ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
अभी देखी कहाँ हैं आपने सब खूबियाँ मेरी
निगाहें ढूँढती हैं आपकी बस ख़ामियाँ मेरी
मेरा किरदार दुनिया में शहादत से मुनव्वर हो
नज़र आएँ फ़लक पर सबको रोशन सुर्खियाँ मेरी
वहाँ बरसों तलक फूलों की खेती होती रहती है
बरस जाती हैं जिन खित्तों पे जाकर बदलियाँ मेरी
मैं हर नेकी को अपने दुश्मनों में बाँट देती हूँ
समर आवर रहा करती हैं इससे नेकियाँ मेरी
ज़माना चाहे जो समझे अना के साथ ज़िन्दा हूँ
तुम्हें भी जीत लेंगी एक दिन ये ख़ूबियाँ मेरी
किसी भी मारके पर अब तलक हारी नहीं हूँ मैं
मेरा ज़ेवर रहा है दोस्तो! ख़ुद्दारियाँ मेरी
‘सबीन’ अक्सर मैं दस्तरख्वां से उठ जाती हूँ बिन खाये
किसी भूखे के काम आ जाएँ शायद रोटियाँ मेरी
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ग़ज़ल-
दिल शिकस्ता हौसला कम, क्या करें
आप ही समझाएँ अब हम क्या करें
आपकी पहलू नशीनी ख़ूब है
आप ही बोलें कि जानम क्या करें
साँस की आवाज़ तक तो रोक ली
गुफ़्तगू इससे भी मद्धम क्या करें
रंज-ओ-ग़म से मुनसलिक है ज़िन्दगी
मौत बरहक़ है तो मातम क्या करें
रब को जो मंज़ूर था सो हो गया
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें
हसरतें तो थीं बहुत लेकिन ‘सबीन’
रास आया ही न मौसम क्या करें
– ग़ौसिया ख़ान सबीन




