हम एक ऐसे समय में पहुँच रहे हैं जहाँ भाषा का पतन हमें पतन जैसा लगना बंद हो चुका है। भारतीय समाज में जिन शब्दों को कभी सार्वजनिक रूप से बोलने में संकोच होता था, वही आज राजनीतिक मंचों पर बेझिझक उछाले जाते हैं, टेलीविजन स्टूडियो में बहस का मसाला बनते हैं और शीघ्र ही सोशल मीडिया पर लोकप्रियता का हथियार बनते हुए उन्हें तनिक भी देर नहीं लगती! चिंता तब और बढ़ती है जब साहित्य भी इस शोर से अछूता नहीं रह पाता। आज अनगिनत ऐसे लेखक और पत्रकार हैं जिन्होंने भाषा को रसातल में पहुँचाकर एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है जहाँ न केवल सिर शर्म से झुक जाता है बल्कि आगे के सारे रास्ते भी बंद नजर आते हैं। उस पर इनकी पोस्ट पर वाहवाही करने वाले ऐसे तमाम लोगों की भरमार है जो और भी नीचे गिरने को तत्पर बैठे हैं। समाज में ऐसी अभद्र भाषा और अपशब्दों का बढ़ता चलन और सहजता अब केवल भाषा का संकट नहीं रह गया है। अब यह मानव संवेदना का संकट है।
भाषा, मनुष्य के भीतर सभ्यता का पहला प्रशिक्षण है। हम असहमति कैसे व्यक्त करते हैं, क्रोध को कैसे शब्द देते हैं और दूसरे मनुष्य को किस स्तर का सम्मान देते हैं, इससे हमारे सामाजिक विवेक का पता चलता है। जब तर्क की जगह गाली लेने लगे और असहमति का उत्तर अपमान बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या शब्दों से कहीं बड़ी हो चुकी है।
आज सार्वजनिक जीवन में यही सब तो हो रहा है। राजनीति में वैचारिक संघर्ष निकृष्टतम शब्दावली और व्यक्तिगत गाली-गलौज में परिवर्तित हो चुका है। टेलीविजन की तथाकथित बहसों में सबसे मजबूत तर्क नहीं, बल्कि सबसे ऊँची और अश्लील आवाज सुनी जाती है। सोशल मीडिया ने तो मानो असहमति का एक नया व्याकरण ही रच दिया है, जिसमें विचार का प्रत्युत्तर कोई तार्किक विचार से नहीं बल्कि चरित्र हनन से दिया जाता है। उसके बाद कहने वाले इसे लोकतंत्र/ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर आगे बढ़ जाते हैं।
क्या इस स्वतंत्रता का अर्थ अपने दोष दूसरों पर मढ़, अपने उत्तरदायित्व से मुक्ति पा लेना है? क्या लोकतंत्र केवल मतदान की व्यवस्था है, उसमें संवाद की संस्कृति सम्मिलित नहीं होती? क्या अपशब्दों का कोश भर देने वालों को इतनी भी समझ नहीं कि लोकतंत्र, हमें बोलने का अधिकार देता है, दूसरे मनुष्य को अपमानित करने का विशेषाधिकार नहीं!
असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक शक्ति है, लेकिन वह हर बात जिसे कहने की कानूनी अनुमति है, जरूरी नहीं कि वह सामाजिक रूप से गरिमापूर्ण भी हो। कानून, सीमा तय कर सकता है, यह भी तय कर सकता है कि कौन-सी अभिव्यक्ति दंडनीय है, लेकिन भाषा की गरिमा की रक्षा केवल कानून के भरोसे नहीं की जा सकती। कानून, भाषा का संस्कार नहीं बना सकता। वह काम समाज को करना होगा, हर आम मनुष्य को करना होगा। भय से गलत को सही कैसे माना जा सकता है उसे गलत कहना ही होगा।
भाषायी मर्यादा को लेकर जिन लोगों से कोई उम्मीद रखी जा सकती थी, वह अब चकनाचूर हो चुकी है। सबकी जिम्मेदारी एक तरफ़ लेकिन इसे सुरक्षित रखने की मुहिम और अग्रिम पंक्ति में जिसे डटकर खड़ा होना चाहिए; अब भी वह चुनिंदा बचे हुए लेखक ही हैं।
एक सच्चे और ईमानदार लेखक के लिए भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि सृजन का उपकरण भी है। यक़ीनन वह कोई नैतिक देवता या समाज का न्यायाधीश नहीं है, लेकिन शब्दों के संसार का कर्तव्यनिष्ठ नागरिक अवश्य है। वह शब्दों को केवल कानों या आँखों तक नहीं पहुँचाता, पाठक के हृदय में उतारता है। उसकी भाषा पाठक की कल्पना, संवेदना, अभिव्यक्ति और सोच को प्रभावित और जागृत करती है, यह भाषा लंबे समय तक स्मृति में टिक सकती है। इसलिए लेखक का भाषिक चुनाव पूरी तरह निजी प्रकरण नहीं रह जाता। वह सार्वजनिक भाषा की संस्कृति में भी बहुत कुछ जोड़ता या घटाता है। यह बात उसे हर क्षण याद रखनी चाहिए।
यहाँ साहित्य के सामने एक कठिन प्रश्न आ खड़ा होता है। क्या जीवन की कुरूपताओं को साहित्य से बाहर रखा जा सकता है? उत्तर है- बिल्कुल नहीं। जीवन में गाली है तो साहित्य में भी उसका आना अस्वाभाविक नहीं। किसी पात्र की मानसिकता, सामाजिक पृष्ठभूमि या परिस्थिति को विश्वसनीय बनाने के लिए कठोर अथवा अश्लील भाषा का प्रयोग कई बार कलात्मक रूप से आवश्यक हो सकता है। गंभीर साहित्य इन वास्तविकताओं से आँख नहीं मूंद सकता। किसी पात्र के मुंह से अश्लील शब्द निकलना कथा की माँग हो सकता है। परंतु लेखक का स्वयं उस अश्लीलता को साहस, आधुनिकता या विद्रोह का पदक बना देना इससे इतर बात है। हर गाली साहस नहीं होती। हर निषिद्ध शब्द साहित्यिक उपलब्धि नहीं होता। कई बार गाली केवल गाली होती है।
यहीं इस साहित्यिक विवेक की परीक्षा शुरू होती है कि गाली का प्रयोग और उसका महिमामंडन एक बात नहीं है। यथार्थ को चित्रित करना और यथार्थ की कुरूपता का उत्सव मनाना निस्संदेह दो पृथक तत्त्व हैं।
यूँ भी भाषा कोई संग्रहालय में बंद वस्तु नहीं है। लोकभाषाएँ, बोलियाँ, मुहावरे और जनजीवन की सहज अभिव्यक्तियाँ साहित्य को जीवंत बनाती हैं। नई पीढ़ियाँ, नए शब्द लाती हैं, पुराने शब्दों को नए अर्थ देती हैं और विभिन्न भाषाओं के मध्य निरंतर आदान-प्रदान होता रहता है। भाषा का बदलना उसकी कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता है।
भाषा का बदलना समस्या है भी नहीं। समस्या, उसका सस्ता होना है!
साहित्य में विद्रोह हो सकता है, लेकिन विद्रोह क्या शब्दों की मर्यादा को नष्ट कर ही दर्शाया जाता है? हमारी समृद्ध साहित्यिक परंपरा इसका प्रामाणिक उत्तर देती है। कबीर की वाणी में प्रहार है, लेकिन उसकी शक्ति अपमान में नहीं, सामाजिक पाखंड के विरुद्ध नैतिक साहस में है। प्रेमचंद ने सामाजिक विषमता और मानवीय विडंबनाओं को सामने रखा, लेकिन उनका प्रभाव शाब्दिक सनसनी से नहीं, उनके सहज, सरल लेखन में निहित संवेदना से पैदा होता है। नागार्जुन ने सत्ता पर निर्भीक प्रहार किए, मुक्तिबोध ने अपने समय के भीतर और बाहर के अँधेरे को टटोला। इन साहित्यकारों का आक्रोश, व्यंग्य और असहमति; उनकी साहित्यिक शक्ति, विचार, संवेदना और शिल्प के मेल से निर्मित होती है।
आज साहित्य के सामने चुनौती पहले से बड़ी है क्योंकि पुस्तक अब अकेली अभिव्यक्ति नहीं है। चौबीस घंटे का टेलीविजन, सोशल मीडिया, वायरल वीडियो और डिजिटल सामग्री लगातार पाठक और दर्शक के सामने उत्तेजक और अनर्गल भाषा की बाढ़ ला रहे हैं। ऐसी डिजिटल दुनिया जिसमें उत्तेजना विचार से कहीं अधिक तेज दौड़ती है, उस वातावरण में चौंकाना आसान है, सोचने पर विवश करना कठिन।
यदि साहित्य भी वही निरर्थक, कुतर्क से भरी भाषा बोलने लगे, तो फिर उसकी विशिष्टता ही क्या शेष रही? साहित्य का काम शोर में वृद्धि करना नहीं बल्कि शोर के मध्य, अर्थ की ध्वनि सुरक्षित रखना है। भाषा को अंततः आत्मसंयम, सामाजिक विवेक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी ही बचाती है। लेखक को यह तय करना होगा कि वह अपने समय की भाषा का केवल अनुकरण करेगा या उसे दिशा भी देगा। यह एक निर्णायक प्रश्न है।
यदि राजनीति गाली को शक्ति समझने लगे, मीडिया चीख को संवाद और सोशल मीडिया अपमान को तर्क, तो साहित्य को इनके पीछे चलने की आवश्यकता ही नहीं। साहित्य को समाज का अँधेरा लिखना चाहिए, लेकिन अँधेरे को अपनी रोशनी समझ लेने की भूल नहीं करनी चाहिए। उसे मनुष्य की नैतिक गिरावट दिखानी चाहिए, लेकिन किसी तुलनात्मक उपलब्धि की तरह नहीं! उसे व्यवस्था पर प्रहार करना चाहिए, लेकिन सार्थक, मर्यादित शब्दों के साथ। क्योंकि निर्भीकता किसी को अपमानित करने में नहीं है। असली निर्भीकता कठिन सत्य को ऐसी सहज भाषा में कह देने में है जिसे सुनकर समाज बेचैन हो और चिंतन को बाध्य हो जाए।
भाषा की रक्षा शब्दकोश नहीं करेंगे। न कोई सेंसर बोर्ड इसे बचा सकता है, न कोई सरकारी आदेश।
भाषा को वे लोग बचाएंगे जो जानते हैं कि शब्द, सस्ते नहीं होते और लेखक से अधिक यह बात कौन जानता है?
शब्दों को हथियार बनाना आसान है। उन्हें गरिमा, विचार और संवेदना से भर मनुष्य बनाए रखना कठिन है। जब चारों ओर अपशब्दों का बोलबाला हो, तब साहित्य का सबसे बड़ा दायित्व यही है कि वह भाषा को फिर से मनुष्य के योग्य बनाए!







