ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
मुझी तक लौटतीं मेरी सदाएँ, क्या किया जाए
नहीं सुनता ख़ुदा मेरी दुआएँ, क्या किया जाए
हर इक लम्हा यहाँ बस खौफ़ का मंज़र दिखाई दे
लगे सहमी हुई चारों दिशाएँ, क्या किया जाए
यहाँ बेटों पे है उन्माद, बंदिश है नहीं कोई
मिले बेटी को ही हरदम सज़ाएँ, क्या किया जाए
कभी आँधी, कभी तूफां, कभी लहरें, सुनामी हैं
नहीं चलतीं मेरे हक़ में हवाएँ, क्या किया जाए
मुआ ये हिज्र अब मुझको न जीने दे, न मरती हूँ
नहीं लगतीं मुझे कोई दवाएँ, क्या किया जाए
न झाँके जो गिरेबां में, है ऊँगली दूसरों पर ही
उसे शीशा भला कैसे दिखाएँ, क्या किया जाए
तड़पती रूह है जिनमें जो दिल पर बोझ हैं ‘मेघा’
वो रिश्ते तोड़ दें या कि निभाएँ, क्या किया जाए
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ग़ज़ल-
क्यों न कुछ नेक काम कर जाएँ
इससे पहले कि हम गुज़र जाएँ
अब्र कुछ देर को ठहर जा अब
लौट के पंछी अपने घर जाएँ
इनको अक्सर कुरेद लेती हूँ
ज़ख्म ऐसा न हो कि भर जाएँ
और अब कौनसा ठिकाना है
उनके दामन में ही बिखर जाएँ
अब भी इंसान बसते हो जिसमें
हम भी ऐसे किसी नगर जाएँ
खौफ़ घर में भी और बाहर भी
बेटियाँ अब भला किधर जाएँ
आज सच को बयान कर देंगे
इससे पहले कि हम भी डर जाएँ
उनको सजदे भला करें कैसे
जो कि नज़रों से ही उतर जाएँ
जिनकी उजली कमीज़ है ‘मेघा’
काश भीतर से भी निखर जाएँ
– मेघा योगी




