उर्दू व्यंग्य
मूल रचना – नादिर खां सरगिरोह
अनुवाद – अखतर अली
याद कीजिये अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की पत्रकार वार्ता और इराकी पत्रकार का चलाया गया जूता | उसके बाद तो साहित्य में जूता लहर चल पड़ी थी | हर लिखने वाला जूतों पर ही लिख रहा था | हालांकि कुछ विचारको का मानना था कि बेगैरत राजनीतिज्ञों पर पड़ने के बाद जूते इस लायक रहे ही नहीं कि उन पर लिखा जाये | लेकिन मैंने जब देखा कि बुश को पड़ने के बाद लिखने वालो में जूते को लेकर जूतम पैजार मची हुई है तो मेरे भी पेट में जूते दौड़ने लगे | यह जो पत्रकार वार्ता में जूता चला था वह कोई पहली बार नहीं चला था इसके पहले भी नेताओ की शान में जूते चार चाँद लगा चुके थे लेकिन बुश पर हुई जूताबारी को मीडिया वालो ने ईराक पर हुई बमबारी से भी ज़्यादा उछाला |
इराकी पत्रकारिता में यह पहली बार देखा गया कि किसी पत्रकार ने जूतों से खबर ली | उस पत्रकार ने सत्ताधारी राष्ट्रपति पर जूता उछाल कर बोलने और सुनने वालो के बीच , ज़ुल्म करने और सहने वालों के बीच , हिंसा और शांति के बीच मसला उछाल दिया | इसके बाद तो लोगो ने जूतों को हाथो हाथ ले लिया | हालत ये हो गई थी कि जूतों के पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे | हर लिखने वाला जूतों के पीछे हाथ धो कर पड़ गया था | हर लिखने वाला कागज़ पर जूते चला कर इतना खुश हो रहा था मानो बुश पर उसी ने जूता चलाया हो उनकी ख़ुशी ईराकी पत्रकार से भी ज़्यादा प्रगट हो रही थी | वह तो वहां जूता चला कर अपने चमड़े के जूते से और जिस्म की चमड़ी से हाथ धो बैठा और यहां व्यंग्यकार और शायर जूते पर लिख कर वाह वाही बटोर रहे थे और अपनी खाल में में फूले नहीं समा रहे थे |
बात उस पत्रकार वार्ता की निकली तो मैंने अपने बाल सखा पुरजोश पुरी से कहा – अगर उस पत्रकार की जगह वहां मैं अपने जूतों में होता तो मिलिट्री शू में होता जिसमें नीचे लोहे की बनी घोड़े की नाल लगी होती | मेरी बात को काटते हुए पुरजोश पुरी ने कहा – इतना वज़नी जूता तुम उठा ही नहीं पाते तो उस शख्स पर फेकते ही कैसे जो दुनियां को अपने जूते की नोक पर रखता है | उन्होंने कहा उसकी जगह मैं होता तो अपने उद्धेश्य की पूर्ति के लिये बोरी भर कर जूते ले गया होता और उन्हें दोनों हाथो से राष्ट्रपति पर लुटा देता और समस्त तानाशाहों को जता देता कि हम जूते बेच कर नहीं सोये है |
आदमी की हैसियत का अंदाज़ा जूतों से होता है वो चाहे पैर में हो या सर पर | कहते है किसी की औकात देखना है तो उसके जूते देखो और किसी को औकात दिखाना हो तो उसे जूता दिखाओ | जूता देखने और दिखाने से एक बात और याद आई कि जूतों की अहमियत का अंदाज़ा दूल्हे को शादी के दिन भी होता है | जब वह बारात लेकर ससुराल पहुचता है तब कोई उसका चेहरा और शेरवानी नहीं देखता है सब की नज़र उसके जूते पर होती है यही वह समय होता है जब आदमी को अपने और जूते की औकात का अंतर समझ में आता है | दूल्हे के दोस्तों को भी दोस्त से ज़्यादा उसके जूतों की फ़िक्र होती है शायद वे सोचते होगे दोस्त तो हाथ से निकल ही गया अब जूते भी न निकल जाये |
पत्रकार वार्ता में जूता फेकने की बात जब मैंने अपने परिचित एक विचारक को बताई तो उन्होंने कहा – दुनियां को उसका जूता मारना दिखा | लोगो ने उसके हाथ से बने दृश्य को तो देखा लेकिन उसकी आंख में बसे दृश्य को कोई देख नहीं पाया | अपने घरों में बैठ कर कोई बेघर हुए इराकियों को नहीं देख पा रहा है , कई बरस से फिलीस्तीनी लोग इजराइली सैनिको और टैकरों पर पत्थर फेक रहे है पर क्या इस नरसंहार को जूते और पत्थर से रोका जा सकेगा ? क्या इससे इस खून खराबे वाली समस्या का हल निकल सकेगा ? हमें उस पत्रकार के हाथ से चले जूते को ही नहीं देखना होगा हमें उन दृश्यों को देखना होगा जिसके चलते वह जूता मारने को मजबूर हुआ | फौजियों के जूते से अपनों के सर को ठोकर मारने वाले दृश्य , जलते मकान में भाई की लाश ढूंढती बहन की कल्पना करनी होगी , मर चुके बच्चे को हिला हिला कर जगाती माँ का ध्यान करना होगा , आबरू की तार तार हुई पोशाक का ख्याल करना होगा | ज़ुल्म तो बस ज़ुल्म होता है भले वह किसी के द्धारा किसी पर भी हो अगर हम उसके ख़िलाफ़ खड़े नहीं होगे तो जूता फेकना तो दूर अपने बाल नोचने लायक भी नहीं रहेगे |
( व्यंग्य संग्रह ब अदब ब मुहावरा होशियार से साभार )







