बीते दिनों की ज़िंदगी और उससे जुड़े सभी रोचक किस्सों के बारे में जानने के लिए तो हम सभी उत्सुक रहते हैं। फिल्मों और फिल्मी सितारों के बारे में भी सभी उम्र के लोगों में से अधिकतर उतनी ही रुचि रखते हैं, खास तौर पर बीते दौर के उन फिल्मी सितारों से संबंधित कोई भी नामालूम जानकारी जिन्होंने फिल्मी जगत के बॉक्स ऑफिस पर लंबे समय तक राज किया और उनकी हमेशा के लिए हिट फिल्मों को बार-बार देखा और सराहा गया।
बीते ज़माने के अपने विशाल अनुभवों और रोचक यादों का भंडार, मेरे पिता ओम प्रकाश सहगल हमेशा उन दिलचस्प यादों को बांटना पसंद करते थे जिन्हें सुन बहुतों को तो आजकल के संदर्भ में उन पर आसानी से विश्वास ही नहीं हो पाता था। नब्बे वर्ष से अधिक उम्र के अपने सेहतमंद पड़ाव तक उनकी याददाश्त बहुत तेज थी और वह एक स्वतंत्र जीवन जीते थे। किसी भी घटना या चर्चा से वह अपने को आसानी से जोड़ पाते थे और उनके पास अपने अनुभव, अपनी कहानियाँ होती थी जिन्हें वह अपने आश्चर्यजनक तथ्यों और आंकड़ों से और भी रोचक और जीवंत बना देते थे। जब घर पर रात में उनके साथ बैठकर उनके पसंदीदा टीवी प्रोग्राम पर अनु कपूर द्वारा भारतीय फ़िल्म संगीत के स्वर्णिम युग के लोकप्रिय पुराने फ़िल्मी गीतों और उनसे जुड़ी दिलचस्प कहानियाँ सुनते तो चालीस और पचास के दशक की उन फ़िल्मी हस्तियों के साथ उनकी अपनी मुलाक़ातों के ब्योरे और उनके बारे में कम-चर्चित तथ्य और किस्से, उस मनोरंजन का एक अनिवार्य हिस्सा हुआ करते थे।
अपनी किशोर अवस्था के दिनों से ही वे फ़िल्मों और फ़िल्मी सितारों के इतने बड़े प्रशंसक रहे कि सभी फ़िल्में पहले दिन, पहले शो में देखते थे। जब वह छात्र थे, उनका परिवार अविभाजित भारत के लायलपुर के सिविल लाइंस इलाके में रहता था, जिसे अब पाकिस्तान में फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है। कॉलोनी की छोटी ऊंचाई की चारदीवारी के उस पार सड़क के दूसरी तरफ मशहूर निशात टॉकीज हुआ करता था। शहर में दो अन्य सिनेमा हॉल थे: रीगल और मिनर्वा टॉकीज। वहां रोजाना पांच शो हुआ करते थे। मेरे पिता साढ़े चार आने के टिकट पर पहले दिन, पहले शो की फिल्में देखा करते थे। उनका जुनून ऐसा था कि ईद और दशहरा जैसी छुट्टियों में वह तीनों सिनेमाघरों में फिल्में देखते और जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद आती उसे दोबारा भी देखते।
रीगल सिनेमा, जिसे प्रेम सिंह हॉल के नाम से भी जाना जाता था, उन दिनों 60,000 रुपये की बड़ी लागत से बना था। निशात टॉकीज का मालिक मोहम्मद शफी था, जो इमारतें बनाने वाला एक अमीर ठेकेदार था। एक उद्यमी व्यवसायी होने के नाते, उसने हॉल से सीटें हटा दीं और दरियाँ बिछा दीं, जिन पर उकड़ू बैठकर लोग इत्मीनान से हुक्का पीते और सिनेमा हाल की स्टेज पर आयोजित ‘जिंदा नाच और गाना’ यानि लाइव डांस एण्ड म्यूजिक का आनंद उठाते थे।
बेबी नूरजहाँ, जो उन दिनों मुश्किल से 13 वर्ष की थी, शो के लिए काम पर रखे गए मंच कलाकारों में से एक थी। चूंकि मेरे पिताजी इस पड़ोस के टॉकीज में अक्सर आते थे, उन्हें अच्छी तरह से याद था कि नूरजहाँ ने एक दोपहर अपने बौने कद वाले असिस्टन्ट रिड़कु से यूं शिकायत की थी, “मोया, मर गया, सिखर दोपहर हो गई, रोटी ते खवा दे” और रिड़कु ने पलटकर जवाब दिया था , “पैसे देवेंगी तां ही ते लिआवांगा!” यानि कि अगर तुम मुझे पैसे दोगी, तभी तो लाऊँगा।
अल्लाह रखी वसई, जिसका फिल्मी नाम बदलकर बेबी नूरजहाँ कर दिया गया और बाद में उसे मल्लिका-ए-तरुन्नम की उपाधि से भी सम्मानित किया गया, ने हालांकि दो साल पहले लोकप्रिय पंजाबी फिल्म ‘हीर-सैय्याल’ में बाल हीर की भूमिका के साथ अपने फिल्मी कॅरियर की शुरुआत की थी, लेकिन वर्तमान समय के विपरीत जबकि फिल्मी सितारे और कलाकार अब किसीके साथ भोजन करने के लिए मोटी रकम लेते हैं, उसे अपने भोजन का खुद ही इंतजाम करना पड़ता था। रिड़कु रोटी और सब्जी के लिए सड़क के किनारे ‘मच्छन’ या तंदूर वाली के पास जाता था। तब एक रोटी की कीमत केवल एक पैसा थी। ढाबों के शानदार विकल्प उन दिनों कम थे। उन ढाबों में खाने के लिए मात्र दो रुपये महीने लगते थे जिसमें एक आदमी प्रति दिन दो वक्त का भोजन कर सकता था जिसमें देसी घी से पकी हुई दो सब्जियां, और जितनी खा सकें उतनी रोटियाँ, शामिल थीं। पौने दो मन (सत्तर सेर यानि कि आज के 65 किलो के लगभग), उच्च गुणवत्ता वाले 591 नंबर गेहूं की बोरी तब केवल दो रुपये में मिला करती थी।
1959 में मेरे पिता परिवार के साथ एक महीने छुट्टियाँ बिताने मुंबई, तब के बॉम्बे गए, जहाँ मेरे मामा गुरबचन लाल खन्ना ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई थी। वह पॉकेट मार (1956), दिल्ली का ठग (1958), शराबी (1964) और बाद में शराफत (1970), समाधि (1972), देश द्रोही (1980) और चोरों का राजा जैसी फिल्मों से जुड़े रहे। उन्होंने प्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित, धर्मेंद्र के भाई के साथ समाधि और देश द्रोही का सह-निर्माण किया। समाधि सुपरहिट रही, लेकिन देश द्रोही में एक और हिट फिल्म विक्टोरिया नंबर 203 के कलाकारों को दोहराने से ठीक उल्टा हुआ।
मेरे पिता सदाबहार देव आनंद के बहुत बड़े प्रशंसक रहे। मुंबई की अपनी यात्रा के दौरान, मेरे मामा दादर के रंजीत स्टूडियो में देव आनंद के साथ शराबी के निर्माण में शामिल थे। इस प्रकार मेरे पिता की अधिकांश छुट्टियां रंजीत स्टूडियो में शूटिंग देखने और अपने पसंदीदा सितारों से मिलने में बीतती थीं। उन नजदीकियों के चलते, खुद किसी हीरो जैसे आकर्षक व्यक्तित्व वाले मेरे पिता को देव आनंद ने नवकेतन फिल्म्स में प्रोडक्शन मैनेजर की नौकरी का ऑफर दिया। उन्हें एक हज़ार रुपये मासिक की पेशकश की गई। हालांकि उन दिनों यह रकम बहुत बड़ी थी लेकिन अपनी पक्की सरकारी नौकरी की तुलना में उन्हें यह कदम जोखिम भरा लगा। उस समय रंजीत स्टूडियो में अजीत और शकीला के साथ फिल्म बारादरी की शूटिंग भी हो रही थी, जिनसे उनका परिचय हुआ। वहीं उनकी मुलाकात प्राण, ओ.पी. रल्हन, सुलोचना चटर्जी और हेरोल्ड लुईस से भी हुई। सिगरेट के शौकीन प्राण सेट पर स्टूडियो बॉय को एक रुपया देकर अपने लिए पान, गोल्ड फ्लेक सिगरेट का एक पैकेट और माचिस मंगवा लेते थे। गुलशन बावरा (गुलशन कुमार मेहता), जिन पर लोकप्रिय गीत ‘लेके पहला-पहला प्यार जादूनगरी से…’ फिल्माया गया था और जिन्होंने अंततः खुद को एक सफल गीतकार के रूप में स्थापित किया, उन दिनों एक संघर्षशील व्यक्ति हुआ करते थे। मेरे पिता को याद है कि जब गुलशन बावरा काम की उम्मीद में स्टूडियो में आकर अपना सारा समय बिताते थे, तो मेरे मामा अक्सर उन्हें दाढ़ी बनवाने और कुछ खाने के लिए बीस रुपये देकर भेज देते थे।
शराबी की नायिका मधुबाला बीमार होने के कारण शूटिंग नहीं कर पा रही थीं। इससे फिल्म की रिलीज 1964 तक टल गई। शराबी के सेट पर मेरे पिता को देव आनंद के रूप में एक और पसंद का साथी मिला। दोनों हम उम्र थे; वह देव आनंद से 18 दिन बड़े थे। उनकी तरह, देव आनंद भी चाय के शौकीन थे। यूनिट में मिट्टी के तेल का स्टोव था जिस पर चाय एक चौड़े मुंह वाले बर्तन में तैयार की जाती थी। चाय के ऐसे विशेष दौर आमतौर पर निर्देशक राज ऋषि, नायक देव आनंद और मेरे पिता के लिए होते थे क्योंकि वे फिल्म निर्माता के बहनोई और मेहमान थे। इन योग्यताओं को ध्यान में रखते हुए, मेरे मामा उन्हें शूटिंग के दिन के अंत में देव आनंद को 5,001 रुपये का लिफ़ाफ़ा सौंपने का काम दे देते थे। कभी-कभी, देव आनंद को परोसी गई चाय पसंद नहीं आती थी और वे कहते थे, “मज़ा नहीं आया; इक वधिया जी चा बनाओ।” यानी, स्वाद कम पड़ गया; कृपया कुछ अच्छी चाय बनवाओ। इसके बाद, “कलकत्ता” को बुलाया जाता था। बंबई के बॉलीवुड के रूप में प्रसिद्ध होने और भारतीय फिल्म उद्योग के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित होने से पहले, भारत की पहली राजधानी, कलकत्ता ही फिल्मों का केंद्र हुआ करती थी। यह “कलकत्ता” एक मल्टी टास्किंग ऑफिस बॉय था; यह उपनाम इसलिए रखा गया था क्योंकि उसने पहले कलकत्ता में फिल्मों में नायक बनने के लिए अपनी किस्मत आजमाई थी। मेरे पिता अपनी देखरेख में वह “अच्छी” चाय बनवाने के लिए स्वेच्छा से तैयार हो जाते थे। खाने के मामले में, देव आनंद को सादा खाना पसंद था और वे घर से टिफिन बॉक्स में सादी रोटी और प्याज के साथ तला करेला लाना पसंद करते थे।
उन छुट्टियों के दौरान, वे एक बार स्टूडियो से लौटते समय, जहाँ वे मेरी माँ को भी ले गए थे, दादर से अंधेरी जाने वाली 0 (हाँ, शून्य) नंबर की बैस्ट बस में सवार हुए। अभिनेता अरुण कुमार को अपने आगे बैठे देखकर, उन्होंने मेरी माँ को बताया कि वे कौन हैं। लेकिन उनके पाँवों की चप्पल देखकर, माँ ने अपना तर्क दिया कि भला एक अभिनेता बस में क्यों यात्रा करेगा? आश्वस्त होकर, मेरे पिता उनके पास गए और पूछा कि क्या वे अभिनेता अरुण कुमार ही हैं। उनके हाँ कहने पर उन्होंने उनकी पत्नी निर्मला देवी के बारे में भी पूछा, जो चालीस के दशक की लोकप्रिय अभिनेत्री और पटियाला घराने की हिंदुस्तानी गायिका थीं। “पाँच बच्चों की माँ है वह; घर पर है, और कहाँ होगी?” उन्होंने मज़ाक में जवाब दिया। अपने फिल्मी नाम से जाने जाते अरुण कुमार का असली नाम गुलशन कुमार आहूजा था और वे पाकिस्तान के गुजरांवाला शहर से थे, जहाँ से मेरी माँ भी थीं। अरुण और निर्मला, बॉलीवुड के सफल अभिनेता गोविंदा के माता-पिता थे।
मेरे पिता के फिल्मी शौक के विपरीत, मेरी माँ फिल्मों या फिल्मी सितारों के प्रति इतनी उत्साही नहीं थीं। धर्मेंद्र की दोहरी भूमिका वाली मेरे मामा की फिल्म समाधि की दो नायिकाएँ थीं – जया भादुड़ी और आशा पारेख। मशहूर हस्तियों द्वारा पहने गए कपड़ों को इकट्ठा करने के लिए नीलामी में ऊँची कीमत चुकाने के आजकल के लोकप्रिय चलन के विपरीत, दूसरों के पहने हुए कपड़ों को छूने से परहेज करने वाली मेरी माँ ने अपनी भाभी द्वारा उस फिल्म में एक-दो दृश्यों के लिए दो लोकप्रिय अभिनेत्रियों द्वारा पहनी गई कुछ महंगी साड़ियाँ उपहार में देने के प्रस्ताव को यूं ठुकरा दिया था।
लेकिन कभी-कभी ऐसी यादगार चीज़ों का संग्रह मशहूर हस्तियों के लिए शर्मनाक भी हो सकता है। अपने उसी फिल्मी प्रवास के दौरान मेरे पिता अक्सर दादर रोड पर रंजीत स्टूडियो के आसपास टहलते रहते थे, एक बार उनका ध्यान एक साबुन विक्रेता की दुकान पर गया जहाँ उस साबुन विक्रेता ने बड़े गर्व से एक कोट शो केस में किसी ट्रॉफी की तरह टांग रखा था जिसे मैटिनी आइडल राज कपूर ने एक बार उन्हें गिरवी रख दिया था और जिसे उसके द्वारा किसी भी कीमत पर फिर वापस नहीं किया गया।







