वह एक महत्वाकांक्षी नौजवान था। खूबसूरत भविष्य का सपना देखने का उसे भी हक़ था। सोचता था एक दिन चाचा जी के जैसे बहुत सारा धन कमाऊँगा और बड़ी कम्पनी में सीईओ बन कर परिवार को ख़ूब ऐश करवाऊँगा। पढ़ने के लिए अमेरिकी यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया था। यूनिवर्सिटी का नाम प्रसिद्ध था। वहाँ से पढ़ने वाले छात्र पढ़ाई पूरी होने से पहले बड़ी-बड़ी प्राईवेट कम्पनियों द्वारा पके आम से लपक लिए जाते थे। संदीप भी उन्हीं मेधावी छात्रों में एक था। अभी फ़ाइनल ईयर में आया था कि विश्व प्रसिद्ध बैंक में उसे जॉब ऑफर मिल गया। अल्पा भी साथ पढ़ती थी। वो मुम्बई से आई थी सहज में दोनो एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए और दोनों की दोस्ती छन गई। अब वो उसकी गर्ल फ्रैंड थी। अल्पा संदीप से अधिक मेधावी थी। संदीप से अधिक पे पैकेज माही को मिला तो संदीप के पौरुष को दंश लगा। उसे पीड़ा हुई मानो किसी विषैले बिच्छू में डंक मार दिया हो। वो हड़बड़ा गया, व्यग्र रहने लगा। फ़ाइनल एग्ज़ाम में अल्पा से अच्छा परिणाम लाने की धुन में दिन रात पढ़ाई में जुट गया। नींद न आए अतः ड्रग्स ले लेता था। सोने में व्यर्थ समय ख़राब होता है। वह सोता ही नहीं था। रात दिन एक कर दिया और नतीजन अल्पा से बाज़ी मार ले गया। उससे अच्छे नम्बर आए बल्कि पूरे बैज में हाईएस्ट स्कोर किया, यूनिवर्सिटी का रिकॉर्ड तोड़ दिया। बस फिर क्या था नौकरी उसके पीछे-पीछे। उसने बड़ी प्राइवेट कम्पनी में बढ़िया तनख़्वाह पर काम स्वीकार कर लिया। यहाँ तक कि अल्पा को भी तब तक नहीं बताया जब तक उसने नौकरी के काग़ज़ साईन नहीं कर दिए।
अल्पा को भी अच्छी नौकरी मिल गई थी पर उसकी तनख़्वाह संदीप से काफ़ी कम थी। वो अपनी विजय पताका फहरा रहा था। नौजवान के सपने पूरे होने लगे थे। वो एक मध्य परिवार का लड़का था, उसकी दो छोटी बहनें थी- नलिनी और निहारिका। माँ बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थी। पति के रुआब का सूरज उनके चेहरे पर किरणें फेंक कर उन्हें चमकाता था।
उसके माता-पिता ने बहुत बड़ी पार्टी दी और मित्रों-रिश्तेदारों को अभिमानपूर्वक संदीप की सफलता बताई। बेटे की सफलता को वे ख़ूब चटखारे ले लेकर सबके सामने शेखी बघारने लगे। एक से एक रिश्ते आने शुरु हो गए। हमारे यहाँ तो योग्य वर मिलना, वो भी फ़ौरेन कंट्री में, बस सब तरफ़ अफ़रातफ़री मच गई। संदीप के पिता भी बढ़िया रिश्ता कैच करने को लालायित थे। वे भी अपना ब्लेंक चैक भुनाने के सपने देख रहे थे और जब संदीप ने अल्पा के बारे में बताया तो उनके सिर पर गाज गिरी और तो और अल्पा के पिता नहीं थे। माँ व दो बहने व एक उसका लाड़ला भाई मुम्बई में एक बेडरूम के फ़्लैट में रहते थे।
जब संदीप से विवाह की बात आई तो अल्पा की माँ को पता चला कि लड़के वाले बढ़िया शादी चाहते हैं। तब अल्पा ने साफ़ मना कर दिया, ”कोई दहेज-वहेज नही।” उसने संदीप से भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि तुम्हारे पिता दहेज माँग रहे हैं तो मैं तुम से शादी नहीं कर सकती। संदीप न तो अल्पा को चुप करा पा रहा था न अपने पेरेंट्स को।
संदीप की सफलता के गुणगान ने गोयल दम्पति को विचलित कर दिया। उनका नवीन, संदीप से दो वर्ष छोटा था था। वो भी बडा होनहार लड़का था। जब देखो तब मिस्टर विजय गोयल अपने बेटे के सामने संदीप की तारीफ़ करते रहते। उसे प्रेरित करने के लिए उसे और मेहनत करने के लिए उकसाते रहते। मिस्टर विजय गोयल इंजीनियर थे पर बहुत अधिक कुछ नहीं कर पाए थे। सरकारी नौकरी की थी पर उनकी आँखें प्राइवेट नौकरी के पे पैकेज को देख- देख चुंधिया जाती थी। नवीन को विदेशी डिग्री के लिए विदेश भेजना उसे संदीप जैसा बल्कि उससे बैटर बनाना, उससे सफल बनाना उनका ध्येय बन गया था। नवीन ने भी जी तोड़ मेहनत की। अमेरिका गया। अमेरिका की टॉप यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला। खर्चा बहुत था। गोयल साहब का इकलौता बेटा था। अपनी जमा पूँजी और बैंक से एजुकेशन लोन ले लिया। नवीन ने कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी। अपना लक्ष्य संदीप को सामने रख ख़ूब पढ़ाई की और जब उसे संदीप समान बढ़िया पे पैकेज मिल गया तो गोयल दम्पति ने दिल्ली में बड़ी पार्टी दी। सब नाते रिश्तेदारों के बीच नवीन की सफलता और पे पैकेज का बखान किया।
नवीन के चाचा का बेटा आर्यन जो नवीन से चार साल छोटा था, उसने नवीन को अपना मैंटर बना लिया। आर्यन ने नवीन व संदीप के जैसे सफल बनने की धुन सवार हो गई थी। हालाँकि आर्यन के माता-पिता की महत्वाकांक्षा बहुत अधिक नहीं थी। वे अपने बेटे को अक्सर नेक सलाह देते। योग करें, स्पोर्ट्स में भाग ले, सेहतमंद खाना खाए और एक अच्छा व्यक्ति बने। आर्यन की मॉ कालेज में पढ़ाती थी और पिता का अपना व्यवसाय था। उससे तीन साल छोटी बहन थी, आरना।
आर्यन ने संदीप व नवीन को अपना आईडियल मान लिया था। उनसे गाईडैंस लेता, उनके बताएँ विषय कोचिंग और नोट्स से लेकर, उसने भी अमेरिका का फार्म भर दिया। उसकी माँ अपने बेटे को विदेश भेजना नहीं चाहती थी और समझाती रहती कि कम ही सही नौकरी तो भारत में भी अच्छी मिल जायगी पर आर्यन को संदीप व नवीन जैसे सफल बनना था या यूँ कहिए कि अमेरिका, यूके में नौकरी करना डॉलरों व पाउंड, यूरो की ओर उसमें चुम्बकीय आकर्षण आ गया था। जब तक उसने अपने देश के मध्य परिवारों को देखा था और एक-डेढ़ लाख की डिजिट उसे बहुत लगती थी। ”कौन बनेगा करोड़पति” में जब अमिताभ बड़े ज़ोर से हाथ ऊपर उठाकर कहते ”एक करोड़!” तो वो उन्हें डॉलर में कन्वर्ट करता था। सोचता बाहर जाकर काम करूँगा तो मैं भी करोड़पति बन जाऊँगा। डॉलर में कमाई करना प्राइवेट कम्पनी की रैट रेस में वो भी घुस गया। जब भी नवीन भारत आता वो सारा सारा दिन उससे बातें करता रहता।
उसे नहीं पता था कि महत्वकांक्षा रूपी अजगर किस तरह युवक-युवतियों को निगल रहा है। पैसों की चकाचौंध ने इन्हें अंधा बना दिया था। दिन में सोलह सत्रह घंटे काम करना, जिस रेस में वे भाग रहे थे वो रेस उन्हें भँवर में गोल-गोल घुमा रही थी। वे रसातल की ओर बढ़ रहे थे। नतीजा वही हुआ जो होना था, पहले संदीप डूबा, फिर नवीन और फिर आर्यन भी डूब ही जाता यदि उसके मित्र ने उसे संभाल न लिया होता। आर्यन ने विवेक से काम लिया। उसने पढ़ाई अवश्य बाहर जाकर की पर तरह-तरह की स्कॉलरशिप ढूँढ निकाली। लगभग चार वर्ष उसने विदेश में पढ़ाई की और भारत आकर विदेशी कम्पनी में काम करने लगा। उसकी तनख़्वाह डॉलर मे आती थी और बहुत से शेयर भी मिलते थे। कहने का मतलब आर्यन का स्टेटस सबसे अच्छा था। बैंगलोर में रहता था और साथ में उसके पेरैंटस भी रहने लगे थे। आर्यन के पिता मध्यवर्गीय थे। उनका स्वभाव तीखा था, भाषा भी कटुता लिए थी। पंजाबी परिवार विस्थापित परिवारों ने जो बुरा समय देखा था. उसने उनके अंदर तल्ख़ी भर दी थी।
संदीप और नवीन की शादी हो चुकी थी। संदीप ने अल्पा से शादी नहीं की और नवीन ने माँ-बाप के बताए रिश्ते को स्वीकार कर लिया। प्रिया बहुत पैसे वाले घर की थी और उसके पिता व्यापारी थे। रिश्ते में भी कभी घाटे का सौदा नहीं करते थे।
नवीन ने अपनी चार साल साथ रहने वालीं अमेरिकन गर्लफ्रैंड को जब डिच किया तो उसकी बड़ी बदनामी भी हुई। नतीजन विवाह के बाद वो जापान चला गया।
दोस्तों ने उससे दोस्ती छोड़ दी। जैनी एक होनहार लड़की थी, उसका दिल टूट गया। वो नवीन से प्यार करती थी और दोनों लिव-इन में थे। हमारे भारतीय लड़के अमेरिकन को हल्के में ले लेते हैं। उन्हें लगता है, भावनायें जज़्बात और दिल विदेशियों में नहीं होते। वे सोचते हैं कि विदेशियों की आँखों में आँसू नहीं आते। आते भी हैं तो उनकी गोरी चमड़ी पर बहते दिखते नही।
नवीन ने जैनी को बिना बताए भारत आकर प्रिया से शादी कर ली जिसका पता जैनी को दो दिन बाद मिला। तब उसे नर्वस ब्रेक डाउन और डिप्रेशन हो गया। वो दिन-रात उद्विग्न रहती थी। नौकरी मिल गई थी, ऑफिस जाती और अकेले कमरे में अपने को बंद करके रोती रहती। नवीन शादी के बाद अमेरिका गया नहीं। तमाम बैचमेट्स ने उससे नाता तोड़ लिया था। इतने पुराने मित्रों से नाता टूट जाने से नवीन खिन्न रहने लगा। पैसा बहुत कमा रहा था। एक काम के सिलसिले में जब वो अमेरिका गया तो उसके सहपाठियों ने उसे बहुत बुरा भला कहा। जैनी के मानसिक संतुलन का सारा दोष उसके सिर मढ़ दिया। वो भी ग़ुस्से में बकता रहा और देर रात तक ड्रिंक कर के होटल वापिस पहुँचा। जब शीशे के सामने खड़ा हुआ तो उसको अपना साया पहचान नहीं आया। और पूरी रात शराब पी सुबह के तीन बजे फ़र्श पर लुढ़क गया। मीटिंग में नहीं पहुँच पाया। उस दिन बहुत बड़ा कॉन्ट्रैक्ट होने वाला था। नवीन को सब कुछ करना था। चार-पाँच देशों के डायरेक्टर आये थे। नवीन की हालत बहुत ख़राब थी। उस दिन तो तबीयत ख़राब हो गई है, कहने के काम चल गया पर उसके बॉस के माथे पर बल पड़ गये थे।प्राईवेट कम्पनी में यह सब नहीं चलता। परफॉरमेंस नहीं तो बाहर का दरवाज़ा उन्हें लीलने को खुला रहता है। एक अनिश्चितता की परछाई उनका पीछा करती रहती है।
काम के पीछे पागल ये सब भागे जा रहे, जैसे भी हो बस पैसा, व्यापार, कॉन्टैक्ट, कॉन्ट्रैक्ट, मीटिंग टार्गेट की चक्रवाती हवाओं की चपेट में गोल-गोल धूम रहे हैं। कभी गोल्फ़ की सफ़ेद बॉल के पीछे मैदानों में, कभी बार में, जब देखो तब पब में वाईन, व्हिस्की, शैम्पेन, वोडका व बीयर की बारिश में। उनकी नसों में खून नहीं शराब बहने लगती है। बड़ी-बडी कम्पनी के सीईओ न तो सुन सकते और देख सकते थे।
आर्यन भारत में अच्छी-खासी प्राईवेट कम्पनी में नौकरी कर रहा था। माँ-पिता साथ रहते थे। सब कुछ अच्छा था पर उसकी पत्नी की अपने सास-ससुर से पटरी नहीं खाती थी और आर्यन था पूरा श्रवण कुमार, अपनी पत्नी को भी बहुत प्यार करता था और पेरैंटस को भी। वो समझ नहीं पाता था कि आख़िर दोनों को एक दूसरे से प्रॉब्लम क्या है। वो काम में बेहद बिजी रहता। उसे भी महीने के पंद्रह दिन हवाई जहाज़ में काटने होते थे। परफ़ॉर्मेंस और बस रिज़ल्ट दिखाना, कम्पनी की बैलेंस शीट उनके प्राणवायु थी। और पिछले दिनों माँ का स्वर्गवास हो गया। उनके कोई बच्चा नहीं था। आर्यन की पत्नी अग्रिमा के गर्भाशय में प्रॉब्लम थी। वो कंसीव नहीं कर पाती थी। अग्रिमा खिन्न रहती और वजह-बेवजह क्लेश करने को आमदा हो जाती।
“यार मैं तंग आ गया तुम लोगों की सिटर-पिटर, सुन-सुन कर। काम पर ध्यान दूँ कि गृह युद्ध पर।” एक दिन उसने फ़ैसला ले लिया, ”पिताजी को वृद्धाश्रम छोड़ आता हूँ।” उसने एक अच्छा वृद्धाश्रम देख लिया। साफ़ सुथरी जगह। अच्छे हवादार कमरे। एसी लगा हुआ, बाथरूम में ठंडे गरम पानी की पूरी व्यवस्था और वहाँ भजन पूजा के अलावा तरह-तरह के मनोरंजन की भी व्यवस्था थी। ताश, कैरम, लूडो, चैस आदि स्वीमिंग पूल, जिम, योगा तथा मेडिकल केयर। महँगा था पर आर्यन कमा भी ख़ूब रहा था।
बड़ी हिम्मत करके उसने पिता के सामने रविवार की रात को प्रस्ताव रखा। सोमवार की सुबह की फ़्लाइट से अमेरिका के लिए रवाना हो गया था। पन्द्रह घंटे बाद, वो उलटे पैर वापिस भागा। अग्रिमा का फ़ोन था, पिता जी ने नींद की गोलियों की ओवर डोज़ ले ली थी। अस्पताल मे इमर्जेन्सी में एडमिट है। आर्यन के सिर पर गाज गिरी। वो रास्ते भर सिर पकड़ कर रोता रहा, ऐसी की तैसी इस नौकरी की! मेरी ज़िंदगी बरबाद कर दी। कॉरपोरेट की पिस्तौल किस-किस की छाती छलनी करेगी?
नवीन ने स्टार्ट अप में निवेश किया सो किया। अब तक कम्पनी में बौस था पर अब वो अपना बौस था। अपनी कम्पनी थी। पहले से भी ज़्यादा मसरूर रहने लगा। यदि पहले साँस लेने की फ़ुरसत नहीं थी तो अब साँस छोड़ने की नहीं थी। प्रिया का पर्स रूपयों से व क्रेडिट कार्डों से भरा होना चाहिए, पति मायने पैसा दोनो ‘प‘ से शुरु होते हैं।
दोनों बेटों में छोटे साहब माँ पर गए थे। होस्टल से फ़ोन आया था। प्रिंसिपल ने दोनों पेरेंट्स को बुलाया था। नवीन ने बहुत बड़ा झगड़ा किया और प्रिया से अकेले जाने के लिए कहा पर प्रिया ने अपने प्रोग्राम बता कर कन्नी काटने की जी तोड़ कोशिश की। फ़ाइनली दोनों फ़्लाइट से होस्टल पहुँचे। छोटे साहब जादे ड्रग्स लेने लगे थे। प्रिंसिपल ने दोनों को लताड़ा। उस पर नवीन प्रिंसिपल पर भड़क गया।
“आपकी देख-रेख में रखा है आप की ज़िम्मेदारी है। होस्टल में ड्रग्स का धंधा करते हैं आप लोग। आपको कोर्ट में घसीटूँगा।” नवीन ने वहाँ बहुत हंगामा किया। उसके बेटों को होस्टल से निकाल दिया गया।
घर ले तो आऐ पर वहाँ आकर उन्हें पूरी आज़ादी मिल गयी थी।
उधर नवीन का स्टार्ट अप स्टार्ट नहीं हुआ। पूरा पैसा डूब गया। हताश नवीन चारों तरफ़ से घिर गया । न घर का न घाट का, खुदकुशी करने की सोचने लगा था।
कॉरपोरेट अजगर ने उसे कसकर लपेट लिया था। उसका दम घुट रहा था।
“मेरा नाम मरुभूमि होना चाहिए था।”
तेरहवे माले पर साईकियाट्रिस्ट के यहाँ शुभा आती थी। वहाँ उसकी काउंसलिग होती थी। काउंसलिग के बाद वो मेघा के भारी दरवाज़े को ठेलने का प्रयत्न करती “तू संदीप से कैसे मिली? संदीप की गर्लफ़्रेंड अल्पा हुआ करती थी? तूनें ही तो बताया था न?”
“थी, पर वो अपने नाम सार्थक कर गई।” शरारती मुस्कुराहट होंठों पर फैल गयी। ”यथा नाम तथा करम! अल्प समय रही संदीप के जीवन में।”
“फिर। तू मिली?” शुभांगी भी हँस पड़ी।
गम्भीर होते हुए मेघा बोली
“काश न मिली होती। आर्किटेक्चर की पढ़ाई करते-करते टकरा गया क्लब में और बस डिग्री भी अधूरी छोड़ उड़ चली इसकी बाहों में। जाने क्या चुम्बकीय आकर्षण था। बिल्कुल फ़िल्मी हीरो जैसा।
मेरे तो पैर ज़मीन पर पड़ते नहीं थे। हम बहुत बहुत खुश थे पर हमारे इडन गार्डन में शैतान सर्प छिप कर बैठा था। डस लिया संदीप को। सुरा और सुराही अब और कुछ नही रह गया। इस महानगरी में तो ठर्रा भी शामिल हो गया।!”
“सुरा और सुंदरी?” अवाक शुभांगनी
“सुराही है पर सुंदरी की गरदन तो मेरी ही है!”
मेघा की आँखों में फिर बाढ़ आ गई थी, “कारपोरेट के जंगल में अजगर होते है। डैडलाइन, डैडलाइन फुफकारते अजगर! डैडलाइन करते-करते वो खुद भी डैड हो गया!”
मेघा फिर बरसने लगी। उत्तेजित हो शुभांगनी ने मेघा का फूट-फूटकर रोता चेहरा अपने हाथों में ममता से थाम लिया,”चल तू मेरे साथ फ़ैमिली कोर्ट में अलग हो जा, छोड़ इस पिय-कक-ड़ को!”
उसने प्रतिभाव नहीं दिया। मासूम आँखें बरसने लगी हिचकी लेकर मेघा बेहताशा रो पड़ी।
“क्यों बर्दाश्त कर रही है। सारी ज़िंदगी तेरे सामने है। पूरी उम्र पड़ी है। क्या सोच रही है?
हताश मेघा खिड़की के पास जा खड़ी हुई। आकाश की ओर देखा, सामने छजली पर नन्हे कबूतर के बच्चों का जोड़ा थोड़ी देर उड़ता, फिर बैठ जाता। अभी उन्हें खुले आसमान पर उड़ना नहीं आया था। बावली सी उनकी ओर इशारा कर शुभांगी से बोली
“देख अभी इनके पंख कोमल हैं”, और पगलाई सी गाने लगी
“पंख हैं कोमल आँख है धुंधली, जाना है सागर पार
मेरे पिजन पेयर के भी पंख अभी कोमल हैं!
आँख है धुंधली
जाना है सागर पार……!






