ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
ऐ मुसव्विर कि जो पिन्हां तेरी तस्वीर में है
बस वही दर्द नुमायां मेरी तहरीर में है
एक तूफान-सा उठता है मेरे सीने में
एक दरिया मेरी इन आँखों की जागीर में है
दिल वो आज़ाद परिंदा है कि उड़ना चाहे
और वो क़ैद रहे बस यही तक़दीर में है
कोई रोया है मेरे पाँव पे सर रख के अभी
एक मानूस-सी ठंडक मेरी ज़ंजीर में है
हल्क-ए-ज़ात में घुट-घुट के तड़पते रहना
ज़िन्दगी और बता क्या तेरी तासीर में है
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ग़ज़ल-
ये किसके इश्क़ में जां खो रहे हैं
फ़लक पर सब सितारे रो रहे हैं
ज़रा आहिस्तगी से राह चलना
दरख्तों पर परिंदे सो रहे हैं
ज़मीं सैलाब उगलेगी अचानक
हम अपने आँसुओं को बो रहे हैं
बहुत उकता चुके हैं ज़िंदगी से
सो इक मुद्दत से ख़ुद को ढो रहे हैं
हम आदमज़ाद भी हिरसो-हवस में
कहाँ के थे, कहाँ के हो रहे हैं
कि जिन गालों को ‘यश’ चूमा था उसने
उन्हें अब आँसुओं से धो रहे हैं
– यश किरण





