“दादी मैं बाहर खेलने जाऊँ।”- सुरभि ने सोफिया से इजाजत माँगी।
“हाँ, बेटा लेकिन ज्यादा दूर मत जाना। यहीं अहाते में खेलना और हाँ, शोर बिल्कुल भी नहीं करना। दोपहर का वक्त है। सब लोग अपने -अपने घरों में सो रहे होंगे।”
“ठीक है, दादी।” सुरभि दौड़कर नीचे खेलने चली गई।
सोफिया टी. वी. चैनल को बदलने लगी। सुरभि, उसके बेटे कमलेश और उसकी बहू निम्मी की बेटी है। कमलेश एक सरकारी बैंक में काम करता है। बार -बार तबादले से परेशान होकर उसने कठुआ में ही अपनी बेटी का एडमिशन करवा दिया था। दोनोें पति – पत्नी बैंक में काम करते थे।
ट्राँस्फर जहाँ-जहाँ होता उसके अनुसार, वो कभी अंबाला दौड़ते तो कभी चंडीगढ। उनका बेटा सुनील और सुरभि यहाँ कठुआ में अपने दादी के साथ रहते हैं। सोफिया अब बेवा हो चुकी है। उनके पति देश के लिए दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। सोफिया इस साल संतानवे की हो गई थी। अब तो हिला भी नहीं जाता था, उससे। जहाँ बैठती, बैठी ही रह जाती।
घर में मेड आती थी। सुबह शाम खाना बनाती। कपड़े धो देती। बच्चों को खाना खिला देती। वृद्धा सोफिया के पास अब कोई काम नहीं था। अखबार बच्चों से पढ़वाती। जासूसी उपन्यासों का उसको शुरू से शौक था। वो सुनील को जब -तब बिठा लेती। कभी अखबार पढ़ने को कहती। कभी जासूसी कहानियों को पढ़कर सुनाने की इच्छा जाहिर करती। ये सब काम इतवार को होता या कोई सरकारी छुट्टी या कोई पर्व -त्योहार। जब थोड़ा- बहुत पढ़कर बच्चे इधर -उधर भागने लगते या खेलने जाने की जिद करने लगते। तो सोफिया का एक ही सहारा होता- न्यूज चैनल।
ज्यादातर वो न्यूज चैनल ही देखती थी। देश -दुनिया की खबरें। चैनल बदलते हुए, उसके हाथ यकायक रूक गए। आज फिर एक फौजी की लाश तिरंगे में लिपटी हुई आई थी। उस फौजी की उम्र पच्चीस एक साल रही होगी। सीमा पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुए, वो जवान शहीद हो गया था। गोलियों से सलामी दी जा रही थी। उस शहीद जवान को। सारे लोग सावधान की मुद्रा में खड़े थे। सौरभ की विदाई भी ऐसे ही हुई थी। उसको भी ऐसे ही गोलियों की सलामी दी गई थी। गोलियों की आवाज के बीच सोफिया अपने अतीत के खोह में गुम होती चली गई।
“माफ कीजिए, मैं यहाँ थोड़ी देर बैठ जाऊँ। मैं आपको बहुत देर तक तकलीफ नहीं देने वाला हूँ। बस आगे कठुआ तक मुझे जाना है। अगले किसी स्टेशन पर उतरकर मैं जनरल डब्बे में चला जाऊँगा। अगर आपको एतराज ना हो तो।” उस युवक ने बहुत सधे हुए शब्दों में कहा था लेकिन, पता नहीं क्यों सोफिया को गुस्सा आ गया।
बिना सौरभ की तरफ देखे ही बोली -“आपको पता नहीं है, कि ये रिजर्वेशन वाली कंपार्टमेंट है। आपको इस कंपार्टमेंट में नहीं आना चाहिए था। अगर चढ़ना ही था, तो किसी जनरल कंपार्टमेंट में चढ़ जाते। हम लोग जनरल कंपार्टमेंट की परेशानियों से बचने के लिए ही तो रिजर्वेशन करवाते हैं ताकि आराम से यात्रा कर सकें। सोफिया का दिमाग पहले ही खराब था। वो पहले से ही बहुत परेशान थी। धनबाद से उसकी ट्रेन थी। उसको जम्मू जाना था। घर पर उसके माँ- बाप अकेले थे। उधर जम्मू – कठुआ – सांभा- बाॅर्डर पर सीमा पर से लगातार सीज फायर का उल्लंघन हो रहा था। मोर्टार और गोलियों की बरसात हो रही थी। सोफिया अपने माँ – बाप को लेकर बहुत चिंतित थी। उसको ऐसा लग रहा था, कि वो किसी तरह जल्दी- से -जल्दी जम्मू पहुँच जाए।
वो दिल्ली में काम करती थी। धनबाद अपने किसी काम से आई थी। तब तक पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी शुरू हो गई थी। वो अभी अपना काम निपटा भी नहीं पाई थी। तब तक युद्व जैसे हालात शुरू हो गए थे। लोगों में एक तरह का डर व्याप्त हो गया था। चारों तरफ अफरा -तफरी का माहौल बन गया था। भरसक सोफिया को अपने माँ-बाप की चिंता सताने लगी थी। पहले तो उसको टिकट ही नहीं मिल रहा था। किसी तरह इधर-उधर से जुगाड़ बिठाकर उसने टिकट का बंदोबस्त किया था।
सोफिया अपनी सीट के नीचे सामान को व्यवस्थित कर चुकी थी।
सौरभ ने एक बार फिर कोशिश की -“प्लीज केवल अगले स्टाॅप तक मुझे यहाँ बैठने दीजिए। मुझे मालूम है। आप बहुत नेकदिल हैं। आपका दिल मोम की तरह कोमल है और खूबसूरत लोग किसी का दिल नहीं दुखाते। दूसरों की हमेशा मदद ही करते हैं। पता नहीं क्यों आपको देखकर ऐसा लगता है।”
इस बार सोफिया को मुड़कर सौरभ को देखना बड़ा लाजमी हो गया। बोली -“अच्छा तो मैं खूबसूरत और रहम दिल भी हूँ। ये तो मुझे पता ही नहीं था। बा-मेहरबानी आपके द्वारा आज मुझे पता चल गया, शुक्रिया। आप पीछे से भी लोगों का चेहरा देख लेते हैं, क्या? या आपने झूठ बोलने में पी. एच.डी. कर रखी है।”
सौरभ झेंप गया। सचमुच में उसने सोफिया को सामने से कहाँ देखा था। वो तो हड़बड़ी में ट्रेन में चढ़ गया था। खिड़की से उसने बस सोफिया का आधा चेहरा ही देखा था।
झेंपते हुए बोला -“नहीं मैनें खिड़की से आपको देख लिया था।”
“अच्छा जी आप कहीं इसलिए तो इस कंपार्टमेंट में नहीं चढ़ गए, कि आपको एक खूबसूरत लड़की दिख गई थी और आप उसके पीछे -पीछे हो लिए। आपको कहीं जाना भी है, या बस यूँ ही ट्रेन में चढ़ गए। मैं खूब जानती हूंँ, आप जैसे लोगों को। लड़की देखी नहीं और लगे हाथ साफ करने।”
सौरभ बस इतना ही कह सका -“नहीं ,ऐसा नहीं है। मुझे ड्यूटी ज्वाईन करनी है।”
सोफिया को अब अफसोस हुआ। उसने सौरभ को बहुत भला – बुरा कह दिया था। गिल्टी फील करने लगी, सोफिया।
सौरभ से बोली -“बैठ जाईए।”
मन- ही- मन सोचा। बेकार में ही उसको इतना उल्टा- सीधा कह दिया। वैसा लड़का तो नहीं लग रहा है।
“अरे, बैठ भी जाईए। खड़े-खड़े थक जाएँगे।”
सौरभ -“जी मैं ठीक हूँ। मुझे तो इतना खड़े रहने की आदत है।”
“फिर, भी बैठ जाईए। अगला स्टोपेज अभी घंटे भर बाद आएगा।”
सौरभ पर उसने सरसरी नजर दौड़ाई। चौड़ी छाती,तँबाई रँग। कद साढ़े छह फुट। मजबूत कँधे। गोरा चेहरा , उम्र कोई तीस – बत्तीस साल। जींस, टी -शर्ट में वो बेहद खूबसूरत लग रहा था। हाथ में एक बैग। बाईंडिंग या बँधा हुआ एक कँबल। कुल इतना ही सामान था।
“क्या करते हैं। वहाँ जम्मू में।”
” कुछ नहीं, बस घोड़ों के अस्तबल में काम करता हूँ और यात्रियों को ऊपर पहाड़ पर ले जाते हैं।”
” मुझे बना रहें हैं। आपकी कद-काठी और आपकी पर्सनैलिटी देखकर तो ऐसा नहीं लगता, कि आप कोई अस्तबल या घोड़े के साईस हों। सच -सच बताईए कौन हैं, आप।”
सौरभ का दिल इस बार तेजी से धड़का था। वो नहीं चाहता था, कि वो अपनी असलियत सोफिया को बताए। उसको दरअसल कठुआ जाना था। सीमा पर हालात बहुत खराब चल रहे थे। वो अपनी बहन की शादी में यहाँ धनबाद आया था। शादी अभी दो दिन पहले ही निपटी थी। तब तक देश में युद्ध जैसे हालत बन गए थे। वो अपनी पहचान किसी को बताना नहीं चाहता था, कि वो दरअसल एक फौजी था। इस तरह से सबको अपनी असलियत बताना उसे ठीक नहीं लगता था। वो बहुत ही शाँत स्वभाव का था। ज्यादा बात करना उसके स्वभाव में नहीं था।
बोला -“नहीं मैं घोड़ों की देखभाल ही करता हूँ। पहाड़ की चोटी पर यात्री सीधे नहीं चढ़ पाते। इसलिए घोड़ों की मदद से ऊपर पहाड़ पर जाते हैं। मैं, छोटा- मोटा काम करने वाला ही आदमी हूँ। पता नहीं आपको क्यों ऐसा लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। “
सौरभ की बातों में पता नहीं ऐसा क्या था, कि ना चाहते हुए भी सोफिया को यकीन करना पड़ गया, कि सौरभ जो कुछ कह रहा है। वो सच कह रहा है। शाम कब की हो चुकी थी। ट्रेन अपनी रफ्तार में दौड़ती जा रही थी।
अगला स्टेशन आने ही वाला था। उस स्टेशन से सोफिया का भाई मुरारी आकर ट्रेन में चढ़ने वाला था। उसको भी सोफिया के साथ जम्मू तक जाना था। सोफिया बहुत व्यग्र होकर पहलू बदल रही थी। दरअसल उसका भाई आई. टी. आई . की परीक्षा लिखकर सीधे स्टेशन आकर उसके साथ ही जम्मू तक जाने वाला था। सोफिया के साथ। सोफिया के पास वाली अपर की बर्थ दरअसल मुरारी के नाम से बुक थी। स्टेशन आया। लेकिन उसका भाई नहीं।
सोफिया ने मुरारी को फोन लगाया -” हाँ, मुरारी तुम कहाँ हो। आ जाओ स्टेशन। गाड़ी स्टेशन पर खड़ी है।”
“दीदी, मैं ट्रेफिक में फँस गया हूँ। मुझे स्टेशन आने में करीब एक -सवा घंटे से कम नहीं लगेगा।”
“ट्रेन तो केवल दस मिनट ही रूकती है, इस स्टेशन पर। किसी तरह कोशिश करो, जल्दी पहुँचने की।”
“दीदी नहीं हो पाएगा। आप चली जाओ। मैं एक -दो दिन बाद आ जाऊँगा।”
“ठीक है, दीदी रखता हूँ। तुम ठीक से जाना। रात में सफर में सो मत जाना। ट्रेन में सामान बहुत चोरी होता है।”
” वो सब तो ठीक है, लेकिन, मैं अकेले कैसे इतनी दूर तक का सफर करूँगी। मेरे साथ लगेज भी तो है। अरे दीदी! मैं कठुआ में अपने किसी दोस्त को फोन कर दूँगा। वो सामान उतरवा देगा। घबराने की कोई जरूरत नहीं है, दीदी। सब ठीक होगा। अच्छा रखता हूँ। अब ट्रैफिक खुल गया है। अब स्टेशन ना जाकर सीधे घर चला जाऊँगा। चलो, ठीक है। हैप्पी जर्नी दीदी।”
“ठीक है, रखो।”
सौरभ और मुरारी की कद -काठी और चेहरा मोहरा एक सा बिल्कुल मिलता जुलता था। हाँ, हाईट और रंग में मुरारी, सौरभ से थोड़ा उन्नीस था। कंपार्टमेंट में लोग अपने -अपने में मस्त थे। सोफिया ने वैसे तो दिन में बहुत सफर किया था। लेकिन रात में इतना लंबा सफर उसने कभी नहीं किया था।
वो सोचने लगी। जगह- जगह युद्व जैसे हालात चल रहे हैं। युद्व की तैयारी मे पूरी सेना लगी है। पता नहीं पड़ोसी दुश्मन देश कब हमला कर दे। किसी एक मर्द का उसके साथ होना जरूरी था। उसने मन में सोचा, कि सौरभ को ही क्यों ना वो सफर में अपने साथ ले चले। उसको तो एक मर्द साथी मिल ही जाएगा। कम-से-कम कठुआ तक तो रहने को कहे। उसके बाद के स्टेशन पर मुरारी का दोस्त तो आ ही जाएगा। उसका सामान लेने।
मुरारी से बात करने के बाद सोफिया के चेहरे पर परेशानी के बादल मँडराने लगे। एक ऊहा-पोह सोफिया के चेहरा पर दिखाई दे रहा था।
सौरभ उतरने ही वाला था। तभी सोफिया को परेशान देखकर बोला -“आप कुछ परेशान सी लग रहीं हैं।”
” हाँ, मेरा मुँह बोला भाई अभी स्टेशन पर आने ही वाला था। लेकिन ट्रेफिक में उसे लेट हो गया। अब अकेले ही यात्रा करनी पड़ेगी।”
” ओह ! ये तो बहुत बुरा हुआ। खैर, मेरा वो स्टेशन आ गया है। जहाँ से मेरी टिकट बनी थी। अगले कंपार्टमेंट में मेरी कंफर्म सीट है। मैं चलता हूँ।”
” ठीक है। “
सौरभ बाईंडिंग वाले कपड़ों का बँडल और बैग उठाकर अगले कंपार्टमेंट में चलने को हुआ। वो बाहर निकलकर सोफिया के खिड़की के पास से गुजरा।
तभी सोफिया ने, सौरभ को टोका -” सुनिए,आप चाहे तो मेरे भाई की सीट पर यात्रा कर सकते हैं। चूँकि मैं अकेली हूंँ। और रात में यात्रा कर रही हूँ। इसलिए किसी विश्वासी आदमी का साथ में होना बेहद जरूरी है। क्या आप मेरे साथ इसी कंपार्टमेंट में मेरे भाई की सीट पर यात्रा कर सकते हैं। अगर आपको असुविधा ना हो तो।”
” लेकिन, टी . टी. आएगा तब।” सौरभ ने संशय जाहिर किया।
“,अरे,टी. टी. से मैं बात कर लूँगी। आप बस अंदर आ जाईए। ट्रेन छूटने ही वाली है।”
धीरे – धीरे ट्रेन ने गति पकड़ ली। अब ट्रेन की रफ्तार के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था।
उसने चाय के लिए सौरभ को पूछा -“आप चाय लेंगें।”
“आप किसी ऐरे-गैरे को चाय पिलाएँगी।” सौरभ ने चुटकी ली।
“अरे मैनें तो ऐसे ही कह दिया था। आप उस बात को अब भी पकड़े हुए हैं। आदमी को पहचानने में कभी- कभी गलती हो जाती है।”
“यानी कि आपके हिसाब से मैं गलत आदमी हूँ।”
“ऐसा मैं उस समय तक ही सोचती थी। लेकिन अब नहीं। आदमी -आदमी में अंतर होता है। इतनी तो परख है, मुझमें।”
” तो क्या परखा आपने। कैसा आदमी हूँ, मैं?”
“आप भले आदमी हैं। “
“वो कैसे?”
“आप भले आदमी ना होते,तो में आपको अपने साथ सफर करने की इजाजत नहीं देती।”
“अच्छा तो ये बात है।”
“हाँ,और क्या।”
“ये तो आपकी जरूरत है, कि आपके साथ कोई मर्द सफर करने के लिए नहीं है। नहीं तो आप मुझे अपने साथ इस कंपार्टमेंट में रूकने को न कहतीं। खैर, ऐसा होना लाजिमी भी है। सुरक्षा कारणों से।” सौरभ ने जैसे सफाई देनी चाही।
सोफिया ने चाय की प्याली बनाई और सौरभ की तरफ बढ़ा दिया। इस बार सौरभ के हाथ से सोफिया के हाथ को छू गया। ठंड के मौसम में सोफिया का हाथ बिल्कुल ठंडा हो गया था। सौरभ ने चाय की प्याली थाम ली और धीरे -धीरे चाय पीने लगा।
अब कंपार्टमेंट में पटरियों के खडखड़ाने की आवाज के अलावा और कोई शोर नहीं था। सौरभ ने कितनी ही बार ट्रेन से सफर किया था। लेकिन ये सफर उसके लिए एक अनोखा सफर था। बहुत सन्नाटा था, उस कंपार्टमेंट मे। ये सन्नाटा बहुत प्यारा लग रहा था, सौरभ को। ट्यूबलाइट की दुधिया रौशनी में उसने सोफिया को पहली बार देखा। उसके चेहरे की खूबसूरती। पूर्णमासी की चाँदनी खिड़की से उतर रही थी। कंपार्टमेंट में चाँद की रौशनी बिखर गई थी।
सौरभ ने गौर से सोफिया के चेहरे को निहारा। गोरा रंग, हरी आँखें . भरी – भरी छातियाँ, बड़े-बड़े नितंब। जींस – टाॅप में वो बेहद खूबसूरत लग रही थी।
सोफिया ने पूछा -“ऐसे क्या देख रहें हैं?”
“आपका, खूबसूरत चेहरा।”
“धत्, मैं कहाँ खूबसूरत हूंँ। मेरी तो उम्र भी अब ढलने लगी है। मेरी उम्र के लोगों के तो बड़े -बड़े बच्चे हैं।”
“नहीं, मैं सच कह रहा हूँ। आप -बहुत खूबसूरत हैं। आपके हर हिस्से को कुदरत ने बहुत प्यार से बनाया है।”
“इसका बखान आप पहले ही कंपार्टमेंट में घुसते ही कर चुके हैं।”
सौरभ को लगा, कि वो कुछ ज्यादा ही बोल गया है। वो अब चुप हो गया था।
अब वो खिड़की से बाहर ताक रहा था। दूधिया रौशनी में दूर – दूर तक फैले दैत्याकार पहाड़। बिल्कुल दैत्यों की तरह ही दिख रहे थे। लंबे – लंबे पेड़, खेत – खलिहान। कहीं शादी हो रही है। बहुभात के लिए लगाया गया पंडाल। उससे झरती ट्यूबलाइट की हरी- सफेद, रौशनी। अठखेलियाँ करते बादल। कहीं छुपते हुए सितारे। कहीं बादल ही बादल। कभी चाँद दिखता। कभी चाँद गायब हो जाता। जब ट्रेन किसी सुरंग से होकर गुजरती तो ट्रेन के बाहर सब कुछ अँधेरे में डूब जाता। ट्रेन सरपट भाग रही थी। आंँखों से एक-के- बाद एक स्टेशन भागते जा रहे थे। ट्रेन छोटे स्टेशनों पर नहीं रूकती। वहाँ प्लेटफाॅर्म पर ऊँघते लोग हैं। चना बेचने वाले, चाय बेचने वाले। स्टेशन पर ज्यादातर लोग सो गए हैं या यूँ कहा जाए कि स्टेशन ही सो गया है।
“उधर क्या देख रहे हो, खिड़की के बाहर। अभी मेरी खूबसूरती की बात कर रहे थे और अभी बाहर क्या निहारने लगे।”
“कुछ नहीं, कुदरत की बनाई हुई चीजें ही देख रहा था। नदी, तालाब, पहाड़, अँधेरा, चाँदनी उसकी रौशनी। पुल,सुरंग और नदी।“
“क्या ये मुझसे खूबसूरत हैं। “
“नहीं, दोनोें कुदरत की बनाई हुई चीजें है। दोनों ही खूबसूरत हैं।”
“फिर, भी मेरे और इन चीजों में दोनोें में से कौन ज्यादा सुंदर है।”
सौरभ केवल हँसकर रह गया।
“शादी हो गई तुम्हारी।” सोफिया ने सौरभ के चेहरे को निहारते हुए कहा।
“नहीं।”सौरभ तैरते हुए दृश्यों में कहीं खोता हुआ, बोला।
“शादी लायक तो तुम्हारी उम्र हो ही गई है। शादी अब तक क्यों नहीं की?”
“ये सवाल तो मैं तुमसे भी पूछ सकता हूँ। ”
“जिम्मेदारियाँ और क्या कारण हो सकता है। मैं अपने माँ- बाप की अकेली संतान हूँ। मेरे माँ – बाप बूढ़े हैं। उनकी उम्र हो गई है। आखिर, किनके भरोसे उनको छोडूँ। मेरे चले जाने के बाद उनको कौन देखेगा।”
“लेकिन, तुमने शादी क्यों नहीं, की। तुम्हारी भी तो शादी लायक उम्र हो गई है। “
“वही जिम्मेवारी की बात आ जाती है। तुम्हारी वाली हालत। घर में बहन थी। उसकी शादी करनी थी। उसके बाद ही तो अपनी शादी के बारे में सोचता।“
दोनोें अपनी हालत पर मुस्कुराने लगे।
“अरे मैनें अपना फोन कहाँ रख दिया।” सौरभ को अचानक अपना फोन याद आया। वो अपने दोनों जेब, ऊपर का पैकेट खँगालने लगा। लेकिन फोन नदारद था।
“कहाँ रखा था। यहीं मेरे जेब में ही तो था।” सौरभ अब अपनी जगह को जहाँ वो बैठा था। उसको देखने लगा, लेकिन फोन नहीं मिला।
“ठीक से देखो। वहीं होगा। आखिर कहाँ चला जाएगा। इतनी जल्दी।”
सुनो, तुम्हारे पास तो, मोबाइल है, ना। अपने मोबाइल से जरा मेरे नंबर पर रिंग कर दो। हो सकता है,यहीं कहीं गिरा हो। मिल जाए।
सोफिया ने नंबर पूछकर मिलाया। और मोबाइल की घँटी पर एक प्यारा सा रिंगटोन बजने लगा। सुनो ना संगेमरमर …कुछ भी नहीं हे .. का रिंगटोन कंपार्टमेंट में बज उठा।
मोबाइल, सौरभ की सीट के बगल में सी गिरा था। रिंग मारने पर आसानी से मिल गया।
“रिंगटोन तो तुमने बहुत अच्छी लगा रखी है। सुनो ना संगेमरमर।”
” हाँ मुझे ये गाना बेहद पसंद है।”
” तुमने मेरी काॅलर टयून सुनी है। “
” नहीं। “
” फिर से मेरा मोबाइल नंबर डायल करो।”
सौरभ ने स्पीकर ऑन कर दिया। कौन तुम्हें यूँ प्यार करेगा। जैसे मैं यूँ करती हूँ। बज उठा। “
सोफिया का चेहरा खुशी से चमकने लगी -”दोनों मेरी फेवरेट साँग हैं।”
” तुम बहुत स्मार्ट हो।”
” वो कैसे?”
” तुमने बहाना बनाकर मेरा मोबाइल नंबर ले लिया।”
” नहीं ऐसा कोई मेरा इंटेंशन नहीं था। तुम कहो तो डिलीट कर दूँ।”
” नहीं, लेकिन तुम्हें पता है। लड़कियाँ अपना नंबर किसको देती हैं।”
” किसको।”
” समवन हू स्पेशल।” सोफिया।
” सो ..।”सौरभ।
” सो व्हाट।” सोफिया।
” आई . एम. स्पेशल फोर यू” सौरभ।
” इट्स काॅम्पलिकेटेड।“ सोफिया।
“अब ज्यादा भाव मत खाओ। चलोगी मेरे साथ डेट पर।” सौरभ।
“लेकिन, तुम मेरे से उम्र में बहुत छोटे हो। कहाँ तुम तीस के और मैं कहाँ चालीस की। एक दशक का अंतर है। हमारी और तुम्हारी उम्र में।” सोफिया।
“एज इज जस्ट ए नंबर। और प्यार में ऊँच नीच,जाति -पाति, अमीर -गरीब कोई मायने नहीं रखता। बस दिल मिलना चाहिए।”सौरभ।
“दस, साल बीतने के बाद तुम ही किसी नई -नवेली को खोजने लगोगे। तब मैं तुम्हारे लिए बूढ़ी हो जाऊँगी। “ सोफिया।
“डोंट बी फुल, प्रैक्टिकल हो जाओ। ऐसा नहीं होगा। मैं तुम्हें रूह की गहराईयों से चाहता हूँ। तुम्हारा प्यारा मेरे लिए क्षणिक नहीं है। तुम मेरे लिए अप्रतिम हो।” सौरभ।
“सच में, हूँ। “ सोफिया।
” अच्छा इस नंबर का क्या करना है। हो सकता है, हम फिर कभी मिले ही ना। ये हमारी आखिरी मुलाकात हो।” सौरभ।
ट्रेन रफ्तार से कुहासे को चीरती हुई। आगे बढ़ रही थी। अगले दो -दिन ट्रेन में खुशी -खुशी बीते। ट्रेन बहुत लेट थी। तीसरे दिन आखिर सुबह दस बजे ट्रेन कठुआ स्टेशन पर पहुँची। मुरारी का दोस्त मयंक सोफिया को लेने आया था। आखिरी बार सौरभ और सोफिया मिल रहे थे। सौरभ ने सोफिया को इशारे से कहा फोन करना। गाड़ी जम्मू के लिए आगे बढ़ गई।
घर पहुँचने के बाद सोफिया का दिल किसी काम में नहीं लगता था। उसको बार -बार सौरभ की याद आती थी। एक तय समय तक लड़के वाले सोफिया को देखने और रिश्ते की बात करने के लिए आते थे। लेकिन जब सोफिया ने जिम्मेदारियों के बोझ तले खुद को दबाती चली गई। तो उसको लगा कि अब उसकी मौत हो गई है और उसने शादी के इरादे को ही एक सिरे से खारिज कर दिया था। अधिक उम्र हो जाने के बाद अब कोई रिश्ता भी उसके लिए नहीं आने लगा था। जो चूल्हा ठंडा हो गया था। और रसोई का काम खत्म करने के बाद जैसे गृहस्वामिणी भँसार घर से चूल्हा निकालकर बाहर रख देती है। और अब उसमें कुछ भी नहीं पकने लायक है। क्योंकि उसमें तो अब आग ही नहीं है। ऐसा सोचना गृहस्वामिणी की दरअसल भारी भूल थी। दरअसल उस राख में नीचे कहीं एक चिंगारी दबी हुई होती है। जिसकी भनक गृहस्वामिणी को भी नहीं होती। कुछ -कुछ वैसा ही हालत सोफिया के माता -पिता और खुद सोफिया की भी थी। जिस मर्ज का इलाज वो बाहर ढूँढ रही थी। उसका इलाज तो खुद उसके पास था लेकिन सौरभ से मिलकर वो आग अब दावानाल बनकर पूरे घर को जलाने की फिराक में था। घर पहुँचकर सोफिया ने सौरभ को फोन लगाया और शिकायत करती हुई बोली -”आज चौबीस घंटे बीत गए। तुम्हें तो मेरी याद भी नहीं आती होगी।”
“नहीं ऐसा नहीं है, मेरी जान। तुम्हें तो मैं एक क्षण भी भूल नहीं सका। लेकिन, केवल बात करने से काम नहीं चलता। काम भी तो करना पड़ता है। अगर घोड़े की सेवा टहल ना करूँ। अगर उनको टहलाने ना ले जाऊँ। अगर गाईड बनकर लोगों को घाटी की बात ना समझाऊँ, तो मालिक मेरी जान खा जाएगा। टूरिस्टों के साथ ही मेरा समय ज्यादातर बीतता है। टूरिस्ट हमारे लिए भगवान हैं। पेट के लिए सब करना पड़ता है।” -सौरभ। ” तुम यहीं आ जाओ। चार घोड़े तुम्हारे लिए खरीद देती हूँ। तुम उनकी सेवा करना और मुझे उन घोड़ों पर घूमाना। जो मजदूरी तुम वहाँ पाते हो। यहाँ आकर मुझसे ले लेना। “ -सोफिया।
सौरभ -” सो तो ठीक है। लेकिन मेरी नौकरी का सवाल है। नहीं तो मैं जरूर आता। एक बार नौकरी चली गई, तो फिर ना मिलेगी। और तुम्हें तो पता ही है, कि नौकरी मिलना आज के समय में कितना मुश्किल है।“
सोफिया -”और तुमने मुझे डेट पर ले जाने को कहा था। उसका क्या हुआ।”
“चलेंगे डेट पर भी चलेंगे। अभी गर्मी का मौसम है। अभी इधर सीजन चल रहा है। दो- पैसे कमाने का दिन है। इसलिए मालिक से छुट्टी की बात भी नहीं कर सकता। जैसे ही जुलाई -अगस्त के बाद अक्तूबर- नवंबर आता है। डल -लेक जम जाता है और टूरिस्टों का आना इधर कम हो जाता है। मैं, आता हूँ तुमसे मिलने। लेकिन अभी तुम थोड़ा समय दो।”- सौरभ।
“तुम्हें याद है , तुमने पूछा था। समवन हू स्पेशल!”-सोफिया।
” हाँ।”-सौरभ।
सोफिया -” वो, तुम हो सौरभ। जिसको मैं जी जान से चाहती और प्रेम करती हूँ। तुमसे मिलना चाहती हूँ। तुमको छूना चाहती हूँ। तुममें समाना चाहती हूँ। ओह, सौरभ आई रियली लव यू .। डोंट फोरगेट मी। “
“सोफिया का प्रेम पवित्र प्रेम है। जिसमें केवल मिलना है। प्रेम की अनुभूति ही प्रेम है। जो चीज दूर है। उसको लेकर एक उत्सुकता आदमी के मन में रहती है। मिलने के बाद सारी उत्सुकता जैसे शाँत पड़ जाती है। मैं, तुमसे सच्चा प्रेम करता हूँ। तुमको तो भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता।”
” ओह,सौरभ तुम कितने अच्छे हो।”
किसी तरह दो महीने बीते। बर्फ पिघलने के बाद पाकिस्तानी सेना ने देश में घुसपैठ कर दी थी। क्राॅस फायरिंग करके पहलगाम, कठुआ और करगिल से भारी मात्रा में आतंकवादियों को श्रीनगर, अखनूर, बारामूला से देश में आई. एस. आई. घुसपैठ करवा रही थी। इन इलाकों में निर्दोष नागरिक मारे जा रहे थे। अब युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था। एक दिन सौरभ का फोन आया। उस समय सोफिया बाजार में सामान खरीदने गई थी। घर आकर देखा तो ढ़ेर सारे मिस्ड काॅल थे।
उसने काॅल मिलाया -” हाँ मेरा चरवाहा, मेरी जान ने कैसे याद किया, मुझे। बताओ।”
सौरभ -” तुम्हारा चरवाहा जरूरी नहीं है, कि तुम्हें किसी काम से ही याद करे। तुम्हारे ऊपर इतना अधिकार तो है ही मेरा कि तुम्हें ऐसे भी याद कर सकता है।”
सोफिया -” सो तो है। फिर भी ,कैसे याद किया मेरी जान ने।”
” सच में मैं तुम्हें देखे बगैर अब नहीं रह सकता। बहुत दिन हो गए तुम्हें देखे। तुम्हारी बहुत याद आती है। तुम्हारी आवाज सुनते ही मेरे शरीर में अजीब सी हरकत होने लगती है। शरीर का रोयाँ -रोयाँ खड़ा हो जाता है। “
सोफिया -“आ जाओ ना फिर मुझसे मिलने। तुमको किसने रोक रखा है।”
सौरभ -“आ जाता,लेकिन मेरा काम मुझे रोक लेता है। तुम तो जानती हो। मेरे पीछे मेरा पूरा परिवार है। उनकी जरुरतें हैं। मैं,बहुत कर्मठ हूँ। तुम समझ रही हो।”
इस बार सोफिया का धैर्य चूक गया। बोली -” हाँ,तुमको तो कर्मठ होना है। तुम्हारा तो परिवार है। उनकी जिम्मेदारियाँ हैं। और मैं तो तुम्हारी कुछ लगती ही नहीं हूँ,ना।”
” नहीं ऐसा नहीं है सोफिया। तुम्हारे बिना मैं शून्य हूँ। तुम मेरी जान हो, जान!”
सोफिया -“सब कहने की बातें हैं। “
सौरभ -”सुनों सोफिया मैं तुमसे एक बेहद जरूरी बात करना चाहता हूँ। मेरा काम अभी आउट ऑफ स्टेट हो गया है। ज्यादातर मैं बाहर -ही बाहर रहूँगा। उतनी ऊँचाई पर वहाँ कोई नेटवर्क भी नहीं आता। इसलिए फोन से बहुत संभव है बात ना हो पाए। इतना कुछ होने के बाद भी मैं कोशिश करूँगा तुमसे बात करने की। जब भी मौका मिलेगा। तुमको मैं फोन कर लूँगा। फोन ना कर सका, तो खत मैं तुम्हें हर हफ्ते लिखा करूँगा। अपना ख्याल रखना। खत का भी इंतजार मत करना। देश में अभी इमर्जेंसी जैसे हालात हैं। बारामूला में मेरा पूरा परिवार रहता है। मेरा पूरा परिवार दादा -दादी, चाचा-चाची सब लोग रहते हैं।
इधर जम्मू में हालात बिगड़े तो मेरा एक और मकान धनबाद में है। मेरे दादा-दादी,और अपने माँ-पिताजी को लेकर वहीं चली जाना। रूपये- पैसो की बिल्कुल चिंता मत करना। एक ए. टी. एम. कार्ड तुम्हें कोरियर से भेज रहा हूँ। पिन की जानकारी व्हाट्स एप कर दिया है। ये सब मोटी- मोटी बातें हैं। जिसकी तुमको आने वाले समय में जरूरत पड़ेगी।”
“तुम जा कहाँ रहे हो। मुझे बताओगे भी, या तुम मुझे इसी तरह अपना आदेश सुनाते रहोगे फोन पर।”
“ये जानकर तुम क्या करोगी, कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। सेफ्टी रीजन से तुमको ये बातें बताई है। बस तुम इन बातों को मानना और एक बात सेना मुख्यालय के पास ही एक डाकखाना है। जिसमें एक डाक-बाबू नील चाचा रहते हैं। कोई खास जानकारी चाहिए हो, तो उनसे ले लेना। “
“फिर, भी तुम कहाँ जा रहे हो। मुझे कुछ तो पता होना चाहिए।”
सौरभ -“सोफिया मुझे भी कुछ पता नहीं है, कि मुझे कहाँ भेजा जा रहा है। बस मुझे भेजा रहा है और मैं जा रहा हूँ। मुझे जाना भी चाहिए। आखिर देश में हालत बेहद खराब है। इमर्जेंसी वाली हालत है। लोगों की छुट्टियाँ रद्द हो रहीं हैं। सब लोग काम पर लौट रहें हैं। होमगार्ड के सिपाही, पुलिस, सी. आई.एस. एफ., सी. आर. पी. एफ., एस . एस. बी., आर्मी, एयर फोर्स. सब लोग। बी. एस. एफ. तो मोर्चे पर पहले से ही डटी हुई है।”
सोफिया -” लेकिन, इनका तुमसे क्या संबंध है। तुम तो आम सिविलयन हो। आम साविलियन को युद्व से भला क्या मतलब है। और खासकर एक साईस को। एक कोचवान को। “
” मैं,कोचवान नहीं हूँ। इस देश का एक नागरिक हूँ। और मुझे लगता है, कि देश को युद्ध जैसी इमर्जेंसी से सामना करना पड़े, तो हर आदमी को युद्व लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। तुमने सुनी नहीं है, वो कविता –
“मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ पर जाएँ वीर अनेक।”
सोफिया -” हाँ,पढ़ी है, ये कविता, कोर्स में। माखनलाल चतुर्वेदी की लिखी हुई है। बहुत पहले पढ़ी थी।”
“बस वही हालत या इमर्जेंसी जैसी अभी हालत है, इस देश में। इसलिए इस कविता का पाठ आज के इस समय में लोगों को खूब पढ़नी चाहिए। ताकि इस धरती के लिए हमें हमारे कर्तव्य याद रहें। हम ज्यादा स्वार्थी ना बन जाएँ।” – सौरभ।
अब सोफिया का माथा ठनका था। सौरभ का डील-डौल और साढ़े छ:फीट का शरीर देखकर उसको पहले ही इस बात का अंदेशा था, कि वो कोई फौज में काम करने वाला ही आदमी है। वो कोई घोड़ों का साईस या कोई गाईड नहीं है, बल्कि वो सेना में ही काम करता है।
सोफिया-” अच्छा तुम ठीक -ठीक बताओ। तुम कौन हो? तुम सेना में काम करते हो। गुप्तचर विभाग में हो। या कौन हो? तुमको मैं जितना समझने की कोशिश करती जा रही हूँ। तुम उतना ही उलझते जा रहे हो। तुम मेरे लिए रहस्य की तरह बनते जा रहे हो। प्लीज मुझे सही जानकारी दो। तुम फूल की बात करके, मुझे दस महीनें से फूल ही तो बना रहे हो। तुम सच में चरवाहा हो, घोड़े की देखभाल करने वाले। या कोई गाईड। मेरा दिमाग तुमसे बातें करते हुए स्थिर नहीं रह पा रहा है।”
“सौरभ -”मेरा एक फोन आ रहा है। रुको, मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ। “
सौरभ का फोन कट गया था, लेकिन अवचेतन में कहीं गहरे घँसा था, सौरभ और उसकी बातें। कुछ भी साफ -साफ नहीं बताता सौरभ। जितना वो सौरभ को समझना चाहती थी। कहीं गहरे उलझती जाती थी। उसको ट्रेन में ही चेत जाना चाहिए था। ऐसे लोगों पर जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए था।
तभी मोबाइल पर टिंग से एक मैसेज गिरा। उसने गौर से देखा। वो ए.टी.एम. कार्ड का पिन था। जीरो वन,सिक्स नाईन। करीब पँद्रह दिनोंं के बाद उसको डाक से ए.टी. एम. कार्ड भी मिल गया।
उसमें एक लिहाफा था। जिसमें एक बैंक खाता था। एच. डी. बी.सी. का वो कोई बैंक था। जिस बैंक का वो एकाउन्ट था। उसकी शाखा सोफिया के घर के बहुत पास में ही थी। यानी सौरभ यहाँ आया था। और उसने मेरी लोकेशन भी देखी थी। अजीब बात है। सौरभ को मेरे घर और मेरे घर के पास ही ये बैंक है। इसके बारे में पूरी जानकारी थी।इसका मतलब उसे अच्छे से पता था। मेरे घर का पता। मेरे घर तक आकर वो मुझसे मिले बगैर चला गया। और कहता है, कि मुझसे बहुत प्यार करता है। खाक प्यार करता है। जरूर कोई मायावी किस्म का आदमी है, सौरभ। लेकिन, लोक-लाज का भी तो डर है, सौरभ को। शादी से पहले अगर कोई लड़का मिलने आता है। तो लड़की को लोग गलत नजरों से देखते हैं। लेकिन, केवल मायावी कह देने भर से काम नहीं चलेगा। वो जिम्मेदार भी तो है। वो भी शादी से पहले। लोग शादी के बाद जिम्मेदारी नहीं स्वीकारते। ये तो शादी से पहले ही जिम्मेदारी स्वीकार रहा है।
पड़ोसी देश के लिए अब नाक बचाने की बात आ गई थी। हमारी फौज ने पड़ोसी मुल्क को नाकों चने चबवा दिया था। लेकिन हमारे तरफ भी कैजुअल्टी हुई थी। चीन और नेपाल भी इस खराब परिस्थिति में पाकिस्तान का साथ दे रहे थे। पूरे देश में ब्लैक आउट चल रहा था। हर – जगह – अँधेरा। हर जगह डर का माहौल। दिन में ही सोता पड़ जाता था। सब जगह लोग सुरक्षित ठिकानों में छुप गए थें। देश के किसी भी हिस्से से कभी भी भयानक खबरें आ जाती थी। सड़कों पर लोगों के कहीं हाथ के टुकड़े तो कहीं पैर के टुकड़े जहाँ – तहाँ दिखाई देते थे। दिन-रात अस्पतालों में भीड़ लगी रहती थी।
मिलिट्री अस्पतालों में कैजुअल्टी ज्यादा हुई थी। वहाँ एंबुलेंस भर – भरकर लोग आते। लोगों का हुजूम अस्पतालों के बाहर अपनों की शिनाख्त कर रहा था। सायरन बजती और लोग बँकरों की तरफ भाग जाते। अरूणाचल प्रदेश और सियाचीन से डरावनी और भयावह खबरें आ रही थीं। मित्र देश रूस और इजरायल हमारे देश के साथ खड़े थे। रूस ने हमारे लिए दो दर्जन लडाकू बम वर्षक जहाज भेजे थे। इजरायल देश में प्रचुर मात्रा में हमें हथियार उपलब्ध करवा रहा था। लेकिन दोनों तरफ कैजुअल्टी बढ़ रही थी।
सोफिया का दिल हलकान हो रहा था। वो बार- बार सौरभ के बारे में ही सोच रही थी। वो सोच रही थी, कि इस वीभत्स युद्ध में सौरभ की क्या हालत होगी। वो क्या कर रहा होगा। वो ठीक तो होगा, या नहीं। महीना भर अब हो चुका था, उससे बात किए। अब तक उसका कोई फोन नहीं आया था। फोन आता भी तो कैसे। ज्यादातर टाॅवर पहले ही बमबारी में नष्ट हो चुके थे। कुछ थोड़े बहुत टावर जो थे। सुरक्षा कारणों से वहाँ इंटरनेट बँद कर दिया गया था। अब ले-देकर सेना मुख्यालय और उसके डाकघर का सहारा था। सेना मुख्यालय और डाकघर उसके घर के करीब था। लेकिन, सोफिया वहाँ सुरक्षा कारणों से नहीं जाना चाहती थी।
एक दिन अलस्सुबह ही वो निकल पड़ी। सेना का मुख्यालय और डाकघर ऊँचाई पर थे। चलते -चलते उसकी साँसें फूलने लगी। पूछती -पाछती वो किसी तरह काऊँटर पर पहुँची।
उसने काऊँटर पर जाकर जानकारी माँगी। कोई नील चाचा थे।
सोफिया ने पूछा -” आप में से नील चाचा कौन हैं?”
एक दुबला पतला आदमी वहाँ डाक छाँट रहा था। उसने पतली ऐनक से खिड़की की तरफ देखा -” कौन?”
सोफिया को लगा जैसे उसका आना सफल रहा। बोली -”आप ही नील चाचा हेड पोस्टमास्टर हैं।”
बूढ़े ने गर्दन हिलायी -“डाकिया परसों डाक बाँटते समय मोर्टार के छर्र से जख्मी हो गया है। अभी वो अस्पताल में है। उसकी जगह मैं उसका काम कर रहा हूँ।”
” कोई बात नहीं अगर आपको कोई तकलीफ ना हो, तो आप मेरी डाक देखेंगे। मेरी कोई चिठ्ठी या कोई खत आया हो तो? आप समझ रहें हैं। मैं जो कह रही हूँ। ”
नील चाचा -” तुम्हारा नाम क्या है, बेटी।”
“मेरा नाम सोफिया है, नील चाचा।”
सोफिया नाम सुनते ही नील चाचा के चेहरे पर एक साथ कई भाव आए और चले गए। उनका चेहरे जर्द पीला पड़ गया था। फिर जबरदस्ती मुस्कुराते हुए बोले -” अच्छा, तो तुम सौरभ की मँगेतर हो।”
“हाँ।”
” नहीं बेटी तुम्हारी कोई चिठ्ठी नहीं आई है। सौरभ तुम्हारे बारे में मुझसे अक्सर बातें करता था।”
“आप, सौरभ को जानते हैं, नील चाचा।”
“अरे सौरभ को कौन नहीं जानता। वो बहुत ही प्यारा लड़का है।”
” वैसे क्या करते हैं, वो सेना में।”
इस बार नील चाचा ने बहुत जोर से सोफिया को घूरा। कुछ देर तक सोफिया के चेहरे को देखते रहे।
फिर बोले -” तुम सोफिया ही हो ना। सौरभ की मँगेतर।”
“हाँ।” सोफिया ने नील चाचा को बहुत हैरत से देखा।
” हाँ,तो तुम्हें सचमुच नहीं पता,कि सौरभ सेना का जवान है। वो इंडियन आर्मी में है।”
” देखो, उसने बताया था, मुझे, लेकिन मैं भूल गई।”
सोफिया को झिझक हुई। उसे अपने व्यहवार पर कोफ्त हो रही थी। नाहक ही उसने नील चाचा से सौरभ के बारे में पूछ लिया। आखिर क्या सोचते होंगे नील चाचा।
“मेरी कोई डाक आए तो बताइएगा।”
” जरूर।”
सोफिया घर पहुँची तो वो सौरभ के बारे में ही सोचती रही। सेना में अफसर। और अपने आपको घोड़े की सेवा करने वाला एक मामूली सेवक बता रहा था। इंडियन आर्मी में अफसर, और अपने आपको मामूली गाईड बता रहा था। आने दो इस बार फिर खबर लेती हूँ। महीनों बात नहीं करूँगी। समझता क्या है, अपने आपको। बहुत स्मार्ट बनते हो, बच्चू। अब खत लिखेंगे तो जबाब भी नहीं दूँगी। इस बार मजा चखा के दम लूँगी।
जब हम किसी से मिल नहीं पाते और,उससे प्रेम भी करते हैं। तो हालत बहुत कठिन हो जाता है। प्रेम में पड़ी सोफिया का हाल भी कुछ ऐसा ही था। वो सौरभ से मिल तो ना सकती थी। लेकिन मिलने की जो भी संभावना होती उस पर विचार करती। उससे उसकी गैर-मौजूदगी में उससे लड़ती और झगड़ती। और अंतत:खुद अपनी बेबसी पर रोने भी लगती। उसका तो जो था। सौरभ ही था। और वो तो बस ये चाहती थी, कि किसी तरह उससे बात हो जाती। कहीं से उसका खत आ जाता। कहीं से उसकी सलामती की खबर मिलती। या कम- से -कम वो सौरभ को एक नजर भर देख लेती। इतने भर से ही उसको संतोष हो जाता। लेकिन इस युद्ध ने सब मटियामेट कर दिया था। जो युद्ध में गए। वो वापस नहीं लौटे। लेकिन, सोफिया का दिल कहता था। उसका सौरभ एक दिन जरूर लौटेगा। उसका सौरभ उसको जरूर मिलेगा। सोफिया अपने सौरभ के प्रेम में दिनों दिन गलती जा रही थी। उसका खिला-खिला रहने वाला चेहरा मुरझाने लगा था।
वो जाड़े की एक दोपहर थी। जिस दिन वो खत उसको डाकिया थमा गया था। खत के मजमून देखकर वो वहीं धम्म से आँगन में पड़ी कुर्सी पर गिर गई। पुरानी टूटी हुई कुर्सी पर से संतुलन गड़बड़ाया और अचेत होकर गिरी तो टाईल्स से चोट लग गई। दो महीने अस्पताल में बिताया। ठीक हुई तो घर लौटी। सौरभ दुश्मनों से बहादुरी से लड़ता हुआ सियाचीन में शहीद हो गया था।
सोफिया की उम्र भी हो रही थी। माँ-पिताजी के बहुत जोर देने पर वो पहले तो तीन चार साल तक शादी के लिए तैयार ही नहीं हुई। लेकिन माँ-बाप की जिद के आगे उसकी एक ना चली और उसने सेना के एक अफसर मेजर राजीव से शादी कर ली। अभी चार साल पहले मेजर साहब भी दिवंगत हुए थे।
“दादी आप टी. वी. देख रहीं हैं, या आप आराम करेंगी।” सुनील ने टोका तो सोफिया की तंद्रा टूटी। घड़ी शाम के पाँच बजा रही थी।
सुनील ने गलती से चैनल बदल दिया। टी. वी. पर एक धुन तैर रही थी। ”कौन तुम्हें यूँ प्यार करेगा जैसे मैं यूँ करता हूँ!”







