ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
हर बार मेरे हक़ पे था हक़दार कोई और
आवाज़ मेरे नाम की, तैयार कोई और
हर बार मेरी नाव को तूफां ने डुबोया
हर मर्तबा मगर था गुनहगार कोई और
कीचड़ उछालने से न टूटे जो मेरा सब्र
पत्थर उछालियेगा वज़नदार कोई और
सरकार! बाअदब है मुझे हर सज़ा कुबूल
इल्ज़ाम मगर लाइये हर बार कोई और
हर बार यही सोच के ज़ाहिर नहीं किया
तड़पे क्यों मेरे दर्द में बेकार कोई और
दिल में हमारे आप थे और आपके दिल में
हर बार कोई और था, हर बार कोई और
दिल-जां तेरे हुज़ूर में ‘अन्क़ा’ के हैं निसार
दीजे हुकुम ग़ुलाम को सरकार कोई और
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ग़ज़ल-
अब कहाॅं तक नाख़ुदा की नाज़बरदारी करें
तोड़ कर पतवार को तूफान से यारी करें
मेरी ख़ामोशी तुम्हारी दोस्ती का पास है
तुम अगर पीछे हटो तो हम भी तैयारी करें
इक तरफ रंगे-हिना है, इक तरफ गर्दे-जबी
क्या मुनासिब है कहो किसकी तरफ़दारी करें
फिर तुम्हारी याद दिल में करवटें लेने लगी
वक्ते-फ़ुर्सत बैठकर रंगीन बेगारी करें
बात गर सेहत की हो तो फिर समझ से काम लें
मस्अला-ए-इश्क़ में कैसे समझदारी करें
अब नहीं है वक्त कि हम गुनगुनाएँ साथ तो
घर के आमद खर्च पर मिलकर मगजमारी करें
– मीनेष शर्मा अन्क़ा




