ग्रंथि का बीज
पता है, हमारे दिमाग में कितनी ग्रंथियाँ होती हैं? कौन-सी कब सक्रिय हो जाए, यह कोई नहीं जानता। शायद मेरी भी कोई ग्रंथि सक्रिय हो गई थी, चुपचाप, बिना शोर किए। सब कुछ सामान्य था, फिर भी असामान्य लगने लगा। चेहरा वैसा ही था, पर आईने में कुछ बदल गया था।
कभी मैं वक़्त से आगे चलता था। अब वक़्त मुझे पीछे छोड़ रहा है। कल अचानक आंख के नीचे एक काले धब्बे जैसा कुछ दिखा— पहले लगा कुछ लगा होगा, फिर महसूस हुआ, यह थकान है। मेरे भीतर की थकान। उम्र जैसे छुपकर दस्तक दे रही हो।
मेरे अवचेतन में कुछ सपने थे—छोटे-छोटे, साधारण। किसी किताब के कवर पर नाम, किसी मंच पर दो मिनट का वक्तव्य, किसी स्त्री की आँखों में गर्व। पर हालातों ने सब काट डाला। एक-एक कर, जैसे कोई निष्ठुर माली कोंपलों को मसलता है।
मैं सोचता था, मुझसे मिलकर कोई मेरी उम्र का अंदाज़ा नहीं लगा पाएगा। लेकिन अब लगने लगा है— चेहरे की रेखाएं बोलती हैं, आंखें बोलती हैं, और सबसे ज़्यादा मौन बोलता है।
कुछ समय पहले तक, एक स्त्री थी मेरे जीवन में। शायद अब भी है, पर अब वह ‘प्रेमिका’ नहीं रही, और ‘मित्र’ शब्द दोनों के बीच बहुत छोटा है।
वह कहती थी, “प्रेम भी एक नशा है, जैसे रोटी, जैसे शराब।” वह आत्मा से प्रेम करने की बात करती थी। उसका कहना था— “अगर केवल जिस्म होता, तो सब किराए के होते। जब जिस्म की पूर्ति हो जाती है, तब यह किसका है, इससे क्या फर्क पड़ता है?”
उसकी बातें मुझे झकझोरती थीं। मैं कभी उसके तर्कों से सहमत नहीं होता, पर विरोध भी नहीं करता। शायद इसलिए कि मैं जानता था— वह सत्य कह रही है। हम सब अपने-अपने सत्य के कैदी होते हैं।
उसने कभी यह नहीं कहा कि वह मुझे चाहती है। पर यह भी नहीं कहा कि नहीं चाहती। हम संवादों के बीच की उस परत पर खड़े थे जहाँ शब्द नहीं, सिर्फ़ विराम मायने रखते हैं।
इस एक-डेढ़ साल में सब बदल गया है। वह बदल गई, मैं भी। अब संवादों में अधीरता है, और प्रतीक्षा में थकावट। मैंने एक दिन लिखा, “तुम पजेसिव हो।”
उसने जवाब दिया, “बहती हवा को कौन रोक सकता है। वैसे भी, अब तुम्हारा मुझ पर कोई हक नहीं।”
मैंने स्वीकार किया— हां, नहीं है। और शायद कभी था भी नहीं। प्रेम अगर अधिकार बन जाए, तो वह प्रेम नहीं रहता।
उस दिन बहुत देर तक कुछ नहीं लिखा। हम दोनों ‘टाइपिंग…’ में अटके रहे। फिर एक ही साथ चैट बंद कर दी।
आज जब आंख के नीचे का धब्बा देखा, तो वही बातें याद आईं। वह कहती थी, “तुम थक गए हो। तुम्हारा मन अब वही नहीं रहा। पहले जैसा कुछ भी नहीं बचा।”
मैं कहता, “नहीं, मैं अब भी वही हूँ। बस समय ने थोड़ी गर्त डाल दी है।”
उसने लिखा, “अब मैं तुमसे बात करना चाहती हूं, पर सिर्फ़ अपने बारे में। न सुब्रा की, न किसी और की। बस मैं, और मेरा मन।”
मैंने टाइप किया: “समय कभी लौटता नहीं। जो कह न सके, वही बचता है भीतर।”
उसने सिर्फ़ एक इमोजी भेजा— एक ब्लैक डॉट। शायद वही जो अब मेरी आंख के नीचे दिखता है
प्रेम, नशा और नैतिकता
प्रेम को लेकर हमारी धारणाएं कभी स्थिर नहीं रहीं। वह हर बार अपने एक नए रूप में सामने आया— कभी चुप्पियों में, कभी विरोध में, कभी आकांक्षा में।
वह साफ़ कहती थी, “मैं अब फिजूल की नैतिकता से विरक्त हो चुकी हूँ। जो मन कहे, वही करो।” पहले यह सुनकर मैं चौंकता था, अब केवल मौन साध लेता हूँ। शायद वह सचमुच बदल गई है, या शायद वही सच बोल रही है जिसे हम सब छुपाते हैं।
मैंने कहा था, “तुम्हें पता है? एक पेग पीकर सेक्स करने से टाइम ड्यूरेशन बढ़ जाता है।
“अच्छा”, उसने कहा।
“लेकिन यह ज़रूरी नहीं। सेक्स केवल जिस्म का नहीं होता, मन और आत्मा से भी होता है।“
“अगर सिर्फ़ जिस्म होता तो किराए की औरतें भी बहुत होतीं।”
वह बोलती चली जाती, मैं सुनता रहता। उसके स्वर में कहीं कोई पश्चाताप नहीं था। एक स्त्री, जो ज़िंदगी से बार-बार ठुकराई गई थी, अब अपनी परिभाषाएं खुद बना रही थी। वह सुचिता के पुराने चश्मे तोड़ चुकी थी। वह प्रेम को आत्मा का प्रसार मानती थी, न कि सामाजिक अनुबंध का पालन।
कभी-कभी वह बहुत स्पष्ट होती— “मुझे अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं, पर तुम्हारे होने का अर्थ अब भी है।” यह विरोधाभास मुझे भीतर तक तोड़ देता। हम दोनों एक-दूसरे की ज़रूरत नहीं रहे, पर एक-दूसरे का अर्थ अब भी थे। मैंने एक दिन पूछा, “अगर सब पुरुष एक जैसे होते तो मैं भी तुम्हारे युगल जैसा होता। पर तुम तो मुझे बाकी सब से अलग क्यों समझती हो?”
वह हँसी, “क्योंकि तुममें हिम्मत है स्वीकार करने की।” फिर थोड़ी देर रुककर बोली, “अब कोई मुझसे सुचिता की बात करे तो मैं बात का रुख बदल देती हूँ। सब मन का ही तो खेल है। मन शुद्ध नहीं, तो बाकी क्या?”
इन बातों में कहीं न कहीं एक अंतर्निहित पीड़ा थी, जिसे वह दिखाना नहीं चाहती थी। मैंने पढ़ा था— कभी-कभी अति-बोल्ड होना, बहुत गहरे घावों का स्वाभाविक कवच होता है। शायद वह भी उन्हीं में से थी।
उसकी बातें अब दार्शनिक हो गई थीं— “प्रेम इंसान को पवित्र बनाता है, अगर वह प्रेम हो। देह की भूख को प्रेम समझना सबसे बड़ी भूल है। और हाँ, जब प्रेम आत्मा तक पहुँचता है, तो शरीर बंधन नहीं लगता, वह माध्यम हो जाता है।”
मैं उसके शब्दों में खो गया। वह अब मेरे लिए केवल स्त्री नहीं थी। वह एक दृष्टिकोण थी— जिससे सहमत हुआ जा सकता था या असहमत, पर अनदेखा नहीं किया जा सकता था।
हमारे संवाद अब संवाद नहीं, जैसे आत्मा के पुनर्लेखन थे। कभी वह बोलती, “अगर अब भी चाहो, तो मैं हूँ, बस मन से पुकार लो।”
और मैं चुप रहता। क्योंकि जानता था, अब ‘होना’ और ‘मिलना’ दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं।
संवादों के भीतर का मौन
हमारे बीच संवाद अब भी होते हैं, लेकिन वे वाक्य नहीं रहे, बस संकेत बन गए हैं। एक अधूरा सन्देश, एक अधूरी तस्वीर, या कभी-कभी सिर्फ़ तीन बिंदु… ‘…’ उसने एक दिन कहा था, “तुम मुझसे बात करते हो पर अपने बारे में कुछ नहीं बताते।”
मैंने जवाब नहीं दिया। शायद मैं खुद अपने बारे में कुछ नहीं जानता। फिर अचानक बोला- “मेरी परछाईं भी अब मुझसे अपरिचित लगती है।”
“इतनी उलझन किसलिए, और ये चुप्पी?”
मैंने कहा, “ऐसा कुछ भी नहीं, बस देख रहा था तुम्हारा रिएक्शन,”
वह चुप हो गई। फिर लिखा, “तुम स्त्रियों को नहीं समझते। हम बहती हवा नहीं होते, हम मौन में भी स्पंदन रखती हैं।”
उसके शब्दों में एक स्पर्श था, जो अब भी भीतर उतरता चला जाता है। वह चुप थी, पर उसकी चुप्पी मुझसे संवाद करती थी।
मैंने एक रात उसे लिखा—“मुझे उससे स्नेह है… अथाह स्नेह। उससे मतलब, उस स्त्री से, जो अब मेरे जीवन में है।”
वह पढ़कर बहुत देर तक ऑनलाइन रही, फिर बस इतना लिखा, “मुझसे भी अच्छा मन है उसका… देख लो, अगर उससे प्रेम हो गया तब?”
मैंने लिखा, “वह ऐसी नहीं है।”
“अच्छा, फिर?”,
“फिर कुछ नहीं।“
उसी दिन उसने लिखा था, “तुमको नहीं पता, मैं तो वेश्या से भी बद्तर…”
“ओह, मतलब तुम्हारे युगल ने फिर कुछ खराब बोला?”
“उसका स्तर इतना ही है…”
ओह, और मैं?”
“कायनात में कोई जंचा नहीं एक तेरे सिवा, इससे ज्यादा क्या कहा जाए?”
मुझे काटने लगा यह आत्मग्लानि। यह संवाद नहीं था, आत्मनग्नता थी। वह खुद को हर दिन खोल रही थी मेरे सामने, जैसे आत्मा को बेपरदा कर दे कोई।
मैंने उसे रोकना चाहा, पर वह नहीं रुकी।
“अब कोई सुचिता की बात करे तो मैं बात का रुख बदल देती हूं। सब मन का ही तो खेल है। मन ही शुद्ध नहीं, तो बाकी क्या।”
मैं उसकी बातों को समझना चाहता था, पर शायद अब वह स्वयं भी उन्हें नहीं समझती। उसने अपने भीतर एक तर्कशास्त्र बसा लिया है जो अब किसी संवाद का मोहताज नहीं।
“तुमसे मिलकर मैंने जीना सीख लिया… और शायद दूर होकर भी…” वह कहती थी,
“एक स्त्री को अगर मुझसे मिलकर जीना आया, उसे कुछ नया दृष्टिकोण मिला”।
“वह बोल्ड हुई, तो ये संयुक्त उपलब्धि हुई।”
मैं चुप रहा। शायद यही मेरा पुरस्कार था।
एक दिन उसने कहा, “मेरे लिए शायद बात होना अभी भी महत्वपूर्ण है। एक दिन इस फेज़ से भी निकल जाऊंगी, तब पीछे मुड़कर भी नहीं देखूंगी।”
मैं डर गया। जैसे कोई अंतिम अध्याय की सूचना दे रहा हो।
फिर वह बोली, “तुम चाहते हो उसको भी, और मुझे भी। सुनो स्नेह होना अलग है। मेरी चाहत किसी प्रतिकार की मोहताज नहीं।”
मैं जानता था, उसका प्रेम बहुत उदार है, लेकिन अब वह थक चुकी थी।
“अब लाख चाहूं तो वह समय नहीं लौट सकता,” उसने लिखा।
मैंने उत्तर दिया, “मैं भी वही कह रहा था…”
“समझती तो तब भी थी, अब नहीं समझतीं। अब बस समर्पण बचा है।”
एक रात मैंने उसे लिखा, “अगर तुम होती तो कॉफी, लेखन और सेक्स—तीनों ही पूर्ण होते।”
वह हँसी नहीं, बस एक शब्द लिखा—“हूं तो।” फिर विराम।
हमारे संवादों का भविष्य अस्पष्ट है। लेकिन अतीत, वह अब भी हमारे बीच सांस लेता है। कभी उसकी टंकण से, कभी मेरी चुप्पी से, कभी दोनों के लॉगिन-लॉगआउट से।
शब्द कम हो गए हैं, लेकिन मौन के अर्थ गहरे होते जा रहे हैं। शायद यही हमारी ग्रंथियों की गिरहें हैं— जो खुलने के बजाय अब आत्मा में जम गई हैं।
एक स्त्री की यात्रा
वह कहती थी, “कभी-कभी अपने लिए जीना भी एक तरह की क्रांति होती है।” कभी वह पत्नी थी, कभी प्रेमिका, कभी बस एक आवाज़। अब वह इनमें से कुछ भी नहीं थी। वह स्वयं थी— अपनी अस्मिता के साथ, अपनी ग्रंथियों के साथ, और उन बातों के साथ जो अब वह किसी से नहीं कहती थी।
“मैं अब थक गई हूँ,” उसने कहा था, “पर कमजोर नहीं हुई हूँ।”
इस यात्रा में उसने बहुत कुछ त्यागा— अपने बच्चे, अपने पति, अपने स्त्रीत्व का सामाजिक संस्करण। लेकिन उसने पाया क्या? यह प्रश्न जब मैंने पूछा, वह हँसी।
“मैंने पाया खुद को। एक बार तो पाया। वह क्या कम है?”
उसका एक मित्र था— पुरुष मित्र अर्थात मैं। उससे बात करता, पूछता, उसकी राय लेता, लेकिन उससे भी प्रेम नहीं था, शायद हो भी, पर कहता नहीं था। मैंने एक दिन लिखा, “मैं अब भी चाहूँ तो मिल सकती हो?”
वह चुप रही। फिर लिखा, “हाँ, मिल सकती हूँ—but not for the reasons you think.”
उसे अब खुद को किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं थी। वह स्त्री जो कभी संवाद के हर मोड़ पर खुद को साबित करती थी, अब चुप रहना जान गई थी। अब उसकी चुप्पी ही उत्तर थी।
एक बार उसने लिखा, “तुम्हें याद है, जब मैंने कहा था कि मैं तुम्हारे बिना भी जी लूंगी? तब यह झूठ था। अब यह सच है।” उसकी इस यात्रा में कोई प्रेमी, कोई गुरु, कोई सहेली साथ नहीं चली— सिवाय उसकी अपनी परछाईं के। वह अब भी लिखती है। कहानियाँ नहीं, नज़्में नहीं— बस छोटे-छोटे काव्यनुमा वाक्य, जैसे आत्मा के स्केच।
“आज कॉफी पीते हुए लगा कि कोई पास बैठा है।” “बारिश में भीगती हूँ, ताकि आंसू छिप जाएं।” “अब कोई मुझे आदर्श न माने, मैं टूट चुकी हूँ।”
एक दिन उसने लिखा, “मेरी बेटी पूछती है कि मैं इतना चुप क्यों हूँ। क्या कहूँ? कैसे बताऊं कि मेरी चुप्पी ही मेरी कहानी है।”
अब उसकी यात्रा समाप्त नहीं हुई, लेकिन वह अब यात्रा के प्रारूप को समझ गई है। अब वह जानती है— हर पड़ाव पर उतरना नहीं होता, कभी-कभी बस आगे बढ़ते जाना होता है। वह अब किसी पुरुष की प्रतीक्षा नहीं करती। वह जानती है, आत्मा की खामोशी ही सबसे ऊँचा संवाद है। और प्रेम, अगर हो तो बिना आवाज़ के भी मौजूद रहता है।
विसर्जन और वापसी
एक दिन वह लौट आई। लौटना, मिलना नहीं होता। लौटना सिर्फ़ वह प्रक्रिया है जिसमें देह उपस्थित होती है पर मन अब भी कहीं और अटका होता है। वह लौट आई थी— अपने भीतर से, मुझसे, हमसे।
मैंने पूछा, “अब क्यों?”
उसने कहा, “क्योंकि अब जा सकूं, इसलिए।”
यह उत्तर था या उलझन, मैं नहीं जानता। लेकिन इतना ज़रूर समझ गया कि अब यह संबंध समर्पण नहीं, विसर्जन की ओर बढ़ रहा है।
हम बैठे थे— एक कॉफी शॉप में, जहाँ पहली बार भी मिले थे। वही मेज़, वही कप, वही खामोशी। फर्क बस इतना था कि इस बार न उम्मीद थी, न उत्साह।
मैंने कहा, “तुम पहले जैसी नहीं रहीं।”
उसने मुस्कराकर जवाब दिया, “तुम भी तो वैसे नहीं रहे। अब तुममें पागलपन नहीं रहा।”
मैंने पहली बार जाना कि परिपक्वता प्रेम का विकल्प नहीं, उसका विसर्जन है।
उसने कहा, “मेरी ज़िंदगी अब किसी पुरुष के इंतज़ार में नहीं अटकी। अब न कोई झुंझलाहट है, न चाहत।”
मैंने कहा, “पर चाह तो अब भी है।”
“हाँ, लेकिन अब वो तुम्हारे लिए नहीं। अब वो खुद के लिए है।”
मैंने उस दिन कोई बहस नहीं की। बस उसके बालों की लटों को देखा जो पहले की तरह माथे पर गिर रही थीं। लेकिन अब उसमें छेड़ने जैसा कुछ नहीं था। अब उसमें सिर्फ़ स्मृति थी।
हमने बिल बाँटा। कुछ नहीं कहा। लौटते समय उसने एक वाक्य कहा जो मेरे भीतर अब भी गूंजता है— “तुमसे मिलना अच्छा था, पर अब और अच्छा है कि हम फिर कभी नहीं मिलेंगे।” वह लौट गई। लेकिन उसकी चुप्पी अब भी मेरे कमरे में रहती है। उसका आत्मविश्वास मेरे भीतर खालीपन बनकर गूंजता है। मैं उसके जाने को कोई त्रासदी नहीं मानता।
यह उसका विसर्जन था। और शायद, मेरी वापसी। खुद की ओर।
अंतिम गिरह
कुछ रिश्ते इतने धीमे सुलझते हैं कि गिरहें खुलती नहीं, बस ढीली पड़ती जाती हैं। और हम समझते रहते हैं कि अब वह खुल ही जाएगी। वह अंतिम बातचीत कोई ‘विदा’ नहीं थी। बस एक पड़ाव था, जहाँ हम दोनों अपनी-अपनी राहों पर बढ़ गए— बिना किसी औपचारिक अलविदा के।
मैंने उसके भेजे आख़िरी संदेश को कई बार पढ़ा:
“तुम जैसे थे, वैसे ही रहना। मैं अब और बदलना नहीं चाहती, और न तुम्हें बदलते देखना।”
उसके बाद से मौन स्थायी हो गया। पहले दिन, फिर हफ्ता, फिर महीने…
समय बीतता गया। मैंने लिखना बंद नहीं किया, पर अब शब्दों में वह ताप नहीं था। वह मुझसे नहीं लड़ती थी, न ही खुद से। उसने संघर्ष छोड़ दिया था। मैंने जिज्ञासा। एक शाम वह एक साझा परिचित की तस्वीर में दिखी— हल्की मुस्कान, साधारण कपड़े, और आंखों में कोई वादा नहीं।
मैंने उस तस्वीर को न लाइक किया, न कुछ महसूस किया। शायद यही वह बिंदु था जहाँ आत्मा ने अपने हिस्से का मोह विसर्जित कर दिया था। पर एक बात रह गई थी— वह छोटी-सी कॉफी शॉप जहाँ हम आख़िरी बार मिले थे। मैं वहाँ फिर गया। वही मेज़, वही खामोशी, पर अब वहाँ कोई स्मृति नहीं थी। बस हवा चल रही थी।
मैंने एक खाली कप के सामने बैठकर खुद से कहा— “कुछ लोग हमारी आत्मा में नहीं, समय में अटक जाते हैं। समय बदलता है, वे छूट जाते हैं। यह उनका दोष नहीं, हमारी प्रवृत्ति है।”
एक दिन एक मेल आया—उसका नहीं, उसकी बेटी का। विषय था: “वह अब नहीं रही।” मैंने मेल खोलने की हिम्मत नहीं की। बस एक ही पंक्ति पढ़ी:
“उसने जाते-जाते कहा, मेरे पास सब था, पर जो मैंने खोया वही मैं थी।”
उस रात मैंने बहुत देर तक चुप्पी में खुद से बात की। कोई आंसू नहीं निकला। कोई पछतावा नहीं। बस एक स्मृति की गांठ थी, जो अंततः खुल गई थी।
यही थी अंतिम गिरह। और शायद, मुक्ति भी।







