ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
ज़िंदगी की धूप को बच्चा समझ पाया न था
दूर उससे जब तलक माँ-बाप का साया न था
दर्दो-ग़म का दूर तक जब जीस्त में साया न था
दौर बचपन के सिवा ऐसा कभी आया न था
ख़ूबरू चेहरे ज़माने में हज़ारों हैं मगर
इक सिवा तेरे न जाने क्यूँ कोई भाया न था
तुम पे अर्पण और क्या करती मैं जानो-दिल के बाद
इससे बढ़कर पास मेरे कोई सरमाया न था
बेकली अब साथ लेकर रोज़ आती है ये शाम
ये सुहानी थी जब उस की याद का साया न था
संगदिल है ये ज़माना जानते कैसे ये हम
इसकी चौखट से कभी सर पहले टकराया न था
हसरतें पामाल होती हैं हमारी जा-ब-जा
ज़िंदगी तू ने कभी इस दर्जा तड़पाया न था
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ग़ज़ल-
कब कहाँ किसको दग़ा दे, जानता कोई नहीं
ज़िंदगी-सा बेमुरव्वत, बेवफ़ा कोई नहीं
दिल कहीं पत्थर न हो जाए बस इतना याद रख
ये वो पत्थर है कि जिसको पूजता कोई नहीं
बेअसर हैं तेरी आहें उस पे तो हैरत न कर
पत्थरों का फूल से क्या वास्ता, कोई नहीं
भूल तो हर शख़्स से मुमकिन है हम हों, आप हों
क्यूँकि हम सब आदमी हैं, देवता कोई नहीं
नफ़्सी-नफ़्सी हर तरफ है, कौन किसका है यहाँ
ऐ ख़ुदा! तेरे सिवा अब आसरा कोई नहीं
बेख़ुदी का राज़ बतलाते हैं तुम को आज हम
हमने उसको पा लिया जिसका पता कोई नहीं
दूर रहता है निगाहों से मेरी फिर भी ‘सुमन’
ज़हनो-दिल में वो ही वो है दूसरा कोई नहीं
– सुमन ढींगरा दुग्गल





