लो मैं आ गया
एक बहुत पुरानी कथा है। बाप बेटा शहर में माल बेच कर गांव वापिस लौट रहे थे। अँधेरा हो चला था। उनके साथ का गधा बहुत बूढ़ा हो चला था। पगडंडी संकरी थी इसलिए भी तेज चलने में तकलीफ हो रही थी। वे पूरी तरह से अँधेरा घिर जाने से पहले घर पहुंच जाना चाहते थे।
अब किस्मत की मार देखिये वे गांव के पास पहुंचे ही थे कि गधा एक गड्ढे में जा गिरा।
बाप बेटा परेशान कि अब करें तो क्या करें। गड्ढा काफी गहरा था और ऊपर से अँधेरा। किसी भी तरह से गधे को बाहर नहीं निकाला जा सकता था। सुबह तक इंतज़ार भी नहीं किया जा सकता था। रात भर में गधा रेंक रेंक कर सारे गांव को सोने न देता और फिर सुबह पूरे गांव की गालियां सुननी पड़तीं। अब करें तो क्या करें। दोनों सिर पकड़ कर बैठे थे कि गधे ने रेंकना शुरू कर दिया।
दोनों ने आपस में सलाह मशविरा किया और यही सोचा कि गधा हो चला है बूढ़ा। अब काम का रहा नहीं है लेकिन खुराक पूरी है। इसके चक्कर में हर दिन काम का हर्जा होता है। कोई खरीदने से रहा। क्यों न इसे इसी गड्ढे में जिंदा दफन कर दिया जाये। जान छूटेगी। ये सोच कर बेटा लपक कर घर गया और दो बेलचे और लालटेन लेता आया। अब जी, बाप बेटे ने फटाफट आसपास की मिट्टी गधे के ऊपर डालनी शुरू कर दी ताकि गधा मिट्टी तले दब जाये।
जब गधे पर मिट्टी पड़नी शुरू हुई तो पहले तो उसे समझ ही नहीं आया कि ये हो क्या रहा है। वह जोर से रेंका। तभी उसके दिमाग की बत्ती जली। वह दोनों की अक्लमंदी पर मुस्कुराया और मिट्टी की मार सहता रहा। बाप बेटा देर रात तक गधे पर इतनी मिट्टी डाल चुके थे कि उन्हें लगने लगा कि बस, थोड़ी ही देर में गधा जीते जी दफन हो जायेगा।
उधर गधे जी महाराज मिट्टी के हर वार को पीठ पर झेलते और बदन झटक कर मिट्टी हटा देते। मिट्टी पैरों तले आती और इस तरह से वे हर बार ऊपर उठ रहे थे। सोच रहे थे कि बस थोड़ी सी मिट्टी और पड़ी नहीं कि वे बाहर हो जायेंगे। हुआ भी यही। थोड़ी मिट्टी और आयी गधे के बदन पर और गदहा महराज जी ने एक छलांग लगायी और सीधे ही गड्ढे के बाहर – लो मैं आ गया।
डिस्क्लेमर: इस बोध कथा का उस देश से कोई लेना देना नहीं है जहां आतंकवाद के, अलगाववाद के, सांप्रदायिकता के, अशिक्षा के, अज्ञानता के, नफरत के, अलां के और फलां के दैत्य रोज दफन किये जाते हैं लेकिन दफन होने से पहले ही वे और मजबूती से सिर उठा कर और ताकतवर हो कर सामने आ खड़े होते हैं और चुनौती देते लगते हैं कि ये रहे हम।
जो करना है कर लो।
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पैसा पैसे को खींचता है
एक देश था। उसमें बहुत सारे लोग रहते थे। उन बहुत सारे लोगों में से भी बहुत सारे लोग गरीब थे और उन बहुत सारे लोगों में कुछ कम लोग बहुत अमीर थे।
तो हुआ यूं कि उन बहुत सारे गरीब लोगों में से एक गरीब आदमी ने किसी तरह से अक्षर ज्ञान कर लिया। अब वह जब कभी फुर्सत में होता (वैसे वह हर समय फुर्सत में ही होता था) इस अक्षर ज्ञान को परखने के लिए और उन छपे हुए अक्षरों का सही अर्थ जांचने के लिए आस पास बिखरे कागजों, अखबारों की कतरनों और कहीं भी छपे अक्षर देख कर धीरे धीरे हिज्जे करके पढ़ने की कोशिश करता। इस अक्षर ज्ञान के बलबूते पर वह समझता था कि वह कुछ कुछ सयाना हो रहा है।
एक बार की बात, उसने यूं ही छपा हुआ एक काग़ज बांचते हुए पढ़ा कि पैसा पैसे को खींचता है। ये इबारत उसने कई बार पढ़ी। जब उसे समझ आ गयी तो उसकी आंखों में चमक आ गयी – अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात लिखी है। पैसा पैसे को खींचता है। अगर मेरे पास भी कहीं से एक पैसा आ जाये तो उसके बल पर मैं दूसरों के पैसों को अपनी तरफ खींच सकता हूं। फिर मेरे पास जब ज्य़ादा पैसे हो जायेंगे तो मैं उस पैसों से और ज्य़ादा पैसे खींच सकता हूं। तब मैं बहुत पैसे वाला हो जाऊँगा।
बस जी, उस दिन से वह एक पैसा जुटाने की जुगत में लग गया। आखिर वह एक पैसे वाला हो गया। अब उसकी तलाश शुरू हुई किसी ऐसी तिजोरी की जिसके सारे पैसे वह खींच सके।
उसे याद आया कि राशन वाले लाला की तिजोरी में दिन भर इतने पैसे आते रहते हैं कि उसे अपनी तिजोरी बंद करने का मौका ही नहीं मिलता। गरीब आदमी ने सोचा – यहीं से शुरुआत की जाये।
वह जा कर लाला की दुकान के आगे लगी भीड़ में खड़ा हो गया और मौका देख कर अपना पैसा उस तिजोरी की तरफ उछाल दिया। एक पैसा ज्य़ादा पैसों में मिल गया। वह बहुत खुश हुआ और एक किनारे खड़ा हो कर इंतज़ार करने लगा कि कब उसका पैसा तिजेारी के सारे पैसों को खींच कर लाता है। दिन ढल गया, शाम हो गयी, सारे ग्राहक चले गये, लेकिन उसके पैसे ने कोई करामात न दिखायी। वह परेशान होने लगा। लाला देख रहा था कि एक गरीब आदमी तब से परेशान हाल उसकी दुकान के आसपास मंडरा रहा है। दुकान बंद करने का समय हुआ तो गरीब की हालत खराब हो गयी। लाला ने उसकी ये हालत देखी तो पास बुलाया और उसकी परेशानी की वजह पूछी।
गरीब ने रोते हुए पूरा किस्सा बयान किया। सुन कर लाला हंसने लगा – तूने ठीक पढ़ा था लेकिन आधी ही बात पढ़ी थी।
तब लाला ने गरीब आदमी को समझाया कि तूने पढ़ा कि पैसा पैसे को खींचता है तो तू देख ही रहा है कि पैसों ने पैसे को खींच लिया है। बस, तूने ये ही नहीं पढ़ा था कि ज्य़ादा पैसे कम पैसों को खींचते हैं। अब तू घर जा। अँधेरा हो रहा है। कहीं तुझे सांप बिच्छु न काट लें।
डिस्क्लेमर: ये विशुद्ध बोध कथा है। इसके पात्र पूरी तरह से काल्पनिक हैं। इस कथा का उस देश से कोई संबंध नहीं है जहां बहुत सारे गरीबों के थोड़े से भी पैसे बहुत थोड़े से अमीरों की बहुत बड़ी तिजोरी में अपने आप पहुंच जाते हैं और इस बीच अँधेरा हो जाता है।






