‘उम्मीद की तरह लौटना तुम’ कवि, ग़ज़लकार, कथाकार, व्यंग्यकार और संपादक पंकज सुबीर का सद्य: प्रकाशित काव्य संकलन है। ‘यही तो इश्क है’ उनका गज़ल संग्रह है। ‘देहगाथा’ लंबी कविता है। ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’, ‘महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ’, ‘कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन’, ‘चौपड़े की चुड़ैल’, ‘होली’, ‘प्रेम’, रिश्ते’, ‘ हमेशा देर कर देता हूँ मैं’ ‘खैबर दर्रा’ उनके कहानी संग्रह हैं। ‘ये वो सहर तो नहीं’, ‘अकाल में उत्सव’, ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था’ और ‘रूदादे सफर’ उनके उपन्यास हैं। ‘बुद्धिजीवी सम्मेलन’ व्यंग्य संग्रह है।
‘उम्मीद की तरह लौटना तुम’ में प्रवेश, प्रकृति, प्रेम, प्रारूप, प्रतिरोध शीर्षकों के अंतर्गत एक सौ दस कवितायें हैं। सृजन का मूल अपनों को खो देने की वेदना है। पिता की मृत्यु पर कवि को लगता है, मानों अंदर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर खो गया है। इसी जनून अवधि के तीन- चार महीनों में इस काव्य संसार को आकार मिला है।
पुस्तक का आरंभ महापर्याण की कविताओं से, अपनों की अनंत की यात्राओं के साथ होता है। एक व्यथा है, जो कवि को दार्शनिक बना रही है। एक पीड़ा, जिसने चिंतक बना दिया है। मरने से बहुत पहले ही मृत्यु की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और आदमी रोज़ थोड़ा- थोड़ा मरने लगता है, मानों एक ब्लैक होल उसे अपने अंदर खींच रहा हो। ब्लैक होल/ कृष्ण विविर की आवाजें किसी मंत्र की तरह गूँजती हैं। मानों कहती हैं- कब तक रुकोगे, आगे जाना है और व्यक्ति प्रिय जन और प्रिय वस्तुएं छोड़ चल देता है-
चाबियाँ बची रह जाती हैं
ताले खो जाते हैं…..
किसी गुच्छे में
एक जंग लगी संभावना के रूप में। 1
जैसे शरीर के साथ परछाई रहती है, वैसे ही जन्म के साथ मृत्यु है-
हम जितना रोशनी में आते हैं
उतनी ज्यादा गहरी होती है परछाई
हमारी जन्मना साथी होती है
वह परछाई- मृत्यु। 2
पिता पुत्र का रिश्ता विचित्र होता है, विपक्ष का, बहस का। पिता ऊपर से बेटे का पक्ष नहीं लेते, पर अंदर से हर क्षण उसके समर्थन के लिए तत्पर रहते हैं। जताते नहीं, पर दूसरों से बेटे के बारे में बहुत गर्व से बात करते हैं। पिता एक दिन चल देते हैं- चुपचाप- मानों युगों की थकान से मुक्त हो जाते हैं और एक गंध बची रह जाती है पिता की। बेटा पुकारता रह जाता है-
सुनो पिता… लौट आओ…
कोई अस्तित्व नहीं होता ज्ञान का
विमर्श, बहसों, वाद- विवाद और खंडन के बिना। 3
पुस्तक का शीर्षक ही आशावादी है- उम्मीद की तरह लौटना तुम । कवि मानता है कि मृत्यु रात्रि का अंधकार ही नहीं है, सृजन की ज्योति भी इस में समाई है। जीवन गति है। विस्मृति इसका अभिन्न अंग है। धीरे- धीरे विगत धुंधला होता जाता है और वर्तमान सत्य।
पचास पार के आदमी की स्थिति संक्रमण काल सी होती है। उसके एक ओर शिथिल हो रही पूर्व पीढ़ी और दूसरी ओर गतिशील युवा पीढ़ी- उसकी सारी शक्ति सामंजस्य बिताने में ही लग जाती है। क्षिप्रगति समय की गति पकड़ना धीरे- धीरे कठिन होता जाता है।
स्त्री- पुरुष की मानसिकता पर कवि कहता है-
बहुत फर्क होता है
किसान और धरती में
पुरुष और स्त्री में
पिता और माँ में। 4
स्त्री अपनी सारी थकान, दुख, अवसाद को भूलने का जादू जानती है। सलीब की तरह घर को कंधों पर उठाए रखती है। कम्प्यूटर की एक साथ अनेक काम करने की प्रक्रिया और शक्ति के मूल में शायद स्त्री का ही आदर्श और प्रेरणा रहे हैं। घर का बिम्ब स्त्री से ही बनाता है। पुरुष की हर ज़रूरत पर स्त्री उसके साथ रहती और पुरुष ज़रूरत पड़ने पर स्त्री के प्रति अनासक्त हो जाता
है।5
सम्बन्धों की बात करता कवि कहता है कि माँ रिश्तों में जीती है, उन्हें बांधती- बचाती है, जीवंत रखती है।
जीवन निकष देता एक कवि, एक चिंतक हर कविता में बैठा है। चाहे वह सर्दी, बसंत, गर्मी, वर्षा – ऋतु चक्र की बात करे, सर्द फरवरी, बसंती मार्च, या नवांकुरित अप्रैल की बात करे या पर्यावरण संरक्षण की बात करे।
पहले प्रेम की स्मृतियाँ, फ्लैश बैक, स्वप्न, सूखे पत्तों में भी हरियाली भरने वाला प्रेम का जादू, प्रेम की अवसाद में परिणति का भी यहाँ चित्रण है। पृथ्वी पर प्रेम के लिए थोड़ी सी भी जगह न मिलने पर प्रेमी मन प्रेम की अनंत यात्रा के लिए किसी पुंच्छल तारे पर सवार हो मंगल ग्रह पहुँचने की कल्पना करता है। प्रेम बीतकर भी नहीं बीतता, केवल अपना स्वरूप बदल लेता है। प्रेम को परिभाषित करता कवि कहता है-
दूसरों की रोशनी, दूसरों की खुशी
दूसरों के ताप, दूसरों के सुख में
जो अपने को चमका ले
वही प्रेम होता है। 6
ठीक उस चाँद की तरह, जो अपनी चमक, रोशनी सूर्य से लेता है। प्रेम इन्द्र धनुष का आठवाँ रंग है।
कवि मानता है कि धर्म और राजनीति दोनों का कारोबार भीड़ से चलता है और दोनों को खतरा उन लोगों से है, जो भीड़ से अलग होते हैं। इतिहास नायक- खलनायक से बनता है। बुद्ध, गांधी, हिटलर, मुसोलिनी से बनता है। आम आदमी को भीड़ शब्द लिख छोड़ दिया जाता है। चारण, भाट किसी तानाशाह की विरुदावली गाने वाले विदूषक ही होते हैं। प्रश्न है कि क्रूरता, हिंसा, अहंकार, घृणा, नृशंसता, युद्ध, बर्बरता बची रहेगी अथवा करुणा, प्रेम, मानवता, अहिंसा- दोनों में से शाश्वत क्या है? आक्रोशित कवि ईश्वरीय मौन पर प्रश्न चिन्ह लगाता कहता है-
तुम उस समय बिलकुल चुप थे
जब बहुत आवश्यक था तुम्हारा बोलना,…
क्या अनुमान लगाया जाये तुम्हारे बारे में
कि तुम गूंगे हो ?
ऐ अदृश्य ईश्वर। 7
गंगा- जमुनी संस्कृति की ईद की सेवईयाँ और दीपावली के दीप यहाँ एक साथ मिलते हैं। ज़हीर हसन, नफीसा सिस्टर, अदनान मंजूर, हम्मास दुर्रानी, गुरु नानक, राधा- कृष्ण, शैलेंद्र, अशोक पाण्डेय, सुधा, ओम, यतीन्द्र मिश्र, शहरयार फातिमा- के नाम/ संदर्भ/ संबंध/ अपनापा एक साथ आए हैं।
चिंतन सूत्र बन जाये तो कोई आश्चर्य नहीं। जैसे –
1. प्रगति असल में एक प्रक्रिया है नष्ट करने की। 8
2. ऊंचाई असल में एक दृष्टि भ्रम ही है। 9
3. प्रेम इकाई से अनंत की ओर बढ़ता रहता है लगातार। 10
4. संभावना, विस्मय और नमक- तीनों ज़रूरी हैं जीवन के लिए। 11
5. उम्मीद का पूरा होना उतना मायने नहीं रखता, जितना उम्मीद का होना रखता है। उम्मीद बाकी रहे तो ज़िंदगी चलती रहती है। 12
6. बहुत गुणी आदमी, बहुत ज्ञानी व्यक्ति, बहुत अकेला होता है। 13
भले ही आरंभिक कविताओं ने पिता के देवलोक प्रस्थान से उपजी पीड़ा से जन्म लिया हो, लेकिन इसमें पारिवारिक और अर्जित सम्बन्धों की, स्नेह और लगाव की कवितायें भी जुड़ती गई हैं। एक आशावाद- उम्मीद की तरह लौटना तुम- क्योंकि मृत्यु रात्रि का अंधकार नहीं है, सृजन की ज्योति भी इस में समाई है। प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरण संरक्षण, धर्म और राजनीति, संस्कृति और मानवता के प्रति कवि संवेदनशील है। वायवी कल्पनाएं और दार्शनिक चिंतन- दोनों यहाँ समाहित हैं।





