જેસલમેર
મરુથલે મોતીમઢયું આ નગર,
એને ટોડલે મોર અને ભીતે ફરે હાથી,
Name: विनोद जोशीविनोद जोशी भारत और विदेशों में गुजराती भाषा के प्रशंसित और व्यापक रूप से स्वीकृत प्रशिष्ट कवि है। 13 अगस्त, 1955 में जन्मे विनोद जोशी ने भावनगर के महाराजा कृष्णकुमारसिंहजी विश्वविद्यालय में गुजराती अनुस्नातक विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और कुलपति के रूप में भी उसी विश्वविद्यालय का नेतृत्व क
विनोद जोशी भारत और विदेशों में गुजराती भाषा के प्रशंसित और व्यापक रूप से स्वीकृत प्रशिष्ट कवि है। 13 अगस्त, 1955 में जन्मे विनोद जोशी ने भावनगर के महाराजा कृष्णकुमारसिंहजी विश्वविद्यालय में गुजराती अनुस्नातक विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और कुलपति के रूप में भी उसी विश्वविद्यालय का नेतृत्व किया। उन्होंने 2008 से 2012 तक केन्द्रीय साहित्य अकादमी में भारत की गुजराती और पश्चिमी क्षेत्र की भाषाओं के संयोजक के रूप में कार्य किया और 2018 से 2022 के कार्यकाल के लिए वह फिर से उसी पद पर नामांकित हुए।
उनकी 40 से अधिक पुस्तकें हैं। उन्होंने मुख्य रूप से कविता, कथा और आलोचना के क्षेत्र में काम किया है। विनोद जोशी की अधिकतर कविता ग्रामीण जीवन की छवियों से, विशेष रूप से स्त्री भावनाओं के चित्रण से मंडित है । स्त्री भावनाओं की सूक्ष्मरूप से व्यक्त सुरुचिपूर्ण और संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिए उन्हें समीक्षकों द्वारा बहुत ही सराहा गया है। उनकी कविता में गहन भावसृष्टि और तत्त्वार्थ का सामर्थ्यपूर्ण सामंजस्य और नूतन व्यंजनात्मक भाषारूप दिखाई पड़ता है । मनुष्य के भावजगत को उन्होंने अपने गीतों में उत्कृष्ट रूप से ढाला है । परंपरा के भारतीय साहित्य के अनुशीलन से उन्होंने अपनी कविताओं को नवता प्रदान कर एक प्रशिष्ट उंचाई तक पहुंचाई है ।
कविताओं का उनका पहला संग्रह 'परंतु' 1984 में कविलोक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया था। इसके बाद 1985 में प्रकाशित हुई दीर्घ कथात्मक कविता 'शिखंडी' संस्कृत छंदों में लिखी गई उनकी रचना है जो शिखंडी और भीष्म के मौलिक मनोसंचलन से संबंधित है । 'तुण्डिल-तुण्डिका' (1987), एक और दीर्घ कथाकविता, आधुनिक शैली में मध्यकालीन गुजराती पद्यवार्तारूप का नव्य निर्माण है । 'झ़ालर वागे जूठड़ी' (1991), ‘खुल्ली पांखे पिंजरमां’ (2023) विनोद जोशी का सबसे पसंदीदा और बहुप्रशस्त कविता संग्रह है।
'सैरन्ध्री' (2018) उनका एक अत्यधिक प्रशंसित प्रबंध-काव्य है जिसे महाभारत की द्रौपदी को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। यह दीर्घ कविता 7 सर्ग, और 49 खंड में निबद्ध हैं। अज्ञातवास के दौरान सैरन्ध्री बनी द्रौपदी के मौलिक मनोसंचलन और भावनाओं की अब तक एक अस्पृष्ट रही दुनिया चोपाई और दोहरा जैसे छंदों के माध्यम से इस प्रबंध-काव्य में बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत की गई है । भारतीय भाषाओं के काव्य साहित्य में एक अनूठी प्रशिष्ट रचना के रूप में 'सैरन्ध्री' विख्यात है। इसके हिन्दी, ऑडिया और तेलुगु अनुवाद प्रकट हुए है जिसका नृत्यनाट्य रूपांतरण गुजरात साहित्य अकादमी ने प्रकट किया हे जो नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने आंतर राष्ट्रीय रंगमंच पर अभिनीत किया है ।
विनोद जोशी को 2013 में कवीश्वर दलपतराम पुरस्कार से और 2015 में गुजरात साहित्य अकादमी द्वारा साहित्य गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी साहित्यिक आलोचना की पुस्तक 'निवेश' (1994) को गुजराती साहित्य परिषद द्वारा स्थापित रमणलाल जोशी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2012 में, प्रसार भारती अहमदाबाद दूरदर्शन द्वारा गिरनार साहित्य शिरोमणि पुरस्कार से सम्मानित होने वाले वह पहले साहित्यकार थे। उन्हें उमाशंकर जोशी अवार्ड (1986), जयंत पाठक कविता पुरस्कार (1984), क्रिटिक्स अवार्ड (1986), झवेरचंद मेघाणी पुरस्कार (2011), राष्ट्रीय कला केंद्र पुरस्कार (2014), और गुजरात कला प्रतिष्ठान के कलारत्न अवार्ड (2016) से भी सम्मानित किया गया हैं। गुजराती कविता में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 2018 में गुजराती कविता का सर्वोच्च सम्मान 'नरसिंह मेहता अवार्ड' दिया गया था। प्रबंध-काव्य 'सैरन्ध्री' के लिए उनको भारतीय विद्या भवन, मुंबई द्वारा समर्पण सम्मान (2018) से से और गुजराती कविता में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारतीय राष्ट्रीय रंगमंच (INT) द्वारा कलापी पुरस्कार (2018) से सम्मानित किया गया है । गुजरात साहित्य अकादमी द्वारा 'सैरन्ध्री' और 'निर्विवाद' को 2018 की सर्वश्रेष्ठ कविता और सर्वश्रेष्ठ आलोचना का सम्मान भी दिया गया है । ‘सैरन्ध्री’ को नर्मद सुवर्ण चंद्रक (2022) और गुजराती साहित्य परिषद के उशनस् पारितोषिक (2022) का सम्मान भी दिया गया है। 'सैरन्ध्री' के लिए उनको केन्द्रीय साहित्य अकादेमी के राष्ट्रीय पुरस्कार (2023) से सम्मानित किया गया है।
उन्होंने गुजराती भाषा के एक भारतीय कवि के रूप में चीन, जापान, केन्या, इंग्लेन्ड, अमरिका, यू.ए.ई., थाईलेन्ड, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीश्यस, केनेडा आदि कई देशों में भारतीय साहित्य के प्रतिनिधि के रूप में या आमंत्रित कवि के रूप में भाग लिया है। उनकी कविताओं को अधिकांश गायकों और संगीत कलाकारों ने व्यापक रूप से गाया है। उनके प्रबंध-काव्य 'सैरन्ध्री' को भारत और विदेशों में कई स्थानों पर आमंत्रित दर्शकों के सामने एक संगीत-नृत्य-नाटक के रूप में भी प्रदर्शित किया जा रहा है।
विनोद जोशी अनुआधुनिक गुजराती के समय के एक व्यापकरूप से स्वीकृत प्रशिष्ट कवि है।
જેસલમેર
મરુથલે મોતીમઢયું આ નગર,
એને ટોડલે મોર અને ભીતે ફરે હાથી,
