कथा-कुसुम
सत्य
मंदिर के स्वच्छ शुभ्र चबूतरे पर शास्त्रार्थ चल रहा था। पंडित जी कह रहे थे, “ईश्वर प्राप्ति का माध्यम सत्य से ही जाता है।” झा मास्टर असहमत थे, “तो भक्ति कुछ भी नहीं?” “नहीं….नहीं…हम कह रहे हैं, आत्मा सत्य से प्रकाशित हो तभी ईश्वर संभव है।” पंडित जी ने बचाव किया। मिश्र बाबू की ओर समर्थन के लिए देखने पर मिश्र बाबू ने भी सहमति मे सिर हिला दिया।
“और फिर भक्ति सत्य की ओर ही तो ले जाती है।” पंडित जी ने जोड़ा। झा मास्टर के चेहरे पर अब भी असहमति थी, किंतु तर्क भारी था। तिवारी जी उकता गये। उठते हुये बोले, “अपना-अपना मार्ग है। ईश्वर तो एक है।” पंडित जी बोले जा रहे थे, “मेरा तो यही विचार है, जीवन में असत्य के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिये। सदैव सत्य बोलो। सत्य ही सा……”
छन्न….न …. न…. तड़ाक… टन्न…। मंदिर मे रक्खा ठाकुरजी का बड़ा वाला दीया दूर जाकर गिरा था। बाती बुझ गयी थी और तेल संगमरमरी फर्श पर बिखर गया था। स्तब्ध, चारों उस गेंद को देख रहे थे, जो उनके बीच से होती हुई दिये से जा टकराई थी। पंडित जी का चेहरा तमतमाने लगा। उन्होंने मंदिर से सटे मैदान की ओर देखा। मैदान खाली था। तीन स्टम्प खड़े थे और एक बैट ज़मीन पर पड़ा हुआ था। बैट के पास खड़ा नौ साल का बालक कातर दृष्टि से मंदिर की ओर देख रहा था। उस नौ वर्षीय योद्धा की सेना मैदान छोड़ कर भाग चुकी थी। पंडित जी ने इशारे से उसे बुलाया। पास आते ही पंडित जी का हाथ बालक के कान पर था। “मैंने नहीं मारा।” बालक मिमियाया। “झूठ बोलता है। मुझे सब पता है।” पंडित जी की आवाज में आग थी। “जाने दीजिये, बालक है। इसने न मारा होगा।” तिवारी जी ने पैरवी की।
“हाँ…. हाँ…..वह सब मुझ पर नाम लगाकर भाग जाते हैं।” बालक का हौसला बढ़ा। “चुप कर! जैसे मैंने देखा नहीं। सब पता है। इतना तेज शॉट तू ही मारता है, मैंने सबसे पता किया है।” पंडित जी की आवाज काफी तेज हो चली थी। कान की खिंचाई बढ़ गयी थी। बालक की आँखें छलछला आयीं। “कसम से सच बोल रहा हूँ पंडित जी। चाहे तो अपने गोपाल जी से पूछ लो।” बालक ने अंदर की ओर हाथ दिखाया। पंडित जी ने अंदर देखा। उनकी पकड़ ढीली हो गयी। मंदिर के अंदर एक संगमरमरी शुभ्र माखनचोर खड़ा मुस्कुरा रहा था।
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झूठ
“क्या माँ पागल हो गयी है।” सुधा का सवाल तीर जैसा था। “क्या पता।” बस इतना ही निकल पाया मुँह से। शायद माँ सच में पागल हो गयी थी। किसी को पहचान नहीं पा रही थी पिताजी को छोड़कर। न मुझे, सुधा को, चाचा, चाची बगल वाली बुआ किसी को भी नहीं। उन्हें याद थे केवल पिताजी। काश वह उन्हें भी भूल जाती। जलालत से बच गये होते बेचारे। उन्हें देखते ही माँ को दौरा पड़ जाता था। गालियों का फव्वारा निकलने लगता उनके मुँह से। मारने तक दौड़ती।
यकीन नहीं होता था ये वही माँ है, जिनके लिए पिताजी का आदेश देव वाक्य था। आज्ञाकारी पत्नी! यही कहा करते थे सब उन्हें। एक रौब था पिताजी का। और आज! वही पिताजी डरे रहते थे माँ से। न जाने कब क्या बोल दे! कभी-कभी उनकी आँखों में पहचान दिखायी देती, मेरे और सुधा के लिए। तब पल भर के लिए लगता जैसे माँ झूठ बोल रही हो। जैसे बस अभी खिलखिला देगी पहले की तरह। लेकिन पिताजी के सामने बदहवास माँ को देखकर लगता कि शायद माँ सचमुच पागल हो गयी है। पता नहीं सच क्या था? माँ अब झूठ बोल रही थी या पहले इतनी उम्र भर पिताजी की आज्ञा मानते हुये!
– राकेश सुमन





