18 अप्रैल 2026 की शाम जब मैं कोलकाता से ट्रेन में बैठा, तब मन पहले ही पुरी पहुँच चुका था। पुरी का नाम आते ही समुद्र, रथयात्रा, जगन्नाथ मंदिर और लाखों लोगों की आस्था की तस्वीर सामने आती है। रात में ट्रेन धीरे-धीरे कोलकाता से दूर होती गई और खिड़की के बाहर अँधेरा गहराता गया। भीतर यात्रियों की अपनी-अपनी दुनिया बसती चली गई। मैं भी बीच-बीच में बाहर देखता रहा और अगले दिन के बारे में सोचता रहा। 19 अप्रैल की सुबह ट्रेन पुरी पहुँची। स्टेशन से सीधा होटल पहुँच, कुछ देर आराम किया और फिर जगन्नाथ मंदिर की ओर निकल पड़ा। मंदिर के आसपास पहुँचते ही वातावरण बदल गया। दुकानों, प्रसाद की सुगंध, भीड़ और लगातार सुनाई देते ‘जय जगन्नाथ’ के स्वरों के बीच मंदिर का विशाल शिखर दूर से ही दिखाई दे रहा था।
पुरी का जगन्नाथ मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि सदियों से विकसित होती एक विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा का केंद्र है। वर्तमान मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंगदेव से जोड़ा जाता है। यहाँ जगन्नाथ के साथ बलभद्र और सुभद्रा की पूजा होती है और पुरी भारत के प्रमुख चार धामों में शामिल है। मंदिर के सामने खड़े होने का अनुभव मेरे लिए अलग था। करीब चार घंटे के इंतजार के बाद मंदिर के भीतर जाने से पहले ही एक गहरी अनुभूति हुई और दर्शन के समय वह और तीव्र हो गई। मुझे वहाँ एक बहुत पवित्र और तीव्र ऊर्जा महसूस हुई। इसे मैं किसी वैज्ञानिक कसौटी पर सिद्ध करने की कोशिश नहीं करता; यह मेरा निजी अनुभव था। घंटियों, मंत्रोच्चार, भीड़ और सदियों से चली आ रही आस्था के बीच वातावरण में कुछ ऐसा था जिसे केवल स्थापत्य देखकर समझ पाना संभव नहीं था।
जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की बड़ी, गोल आँखें इस अनुभूति को और गहरा करती हैं। इन प्रतिमाओं की आँखें सामने की ओर खुली हुई हैं। कुछ क्षण के लिए मुझे सचमुच लगा जैसे वे केवल सामने खड़े भक्तों को नहीं बल्कि मंदिर के बाहर सड़क पर गुजरती दुनिया को भी देख रही हों। सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो भी दिखाई देते हैं जिनमें लोगों को लगता है कि भगवान की दृष्टि सड़क पर चलते लोगों का पीछा करती है। इसे चमत्कार का प्रमाण मानना उचित नहीं लेकिन मूर्तियों की संरचना ऐसी अनुभूति अवश्य पैदा करती है।
जगन्नाथ की परंपरा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में राजा इंद्रद्युम्न और नीलमाधव की कथा है। लोकविश्वास के अनुसार नीलमाधव की पूजा शबर समुदाय के विश्ववसु करते थे। राजा को जब इसका पता चला तो उन्होंने विद्यापति को नीलमाधव की खोज में भेजा। बाद में यही परंपरा जगन्नाथ की आराधना से जुड़ी। ऐतिहासिक तथ्य और धार्मिक आख्यान अलग-अलग हों, फिर भी इस कथा में आदिवासी और राजकीय परंपराओं के मेल की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्मृति दिखाई देती है।
दूसरी कथा जगन्नाथ की प्रतिमाओं के निर्माण से जुड़ी है। कहा जाता है कि दिव्य काष्ठ से प्रतिमाएँ बनाने के लिए विश्वकर्मा एक वृद्ध शिल्पी के रूप में आए और उन्होंने शर्त रखी कि निर्माण पूरा होने तक दरवाजा नहीं खोला जाएगा। अधीरता में दरवाजा खुल गया और प्रतिमाएँ अपने वर्तमान विशिष्ट रूप में रह गईं। मुझे इस कथा में सबसे सुंदर बात यह लगी कि यहाँ ‘अधूरापन’ भी पवित्र हो जाता है। जगन्नाथ की अपूर्ण-सी दिखाई देने वाली आकृति ही भक्तों के लिए पूर्ण ईश्वर का रूप है।
महाप्रसाद भी मंदिर की अपनी अनूठी परंपरा है। मिट्टी के बर्तनों में पकने वाला यह भोजन केवल प्रसाद नहीं बल्कि सामूहिक आस्था का हिस्सा है। मंदिर के ऊपर नीलचक्र और प्रतिदिन बदली जाने वाली पताका भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रखते हैं। लेकिन जगन्नाथ परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता मुझे यह लगी कि यहाँ भगवान केवल भक्तों को अपने पास बुलाते नहीं, बल्कि स्वयं भक्तों के बीच आते हैं। रथयात्रा में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा मंदिर से निकलकर सड़क पर पहुँचते हैं। शायद इसी परंपरा के कारण उनकी बड़ी आँखों को देखकर मुझे लगा कि भगवान मंदिर की सीमा के बाहर की दुनिया से भी परिचित हैं। मंदिर से बाहर निकला तो वही सड़क, वही दुकानें और वही भीड़ थी, लेकिन भीतर से मैं कुछ बदलकर निकला था। पीछे मुड़कर मंदिर के शिखर को देखा और लगा कि पुरी की यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई, बल्कि यहीं से शुरू हुई है। इसके बाद मैं गुण्डिचा मंदिर पहुँचा। रथयात्रा के दौरान जगन्नाथ कुछ दिनों के लिए यहीं निवास करते हैं। मुख्य मंदिर की अपेक्षा यहाँ वातावरण अधिक शांत लगा। यह स्थान मुझे जगन्नाथ परंपरा के उस मानवीय पक्ष की याद दिलाता रहा जिसमें भगवान अपने भक्तों के बीच आने वाले देवता हैं।
पुरी से आगे मेरी यात्रा कोणार्क की ओर हुई। समुद्र के साथ चलती सड़क, रास्ते के गाँव और बदलता हुआ परिदृश्य अपने आप में अनुभव था। फिर अचानक सामने सूर्य मंदिर दिखाई दिया। तेरहवीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर सूर्यदेव के रथ की कल्पना पर आधारित है। इसके विशाल पत्थर के पहिए समय और कालचक्र की याद दिलाते हैं। उन पहियों को देखकर लगा कि हमारे पूर्वज केवल स्थापत्यकार नहीं थे, वे समय को भी पत्थर में दर्ज करना जानते थे। मंदिर की दीवारों पर संगीत, नृत्य, युद्ध, प्रेम और दैनिक जीवन के अनेक दृश्य हैं। यही बात कोणार्क को केवल धार्मिक स्थापत्य नहीं रहने देती; यह अपने समय के समाज और जीवन का भी दस्तावेज बन जाता है।
कोणार्क को पुराने नाविकों के विवरणों में ‘ब्लैक पगोडा’ कहा गया है। समुद्र से दिखाई देने वाला इसका विशाल शिखर नाविकों के लिए एक महत्वपूर्ण दृश्य संकेत माना जाता था। आज मुख्य शिखर नहीं है, फिर भी जो कुछ बचा है, वह इसकी भव्यता का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त है। वापसी में शाम गोल्डन बीच पर बिताई। दिन की चमक धीरे-धीरे सुनहरे धुँधलके में बदल रही थी। लहरें लगातार किनारे को छू रही थीं और दूर मछुआरे अपनी नावें समेट रहे थे। उस समय लगा कि पुरी केवल मंदिरों का शहर नहीं, समुद्र के साथ जीते लोगों का शहर भी है। रात होते-होते मैं भुवनेश्वर के लिए निकल गया।
20 अप्रैल की सुबह भुवनेश्वर में थी। आधुनिक शहर के बीच अचानक उभर आते प्राचीन मंदिर यह एहसास कराते हैं कि यहाँ वर्तमान और अतीत साथ-साथ चलते हैं। मेरा पहला पड़ाव लिंगराज मंदिर था। लगभग 11वीं शताब्दी से जुड़ा यह मंदिर कलिंग स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है। यहाँ शिव की हरिहर रूप में पूजा होती है, जिसमें शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय की छवि दिखाई देती है।
लिंगराज से निकलकर उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं की ओर गया। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से जुड़ी ये गुफाएँ जैन साधुओं की साधना और निवास से संबंधित हैं। दोनों पहाड़ियों पर 33 गुफाएँ हैं। चट्टानों को काटकर बनाए गए इन छोटे-छोटे कक्षों को देखकर मन में सहज ही प्रश्न उठता है कि दो हजार वर्ष पहले इतने कठिन श्रम से इन्हें कैसे बनाया गया होगा।
उदयगिरि की हाथीगुम्फा इस यात्रा का विशेष पड़ाव थी। यहाँ उत्कीर्ण खारवेल का अभिलेख प्राचीन कलिंग के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है। इतिहास की किताबों में खारवेल का नाम अशोक जितना प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन चट्टान पर दर्ज उनका शासन बताता है कि मौर्य सत्ता के बाद भी कलिंग की अपनी मजबूत राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान थी। इन गुफाओं में मुझे राजाओं से ज्यादा उन साधुओं की उपस्थिति महसूस हुई जिन्होंने संसार से दूरी बनाकर इन चट्टानों में साधना की। आज उनकी कोई व्यक्तिगत स्मृति नहीं बची, लेकिन उनकी छोटी-सी गुफाएँ ही उनका इतिहास बन गई हैं।
अंतिम पड़ाव था धौली। पहाड़ी पर पहुँचते ही सामने शांति स्तूप था और नीचे दया नदी का क्षेत्र। यही वह धरती है जिसे कलिंग युद्ध की स्मृति से जोड़ा जाता है। 261 ईसा पूर्व के आसपास हुए इस युद्ध के बाद अशोक के जीवन में आया परिवर्तन भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। धौली में विजय से ज्यादा उस विजय के बाद पैदा हुए पश्चाताप की स्मृति दिखाई देती है। दया नदी के लाल हो जाने की कथा लोकस्मृति में आज भी कही जाती है। इसे ऐतिहासिक तथ्य की तरह स्वीकार करना उचित नहीं, लेकिन यह कथा युद्ध की भयावहता को समझाने वाले प्रतीक के रूप में जरूर जीवित है। इसके पास अशोक के शिलालेख और चट्टान से उकेरा गया हाथी इतिहास को लोककथा से अलग प्रमाणिक आधार देते हैं।
धौली से लौटते समय शाम हो चुकी थी। कुछ ही देर बाद मुझे भुवनेश्वर हवाई अड्डे के लिए निकलना था। मेरी उड़ान 6E 2187 थी, जिससे मुझे दिल्ली लौटना था। गाड़ी की खिड़की से बाहर भुवनेश्वर की रोशनियाँ पीछे छूटती जा रही थीं और मन में पिछले दो दिनों के दृश्य एक-एक करके लौट रहे थे-पुरी का मंदिर, जगन्नाथ की बड़ी आँखें, गुण्डिचा की शांति, कोणार्क के पहिए, समुद्र की लहरें, लिंगराज का शिखर, खारवेल की चट्टान और धौली का सफेद स्तूप। दो दिनों की यह यात्रा समय में छोटी थी लेकिन स्मृतियों में बहुत लंबी। पुरी ने आस्था से मिलाया, कोणार्क ने कला और समय से, भुवनेश्वर ने सांस्कृतिक सह-अस्तित्व से, उदयगिरि-खंडगिरि ने तपस्या से और धौली ने युद्ध के बाद शांति की संभावना से।
हवाई जहाज में बैठते समय लगा कि किसी जगह को देखना और उसे समझना अलग बातें हैं। शायद यात्रा का अर्थ भी यही है कि हम किसी शहर से लौटते हैं लेकिन उसका कुछ हिस्सा हमारे भीतर रह जाता है। दिल्ली पहुँचने तक यात्रा का उत्साह धीरे-धीरे थकान में बदल चुका था। लेकिन इस थकान में एक संतोष था। दो दिनों में मैंने जितना देखा, उससे कहीं अधिक अपने भीतर लेकर लौट रहा था। पुरी और भुवनेश्वर के बीच की यह यात्रा दूरी में छोटी थी, लेकिन समय में बहुत लंबी। समुद्र से शुरू होकर पत्थरों तक पहुँची यह यात्रा अंततः मनुष्य तक आकर ठहर गई।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि इस यात्रा में सबसे अधिक याद रहने वाली चीज कोई एक मंदिर या स्मारक नहीं है। याद रहती है समुद्र की आवाज, कोणार्क के पहियों पर पड़ती धूप, लिंगराज के ऊपर उठता शिखर, गुफाओं की ठंडी चट्टानें और धौली की पहाड़ी पर पसरी हुई शांति।
यात्राएँ शायद इसी तरह हमारे भीतर अपना घर बनाती हैं। हम सोचते हैं कि हम किसी जगह को देखने जा रहे हैं, लेकिन लौटकर पता चलता है कि उस जगह ने हमारे भीतर कुछ देख लिया है। पुरी ने आस्था के बारे में सोचने को विवश किया, कोणार्क ने कला और समय के बारे में, भुवनेश्वर ने संस्कृति के सह-अस्तित्व के बारे में, उदयगिरि-खंडगिरि ने मनुष्य की साधना के बारे में और धौली ने शक्ति तथा पश्चाताप के बारे में। कोलकाता से शुरू हुई यात्रा दिल्ली में समाप्त हुई लेकिन उसके दृश्य अभी भी मन में चलते रहे। शायद यही किसी अच्छी यात्रा की पहचान है- उसका अंत स्टेशन, हवाई अड्डे या घर पहुँचने पर नहीं होता। वह लौट आने के बाद शुरू होती है, जब हम अपने देखे हुए संसार को अपने भीतर फिर से देखने लगते हैं।
ओडिशा से लौटते हुए मेरे पास कोई बड़ी घोषणा नहीं थी। बस एक शांत-सा एहसास था कि भारत को समझने के लिए कभी-कभी बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं होती। उसके अतीत के दरवाजे हमारे सामने ही खुले रहते हैं। जरूरत केवल इतनी है कि हम उन्हें पर्यटक की तरह देखकर आगे न निकल जाएँ, बल्कि कुछ देर ठहरें, पत्थरों को पढ़ें, लोककथाओं को सुनें और उन आवाजों को महसूस करने की कोशिश करें जो सदियों से हमारे बीच मौजूद हैं।
शायद इसी अर्थ में मेरी यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई थी। विमान मुझे भले ही भुवनेश्वर से दिल्ली ले आया था, लेकिन पुरी का समुद्र, कोणार्क का सूर्य, लिंगराज का शिखर, खारवेल की चट्टान और धौली की शांति अब भी मेरे साथ लौटे थे। हम जगहों से लौट आते हैं, लेकिन जगहें हमसे नहीं लौटतीं। वे हमारे भीतर रह जाती हैं।







