हाइकु
हाइकु
ओस बताती
अकेले में कितनी
रिसी है रात
तुम क्या जानो
भीतर बरसती
जो बरसात
सिसका चूल्हा
खाली सब बर्तन
पेट में आग
मैं बीता किया
वक्त के साथ-साथ
मोमबत्ती ज्यों
नरम धूप
उतरी आंगन में
अलसाई-सी
प्यारी बिटिया
माँग कर मन्नत
लौटी घर को
लौटी बिटिया
ससुराल से घर
ख़ुशियाँ आईं
सूखे अधर
आलम तनहाई
करते बयां
संवाद हीन
भटक रहे शब्द
ढूंढें अर्थों को
फिर से लौटी
इक उदास शाम
बस्ती ग़रीब
– डाॅ. आरती बंसल




