ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
जो अपने आप से बेज़ार हो गये हैं हम
सफ़र के वास्ते तैयार हो गये हैं हम
हमारी रूह के छालों से लफ़्ज़ रिसते हैं
तुम्हारी आह के अश’आर हो गये हैं हम
बतौर-ए-जिस्म तो पाबंदियाँ हैं क्या कीजे
बतौर-ए-ज़ेहन भी लाचार हो गये हैं हम
बदलते दौर में आसानियों को ख़तरा है
दिनों-दिन इसलिये दुश्वार हो गये हैं हम
कहाँ ले जायेगी जाने ये जुस्तज़ू हमको
तलब की राह में मिस्मार हो गये हैं हम
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ग़ज़ल-
बेनियाज़ी के सिलसिले में हूँ
मैं कहाँ अब तिरे नशे में हूँ
हिज्र तेरा मुझे सताता है
और बाक़ी तो बस मज़े में हूँ
ढूँढ़ मत इन उदास आँखों में
ग़ौर कर तेरे क़हक़हे में हूँ
वो मुझे अब भी चाहता होगा
मैं अभी तक मुग़ालते में हूँ
हर तरफ़ महफ़िलें ख़यालों की
इश्क़ के शाही महकमे में हूँ
तोड़कर ही निकाल ले कोई
क़ैद मैं अपने दायरे में हूँ
उसको मंज़िल भी मिल गयी अपनी
और मैं हूँ कि रास्ते में हूँ
– डॉ. पूनम यादव




