस्कृतिक स्मृति में रूपांतरित कर देती है।
यात्रा के दौरान मैंने बंगाल के वर्तमान को भी समझने का प्रयास किया। यह वही भूमि है जिसने भारतीय नवजागरण को जन्म दिया था। यही वह प्रदेश है जिसने ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, जगदीश चंद्र बोस, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सत्येन्द्र नाथ बोस, सुभाषचंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व दिए। किंतु आज का बंगाल अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट की चर्चाएँ बार-बार सुनने को मिलीं। अनेक स्थानों पर शिक्षकों की कमी, सीमित संसाधन और युवाओं का बड़े पैमाने पर पलायन चिंता का विषय है। साथ ही कुछ धर्म विशेष के विस्तारवाद की राजनीति और पड़ोसी देश बंगलादेश से लगातार लोगों का घुसपैठिया बनकर भारत आना और यहीं बस जाना। साथ ही मुझे बार-बार यह प्रश्न परेशान करता रहा कि जिस भूमि ने कभी भारत को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान किया था, वह आज अपने युवाओं को पर्याप्त अवसर क्यों नहीं दे पा रही?
शायद इतिहास का सम्मान आवश्यक है किन्तु केवल इतिहास पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विवेकानंद और बंकिमचंद्र की स्मृतियाँ अमूल्य हैं परंतु किसी समाज की वास्तविक जीवंतता इस बात से निर्धारित होती है कि वह अपने वर्तमान में कितनी नई प्रतिभाओं को जन्म दे रहा है।
कलकत्ता में रहते हुए एक और कसक मन में रह गई। मैं ट्राम में यात्रा करना चाहता था। दुनिया के सबसे पुराने सार्वजनिक परिवहन तंत्रों में से एक इस विरासत को निकट से अनुभव करने की इच्छा थी। किन्तु समयाभाव के कारण यह संभव न हो सका। लेकिन हाथ गाड़ी में बैठने का अवसर नहीं छोड़ सका। बंगाल की धरती पर आज भी बरसों पुरानी हाथ गाड़ी जब चलती है तो प्राचीन बंगाल जीवंत हो उठता है। इसी प्रकार सोनागाछी को समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखने की जिज्ञासा भी अधूरी रह गई। उसके निकट स्थित रवीन्द्रनाथ ठाकुर से जुड़े स्थलों को भी नहीं देख सका। यात्राओं में कुछ अधूरापन शायद आवश्यक होता है क्योंकि वही हमें पुनः लौटने का निमंत्रण देता है।
17 अप्रैल को सम्मान समारोह सम्पन्न हुआ। मंच पर सम्मान ग्रहण करते समय मेरे मन में केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का भाव नहीं था। मुझे लग रहा था कि साहित्य वास्तव में मनुष्यों और संस्कृतियों को जोड़ने का माध्यम है। राजस्थान से आया एक शोधार्थी बंगाल की धरती पर सम्मानित हो रहा था-यह भारतीय सांस्कृतिक एकता का सुंदर उदाहरण था। यात्रा के अंतिम चरण में मैं बैरकपुर पहुँचा, जहाँ से 1857 की क्रांति का बिगुल बजा था। इस स्थान पर मंगल पांडे की स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं। यद्यपि सुरक्षा कारणों से कुछ स्थानों तक पहुँचना संभव नहीं था, फिर भी उस भूमि को देखकर मन भावुक हो उठा। मैं देर तक उस जगह को मौन देखता रहा। इतिहास की पुस्तक में पढ़ा गया मंगल पांडे उस क्षण मेरे सामने एक जीवित मनुष्य की तरह उपस्थित था- एक ऐसा युवक जिसने अपने समय की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति को चुनौती देने का साहस किया था। लेकिन जो भूमि 1857 की क्रांति का उद्घोष बनी अफ़सोस की वो भूमि आज भी पूरी तरह उपेक्षा का शिकार नजर आती है। जहाँ कोई राजकीय लाइब्रेरी अथवा संग्रहालय तक नहीं है जहाँ उस क्रांति का इतिहास दर्शया जा सकता हो। अफ़सोस की यह भूमि उपेक्षा का शिकार है जहाँ ऐतिहासिक और आधुनिक संस्कृति का स्वरूप भी एक साथ मौजूद नजर नहीं आता। यहाँ बैरकपुर की व्यवस्था राजनीति, सांस्कृतिक दृष्टि से भी धूमिल नजर आती है।
कलकत्ता से विदा लेते समय मेरे मन में अनेक भाव एक साथ उपस्थित थे- आनंद, कृतज्ञता, जिज्ञासा, आशा और कुछ अधूरी इच्छाओं का हल्का-सा दुःख। रात गहराने लगी थी। स्टेशन पर यात्रियों की भीड़ थी। मेरी अगली यात्रा पुरी जगन्नाथ की ओर थी। ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी और कलकत्ता की रोशनियाँ पीछे छूटने लगीं। किन्तु वास्तव में वे पीछे नहीं छूटीं। वे मेरे भीतर बस चुकी थीं। आज भी जब उस यात्रा को स्मरण करता हूँ, तब विक्टोरिया मेमोरियल का संगमरमर, हावड़ा ब्रिज का इस्पात, दक्षिणेश्वर की घंटियाँ, कालीघाट की आस्था, गंगासागर की लहरें, हिंदू कॉलेज के ऐतिहासिक गलियारे, मंगल पांडे की स्मृतियाँ और हुगली की शाश्वत धारा एक साथ मेरे भीतर जीवित हो उठती हैं।
कलकत्ता मेरे लिए अब केवल एक महानगर नहीं रहा; वह भारतीय इतिहास से संवाद, सांस्कृतिक चेतना से साक्षात्कार और स्वयं से मिलने की एक अविस्मरणीय यात्रा बन गया।







