वर्तमान समय न केवल घटनाओं का, बल्कि प्रतिक्रियाओं का इतिहास भी लिख रहा है और दुर्भाग्य से मौन हमारी सबसे स्थायी प्रतिक्रिया बनता जा रहा है। कहने को तो चारों ओर सूचनाओं का अंबार है, टीवी पर बहसों का शोर है, सोशल मीडिया में करोड़ों लोगों की डिजिटल सक्रियता का भ्रम है; लेकिन इन सबके मध्य कहीं एक गहरी उदासीनता भी पसरी हुई है। क्या हम एक मृत समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं?
परिदृश्य में दो समानांतर धाराएं चल रही हैं। एक ओर सोनम वांगचुक सरीखे लोग हैं जो शांतिपूर्ण आग्रहों और अनशन के माध्यम से व्यवस्था से संवाद की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर देश में हत्या, आगजनी, दुष्कर्म, हिंसा जैसे बढ़ते जघन्य अपराध हैं; जो हमारी सामाजिक संरचना को भीतर से खोखला करते जा रहे हैं। इन दोनों ही परस्पर विपरीत स्थितियों में एक चीज समान है और वह है, जिम्मेदार लोगों की चुप्पी!
अनशन, कोई ड्रॉइंग रूम में लगी बैठक नहीं है। यह शब्दों के समाप्त या अर्थहीन हो जाने के बाद जन्मी भाषा है। यहाँ व्यक्ति स्वयं के ही शरीर को माध्यम बनाकर कोई जरूरी माँग ही नहीं रख रहा होता बल्कि वह समाज की सोई हुई चेतना को झकझोरने की कोशिश भी कर रहा होता है। सोनम वांगचुक का संघर्ष इसी श्रेणी में आता है। यहाँ मुद्दे क्षेत्रीय नहीं, व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं।
दुखद है कि ऐसी स्थिति में भी अपनी-अपनी विचारधारा और राजनीतिक रुझान के अहंकार में लिप्त लोगों को अनशन जैसी गंभीर अभिव्यक्ति भी विचलित नहीं कर पाती! यह व्यवस्था की विफलता तो है ही, साथ ही समाज की सुन्नता की ओर भी इंगित करती है।
आपराधिक घटनाओं के प्रति भी हमारा व्यवहार कैसा है? हम उन्हें पढ़ते हैं, देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। जैसे वह किसी और ग्रह की घटनाएं हों। संकट यही है कि अब हमने “अपराध” को संभावित खतरे के रूप में न देखते हुए “घटना” के रूप में स्वीकार कर लिया है! इसी कारण अब सारे अपराध एक भयावह सामान्यीकरण का हिस्सा बनते जा रहे हैं। पहले तो हम अपने चारों ओर एक मानसिक कवच बना लेते थे, फिल्मों में भी हिंसक दृश्य हों तो आँखें मूँद लेते थे कि दर्द को महसूस न करें, उससे विचलित न हों। यह जो पहले बचाव की राजनीति थी, अब आदत बन चुकी है। इसने हमारी कोमलता, समानुभूति को भी क़ैद कर लिया। जिस समाज की विविधता में एकता, अखंडता पर हम इठलाते फिरते थे, जो हमारे साझा अनुभवों का जीवंत ताना-बाना था; वह अब स्वनिर्मित टापुओं में बिखर चुका है। अब हम हर घटना को राजनीतिक, सामाजिक, व्यक्तिगत श्रेणियों में डालकर तौलते हैं। हिसाब लगाकर, स्वयं को उससे अलग कर लेते हैं। भले ही यह दूरी हमें मनुष्य होने की नैतिक जिम्मेदारी से मुक्त कर देती है!
हम अपनी ही चिंताओं से भरे हुए लोग हैं, जो देखते हुए भी अनदेखा करते हैं, सुनते हुए भी झटक दिया करते हैं, जानते हुए भी अनजान बनने का ढोंग रचते हैं और मन-ही-मन बुदबुदाते हैं कि “की फरक पैंदा है!” क्योंकि दर्द अब अनुभव नहीं, सूचना बन गया है। उसे समाचार की तरह लिया जाने लगा है।
प्रायः चुप रहने को “तटस्थ भाव” कह दिया जाता है पर यह सोच ही खतरनाक है। तटस्थता निष्पक्ष नहीं होती, बल्कि शक्तिशाली के पक्ष में अधिक खड़ी होती है। इसका अर्थ ही, हो रहे अन्याय को वैधता देना है।
तो क्या हम यही दर्शक भर बन रहे हैं? हमारी दुनिया व्यक्तिगत चिंताओं तक ही सीमित रहेगी? आगे बढ़ने की और आकाओं को खुश रखने की दौड़ में हम अपनी बची-खुची करुणा भी खो देंगे? क्या हम सचमुच इतने स्वार्थी, संवेदनहीन और खोखले हो चुके हैं कि किसी की पीड़ा को आसानी से स्क्रॉल कर आगे बढ़ जाते हैं? क्या हम दर्पण में अपनी सामूहिक छवि देखने लायक बचे हैं?हाँ, यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक संघर्ष में भागीदारी संभव नहीं होती परंतु उदासीनता भी विकल्प नहीं है। समाज की शक्ति, उसकी सामूहिक प्रतिक्रिया में ही निहित होती है।
सच यही है कि हम भय के कारण चुप हैं, हम उस “टैग” के कारण चुप हैं जो किसी भी पक्ष में खड़े होने पर हमें लगा दिया जाएगा! हमें सच के साथ नहीं, अपने राजनीतिक रुझान के साथ खड़े होना है! हमने दुनिया की समस्याओं, दुर्घटनाओं, वीभत्स अपराधों को समझने की कला विकसित कर ली है।
हम देश नहीं, कुछ खास व्यक्तियों के प्रति इतने समर्पित होते जा रहे हैं कि कहीं हत्या होती है, कहीं घर जलते हैं कहीं किसी की अस्मिता से खेला जाता है, नामी लोग गाली-गलौज करते हैं; पर हम अपनी त्वरित टिप्पणी देने में झिझकते हैं! हमें तो पहले अपराधी का नाम, धर्म, जाति और राजनीतिक जुड़ाव पता करना होता है। फिर सब सुविधानुसार हुआ तो ही मुँह खोला जाएगा। हम भीतर से मर जो चुके हैं।







