करीब 80 वर्षों के राजस्थानी सिनेमा के इतिहास में पहले की कुछ फ़िल्मों को छोड़ दिया जाए और खास तौर से हाल के बीते दो दशकों में नज़र डालें तो अंगुली पर गिनने लायक शायद ही कायदे की कोई राजस्थानी फ़िल्म होगी। हमारे राजस्थान के सिनेकारों कायदे से उन्हें सिनेकार कहना भी ग़लत है। तो सुनिए तथाकथित मुंहबोले सिनेकारों सैकड़ों दफा मैं आपसे गुजारिश कर चुका हूं कि आप सिनेमा बनाना बंद करके पहले सिनेमा देखना शुरू करें ठीक से। और न सही तो राजस्थान के सिनेमा के मामले में सत्यजीत राय कहे जाने योग्य शैदाई सिनेकार आपके पास मौजूद है ‘दीपांकर प्रकाश’, उन्हीं से कोई सिनेमा का क, ख, ग़ सीख लेंगे तो यहां के सिनेमा का उद्धार स्वत: हो जाएगा। यहां के निर्माताओं, निर्देशकों के सामने कहना भैंस के आगे बीन बजाना।
खैर राजस्थानी सिनेमा के हालिया इतिहास में ‘ शांतिनिकेतन’ (shantiniketan) ऐसी फ़िल्म साबित होती है जिससे लाड लड़ाया जा सकता है। कहानी है एक आम घर की जिसमें रवि के मां बाप नहीं रहे और छोटा भाई शादी के बाद बाहर चला गया। घर में रह गई दादी, एक बेसुध सा, पगलाया दादा और ऐसी ही बुआ। बुआ जिसके बच्चे नहीं हुए और पति की मौत के बाद वह अपने में ही गुमसुम रहती है। ऐसे में पूरे परिवार की जिम्मेदारी है रवि और उसकी बीवी पर। बीवी पूरे दिन घर में खटती रहती है तो रवि पारिवारिक उलझनों के साथ ऑफिस में। आम घरों की कहानी से आप और क्या ही उम्मीद रख सकते हैं इससे ज्यादा घटित होने की। कायदे से ऐसी फिल्मों की कहानी कुछ नहीं होती और कुछ न होकर भी बहुत कुछ होती है। यही तो सिनेमा है जहां कुछ नहीं है वहां सबकुछ है और जहां सबकुछ है वहां कुछ नहीं।
कई फिल्म समारोहों में ईनाम बटोर चुकी यह फ़िल्म उस इलाके के माथे का टीका बन जाती हैं जहां का इलाका रेतीले पहाड़ों में फंसा हुआ है। ऐसी ही रेतीली जमीन से इतना उपजाऊ सिनेमा कोई निकाल लाए तो क्या आप उसे लाड़ लड़ाए बिना रह सकते हैं? हरगिज नहीं। ऐसा नहीं है कि यह फ़िल्म केवल आम घर की कहानी दिखाती है बल्कि यह उसके साथ-साथ पितृसत्तात्मक समाज और मातृ सत्ता के बीच के अंतर्विरोध को भी दर्शाती है। जहां एक और पुरुष दिन भर बाहर खटने के बाद जिंदगी की उलझनों में उलझकर घर में अपनी पत्नी पर हाथ उठाता है। और दूसरी और मातृ सत्ता जो दिन भर ऐसे परिवारों में रहते हुए खुद की इच्छाओं को समाप्त कर घर को बनाए रखने में लगी हुई हैं।
यह फ़िल्म पितृ और मातृ दोनों सत्ता पक्षों के साथ भरपूर न्याय करती है। यह कोई उपदेश नहीं देती अपितु हकीकत को और असल जिंदगी को पर्दे पर उकेरते चलती है। पहले ही सीन के साथ जब फ़िल्म पेंटिंग बनाना शुरू करती है तो उस सिनेमाई पेटिंग से निकलकर कुंदन ही बन जाते हैं ऐसे सिनेकार और उससे जुड़ी तमाम टीम। सिनेमा की बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने में लगे हुए दीपांकर प्रकाश मांझी की याद दिलाते हैं जिसकी कहानी हम सभी ने मांझी द माउंटेनमैन में देखी है। बतौर निर्देशक मैं हमेशा दीपांकर की पीठ थपथपाता रहा हूं। गर्व कीजिए ऐसे निर्देशकों पर और उनकी टीम पर।
आदित्य शर्मा की असल जिंदगी को जीते हुए नीरज सैदावत हरेक सीन में आपसे वाहवाही लूटते जाते हैं। नीरज की अभिनय अदायगी को देखते हुए आपको उन्हें मोहब्बत होने लगती है। तो वहीं नंदा यादव बीवी के किरदार में इतनी घुल गई हैं कि उनके चेहरे के हरेक हावभाव से वे पीड़ित और घुटती हुई बीवी नजर आती है। उषा श्री, रमन कृष्णात्रैय, सरस्वती उपाध्याय राजस्थानी सिनेमा के साथ-साथ कला जगत के वे तराशे हुए हीरे हैं जिनके होने मात्र से किसी भी फ़िल्म में प्राण फूंके जा सकते हैं। बीच-बीच में आने वाले एजाज खान, निकिता वर्मा, ओम, श्वेता रघुवंशी, आदित्य शर्मा, मालूश्री मलिक, प्रियंका शर्मा मिलकर फ़िल्म को गति नहीं प्रदान करते अपितु इस बात की प्रमाणिकता सिद्ध करते हैं कि वे कहानी के अहम किरदारों में ही घुले मिले हैं।
लेखक, निर्देशक दीपांकर प्रकाश के बनाए हरेक सिनेमा से आपको हर बार कुछ और हटके देखने को मिलता है। ऐसी फ़िल्में बनाने वाले निर्देशकों के हाथों को चूमने के साथ-साथ निर्माता अजीत सिंह राठौड़, माइकल ग्रोब के हाथों को जरूर चूमना चाहिए कि उन्होंने राजस्थानी सिनेमा को बनाए, बचाए रखने का बीड़ा उठाया हुआ है। कहानी आदित्य शर्मा की असल जिंदगी है लिहाजा फ़िल्म भी फ़िल्म न रहकर असल जिंदगी ही बनकर उभरती है। जिसके हरेक सीन से आप उसे जीते हुए देखते हैं। दीपांकर प्रकाश के स्क्रीनप्ले में कसावट हमेशा से रही है, जो इस फ़िल्म में भी दिखाई पड़ती है। एक किस्म का ठहराव उनकी फ़िल्मों में देखने को मिलता रहा है। जैसे किसी चीज की कोई जल्दी नहीं उन्हें।
विहेक चौहान का साउंड रिकॉर्डिंग और पुनीत धाकड़ की सिनेमैटोग्राफी फ़िल्म को दर्शनीय ही नहीं बनाती बल्कि आपको यह एक ही फ़िल्म कई बार देखने को उकसाती है। कलरिंग से लेकर एडिटिंग और कास्ट्यूम में अंकिता शर्मा, निकिता वर्मा के द्वारा की गई कॉस्ट्यूमिंग इसे और अधिक सच के करीब लाती है।
अभी भी समय है उठो, जागो और तब तक दीपांकर प्रकाश का बनाया सिनेमा देखने के साथ-साथ कुछ अच्छी फ़िल्में देखते रहो जब तक आप यहां के सिनेमा को बचा न लें। वरना लाड़ लड़ाने को एक दीपांकर ही राजस्थान में बतौर निर्देशक आपके पास बचेगा। एक- न-एक दिन यह बंदा अपने बनाए सिनेमा से राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीतने के साथ-साथ राजस्थानी सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवश्य चर्चित बना देगा। इसकी पुष्टि शांतिनिकेतन करती है। जब भी जहां भी ऐसी फ़िल्में या शांतिनिकेतन फ़िल्म देखने को मिले लाड़ जरूर लड़ाइएगा। हालांकि फ़िल्म पूरी देख लेने के बाद इसके नाम से आपको आपत्ति हो सकती है कि जब पूरे घर में एक क्षण को भी शांति नहीं तब ऐसे में इसका नाम शांतिनिकेतन रखना कितना जायज़ है। किंतु यह फिल्म जितनी गहरी है उतना ही गहरा इसका नाम भी। ऐसी फ़िल्में बहस का मुद्दा बनती हैं और समाज को सार्थक दिशा प्रदान करने के साथ ही कुछ आपके भीतर शून्य छोड़ जाती है जिसका असर भी इतना गहरा होता है कि वह सालों तक आपको भीतर पिघलाता रहे। ऐसी फ़िल्में पुरस्कारों के योग्य हैं खास तौर से राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से ऐसी फ़िल्मों को अवश्य नवाजा जाना चाहिए।
अपनी रेटिंग – 4 स्टार







