ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
प्यार उसका इक सज़ा-सा हो गया
इश्क में वो बावला-सा हो गया
पाँव उसके जिस जगह पर भी पड़े
वो ही मेरा रास्ता-सा हो गया
ज़िंदगी उलझी रही कुछ इस तरह
ख़्वाब मेरा गुमशुदा-सा हो गया
दिल मेरा मुझसे ख़फ़ा भी क्यों न हो
वक़्त ही जब अनमना-सा हो गया
मेरे शिकवों की किसे परवाह थी
अब तो हर शिकवा दवा-सा हो गया
ग़म जिगर को रास अब आने लगे
दर्द दिल का ज़ायका-सा हो गया
इश्क़ का बीमार हूँ मैं आजकल
बेख़ुदी से वास्ता-सा हो गया
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ग़ज़ल-
जहां मैं दर-ब-दर भटकी रही हूँ
तलाशे-ज़िंदगी करती रही हूँ
ग़मों की आँच सह लेती हूँ लेकिन
ख़ुशी को देखकर जलती रही हूँ
चली आती मुसीबत बिन बुलाये
निशाना रोज़ मैं बनती रही हूँ
नहीं सुलझी कहानी ज़िंदगी की
मैं जीने के लिए मरती रही हूँ
बता ऐ ज़िन्दगी! तू कब मिलेगी
तेरी इक दीद को तरसी रही हूँ
– निर्मला कपिला




