इसी वर्ष साहिर की बेमिसाल कविताई से सजी सत्तर दशक की सुपरहिट फिल्म ‘कभी कभी’ ने अपने रिलीज के पचास साल पूरे कर लिए । इस अवसर पर आइए फिल्म पर बात करते हैं। दोस्तों, सच्चा किस्सागो उसे ही कहेंगे जो सबसे जटिल कहानियों को भी शिद्दत और सादगी के साथ पेश कर सके। सुपरहिट ‘कभी-कभी’ के साथ यश चोपड़ा ने ऐसा ही कुछ किया । पचास बरस बाद भी जिसे लिरिक्स, म्यूज़िक और स्टोरीलाइन के लिए याद किया जा सकता है।
अमित मल्होत्रा एक उभरता हुआ कवि है। पूजा कॉलेज की स्टूडेंट है। अमित और पूजा एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं । पूजा कवि अमित की बड़ी फैन है । दोनों में प्यार हो जाता है। एक लव स्टोरी सांसे लेने लगती है। मगर यह प्यार जल्द ही जुदाई और तड़प में बदलने वाला था। दरअसल पूजा के घरवाले उसकी शादी आर्किटेक्ट विजय खन्ना से तय कर देते हैं। पूजा अपनी मोहब्बत के बारे में मां-बाप को बता नहीं पाती है। अमित को भूल कर मां बाप के फैसले को स्वीकार लेती है। पूजा अमित की प्रेम कहानी का पीड़ादायक मोड़ अमित को झकझोर देता है। अमित हमेशा के लिए कविताएं लिखना छोड़कर अपने पिता के बिज़नेस से जुड़ जाता है। पूजा की जिंदगी तो पहले ही बदल चुकी थी।
कहानी बीस साल की टाइमलाइन बाद मोड़ लेती है। विजय का बेटा विक्की कपूर परिवार की पिंकी के प्यार में पड़ जाता है। बात शादी तक चली जाती है। दोनों के घरवाले प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं। कहानी लेकिन यहां फिर मोड़ लेती है। दरअसल पिंकी के सामने उसके कल की सच्चाई सामने आती है । अपनी असली मां अंजली के बारे में जानकर वो उसे ढूंढने निकल पड़ती है। अंजली का पति अमित मल्होत्रा है। घटनाओं की नई श्रृंखला से पुराने रिश्ते एक बार फिर आमने-सामने आ जाते हैं। बीस साल बाद, किस्मत किरदारों को फिर साथ लाती है। लेकिन बिछड़े प्यार का दर्द और विरोधाभास को कम ही जगह मिली। क्योंकि फिल्म प्यार का जश्न होने के साथ रिश्तों पर सबक भी है। अंत में कहानी ने क्या मोड़ लिया, जानने लिए देखें यह क्लासिक।
यश चोपड़ा की ‘कभी-कभी’ संगीत और रूमानी डायलॉग्स के लिहाज़ से सदाबहार है। मगर एक फिल्म के तौर पर, कहीं कहीं कमजोर है। अमिताभ हमेशा की तरह प्रतिभाशाली हैं । मगर शशि कपूर शायद कैरियर के बेहतरीन रोल में हैं। साहिर लुधियानवी की कविताई, खय्याम का संगीत टाइमलेस है। साहिर की जादुई कलम से निकला ‘कभी-कभी मेरे दिल में’ आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे रूमानी गानों में जगह पाएगा। कभी-कभी को साहिर की बेमिसाल याद के तौर पर भी देखा जा सकता है।
फिल्म ‘कभी कभी’ के टाइमलेस म्यूज़िक की खूबसूरती सिर्फ़ खय्याम के धुनों में नहीं, बल्कि लफ्जों की गहराई में भी है।कभी-कभी’ में सादगी और हिंदी सिनेमा की स्वाभाविक चमक का कुछ ऐसा मेल था जो हमेशा खींचता है। फिल्म के लोकेशन इसे ‘विजुअल ट्रीट’ देते हैं। अमिताभ बच्चन और राखी गुलज़ार की जोड़ी बिल्कुल नई और अनूठी थी। केमिस्ट्री उतनी ही जादुई जितनी कि साहिर की वो मार्मिक कविता। कभी-कभी एलबम ने भावनाओं के उन जरूरी पहलुओं को स्पर्श किया जो कभी नहीं बदलते।
1. कभी कभी मेरे दिल में– एक रूहानी संवाद है।
यह दो तरह से आता है—एक अमिताभ बच्चन की गंभीर आवाज़ में कविता बनकर । दूसरा मुकेश की आवाज़ बनकर । साहिर ने इसमें ‘वफ़ा’ और ‘मजबूरी’ के द्वंद्व को खूबसूरती से पिरोया है। खय्याम साहब ने इसमें कम इंस्ट्रूमेंट्स का प्रयोग किया । इससे शब्द उभर कर आते हैं। मुकेश की आवाज़ का अंदाज़ इस गाने को कालजयी बनाता है।
2. मैं पल दो पल का शायर – जीवन की नश्वरता को दर्शाता है। यह एक कलाकार का अपने वजूद के प्रति समर्पण और स्वीकारोक्ति है। मुझसे पहले कितने शायर आए और चले गए—पंक्ति बता गई हम सब समय के प्रवाह में एक छोटी सी बूंद हैं। ऐसी में यह दौड़ती भागती ज़िंदगी को रुककर सोचना जरूरी है।
यह मशहूर गाना सालों से लोगों के दिलों को छूता आया है। यह गाना आज भी संगीत और कविता प्रेमियों के दिलों में खास जगह रखता है। साहिर लुधियानवी की कलम का जादू साथ में खय्याम का संगीत और मुकेश की गायकी इसे टाइमलेस बनाती है। यह गाना उभरते शायर अमित मल्होत्रा पर फिल्माया गया। इस गीत को साहिर का मानवीकरण माना जाता है। कहा तो यह भी गया कि फिल्म की कहानी को साहिर ने ही प्रेरित किया ।
3. तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती’ – गाना कश्मीर की बर्फीली वादियों में खिलती हुई धूप जैसा है। इसमें वाद्य और ताल का जो समन्वय मन में उमंग भर देता है। किशोर कुमार की आवाज़ में शरारत और मासूमियत है।
4. मेरे घर आई एक नन्ही परी -हिंदी सिनेमा की सबसे मनमोहक लोरियों में एक है। अपनी नन्ही बच्ची के लिए मां बाप क्या महसूस कर सकते हैं , इसमें खूबसूरती से दिखाया गया। लता मंगेशकर की मखमली आवाज़ भुलाए नहीं भूलती। लोरियों का हमेशा से एक खास जगह रही है। इनमें से अधिकांश लारियां घर की महिलाओं द्वारा गाई जाती हैं। कुछ पुरुषों, विशेषकर विदुरों द्वारा भी गाई गई हैं। जोकि अक्सर उदासी भरी होती हैं। हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं। फिल्म सुजाता की लोरी ..नन्ही कली सोने चली..राग पीलू में है। स्पष्ट रूप से अधिकांश लोरियों के लिए यही राग उपयुक्त माना जाता है।
कभी कभी का गीत ..मेरे घर आई इक नन्ही परी’ वहीदा रहमान पर फिल्माया गया है। अमिताभ बच्चन, नीतू सिंह और नसीम इसे सुनते हैं। नसीम उनकी बेटी की भूमिका में हैं । एक मर्मस्पर्शी सीन जिसमें अमिताभ कुर्सी पर बैठे हैं, नसीम उनके पैरों के पास है। साहिर के सरल बोल और खय्याम का कोमल संगीत। खय्याम की जादूगरी ने न तो लफ्जों में न ही सीन में अड़चन डाली है। लता मंगेशकर की आवाज़ तो कमाल कर गई है।
5.प्यार कर लिया तो क्या- कभी कभी’ की कव्वाली ढंग में आया गीत। गाने में विद्रोही स्वर है। समाज की बंदिशों के खिलाफ प्यार का एलान है। आशा भोंसले की गायकी इसका आकर्षण है।
6. सुर्ख जोड़े की जगमगाहट: यह गीत फिल्म की कहानी के अहम मोड़ को दर्शाता है। इसमें शहनाई का वाद्य का प्रयोग हुआ था। विदाई के बेला का भावपूर्ण गीत जो आज भी पुराना नहीं लगता।
क्लाइमेक्स सीन शशि कपूर पर फिल्माया गया। यह गहरे संवादों से भरा है। यह दृश्य बताता है कि एक पुरुष को अपनी जीवनसंगिनी के अतीत का सम्मान करना चाहिए। अतीत को विवाद का कारण ना बना कर एक दूसरे को सच्चे मन से स्वीकार करना चाहिए। मुकेश और लता मंगेशकर का गाना और अमिताभ का कविता पाठ आज भी दिलों को सुकून देता है ।
यश चोपड़ा की फिल्मों में अक्सर पहला प्यार और स्थिर प्यार के बीच का अंतर मिलता है। अमिताभ और राखी के किरदार जुनूनी पहले प्यार का प्रतिनिधित्व करते हैं । वो प्यार जो कभी जुनून से आगे नहीं बढ़ पाया। एक कविता लिख रहा दूसरा उसका फैन है। दूसरी ओर विजय और पूजा के रिश्ते में कोई जादुई पहली मुलाकात या मोहब्बत नहीं थी । फिर भी पूजा अपने आज से संतुष्ट है। विजय के रूप में उसे एक शानदार जीवन साथी मिला है। पत्नी का अतीत जानकर भी वो रिश्ता खराब नहीं करता। वो कह रहा…. मेरी पत्नी इतनी सुंदर है कि किसी और ने भी उससे प्यार किया। विजय की यह उदारता अमित के प्यार से बहुत अलग है। शादी ब्याह जीवन की महत्वपूर्ण घटना होती है। पारंपरिक समाज में स्त्रियों को सिखाया जाता है कि शादी बाद सबकुछ भूलकर नई शुरुआत करें। मगर कई पुरुष ऐसा नहीं कर पाते। अतीत में जीते रहते हैं। कभी-कभी’ ऐसे ही कहानी के माध्यम से अपनी बात रखती है।
शशि कपूर का अभिनय ‘कभी-कभी’ की गहराइयों को इतनी खूबसूरती से टटोलता है कि फिल्म को नया नज़रिया दे जाता है। कहानी का कोई भी पात्र पूरी तरह से ब्लैक एंड वाइट नहीं । हम यह नहीं कह सकते कि यह अच्छा है, वह बुरा है। अंत में आप पाएंगे कि कहानी के दो स्पष्ट नायक उस व्यक्ति की छाया में ओझल हो गए जिसने पूरी फिल्म में कुछ भी गलत नहीं किया। जो हमेशा खुला, प्यारा, ईमानदार और उदार रहा।
कभी-कभी के अमित को अपने रूमानी और संवेदनशील नज़रिए को तिलांजली देने को बाध्य किया गया। बीस साल की जिंदगी निकल चुकी है, आज वह एक बेटी का बाप है। अमित मल्होत्रा की भावनाएं केवल बिटिया तक ही सिमटकर रह गई हैं। बिटिया के प्यार में वह दूसरों के प्रति रुखा व कर्कश हो चला है। एक हद तक स्वार्थी और आत्मकेंद्रित किरदार। पहले प्यार को हसरत से याद करने से उसे परहेज़ नहीं, क्योंकि खुद को पीड़ित शख्स मानता है। कभी खुद प्यार में होने पर भी वह पत्नी के पूर्व प्रेम को लेकर नाराज़ है। पत्नी का इतिहास उसे अस्वीकार है, लेकिन खुद का मामला नागवार नहीं गुज़रता। दरअसल यह किरदार के आत्मकेंद्रित नज़रिए को दर्शाता है।
पहले कभी जो कवि था, दरअसल अब बदल चुका है। हरेक चीज में जीवन की खोज करने वाला उसका नजरिया सिमट गया है। उसे पूरी दुनिया स्वार्थी नज़र आती है। इस पूर्वाग्रह को तकरीबन सही समझकर जीवन में अपना चुका है। प्रेमिका से दूर रहने का कठिन निर्णय लेकर वो खुश नहीं है। मजबूरी में लिया हुआ यह फैसला उसे स्वीकार नहीं। पहले प्रेम से मिला अनुभव उसे एक तल्ख आदमी में तब्दील कर देता है। वो आज जो है कल के कारण। अमित को छोड़कर फिल्म के सभी लोग जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं। मगर अमित एक पश्चाताप के साथ पड़ा हुआ है। उसकी भावनाएं सार्वजनिक न होकर निजी हैं। यह व्यवहार उसे एक ‘बंद व्यक्तित्व’ में तब्दील कर चुका है। एक सक्षम और संवेदनशील कवि जो केवल स्वयं के साथ जी रहा।
यशजी ने अपने करियर में ‘काला पत्थर’ जैसे कोयला खदानों पर आधारित कठोर और गंभीर कहानी पेश की। त्रिशूल और अदालती ड्रामे से भरपूर ‘वक्त’ जैसी फिल्में भी बनाई। लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म कभी-कभी के ‘अनकंडीशनल लव’ वाले ब्रांड का मुकाबला नहीं कर सकी। सिलसिला की दुनिया, ‘लम्हे’ का अनोखा आकर्षण या दिल को छू लेने वाली ‘चांदनी’। यश चोपड़ा के अनकंडीशनल लव’ थीम में ‘कभी-कभी’ अपनी वजहों से ऊंची लगती है।





