सन्नाटे की उस शिला पर खड़ी शैली खुद हैरान, ठगी हुई सिर्फ़ शून्य को देख सकती थी। यह वही जगह थी, उसका अपना ससुराल। घर में परिवार के नाम पर थे उसके पति राहुल, उनकी माताजी रोचना देवी और वह खुद। दो बरस बाद परिवार में खुशियाँ खिल उठीं जब घर का वंशज रोहित अपनी माँ शैली व दादी रोचना देवी की गोद में किलकारियां भरने लगा।
शैली अपने बेटे के लालन पालन में मुग्ध सी हो गई और यहीं उसने भूतकाल की ज़मीन पर भविष्य के बीज बोए। वही भविष्य उसका ‘आज’ बन कर उसके सामने खड़ा है। वह खुद सोच की गहराइयों में गुम-सुम, अपने बीते हुए कल की परछाइयों से आती उन सिसकती आवाज़ों को सुन रही है।
‘बहू आओ यहाँ मेरे पास आकर बैठो। लाओ रोहित मुझे दे दो। ’ दशहरे के अवसर पर पंडाल की उस भीड़ में अपने पास कुछ जगह बनाते हुए रोचना ने अपनी बहू शैली को आवाज़ दी। “मम्मी मैं यहीं पीछे खड़ी हूँ, रोहित इनके पास है। ” कहकर शैली आगे बढ़ गयी और तारीकियों के साये में घिरी रोचना बहू को जाते हुए देखती रही। उसे न जाने क्यों आभास होने लगा कि वह जब भी अपनी बहू को पास लाने की कोशिश करती है, वह उतने ही वेग से उससे दूर चली जाती है। यादों की उन खाइयों में उसके साथ रह जाती हैं सिर्फ़ कुछ वेदनात्मक अहसास जो एकान्त में उसे कचोटते। उस नाज़ुक रिश्ते की चुभन को कम करने के लिए वह कुछ अनदेखे आँसू बहा लेती।
यादों की उन खाइयों में रोचना को अपना बीता हुआ कल याद आया जब वह राजीव माथुर की पत्नी बनकर इस घर में आई। घर में परिवार के नाम पर थे उसके पति राजीव, उनकी माताजी ज्ञानेश्वरी देवी और वह खुद। सुहागरात को राजीव ने उसे घर की सम्पूर्ण जानकारी देते हुए एक जवाबदारी को बेहद विश्वास के साथ सौंपते हुए कहा –“आज से मेरी माँ तुम्हारी माँ है, और वह तुम्हारी जवाबदारी है। माँ ने पिता के बाद संघर्षों के पहाड़ों का सामना करते हुए इस समस्त परिवार की जवाबदारियों का निर्वाह करते हुए, आज मुझे और इस परिवार को सँभालते हुए इस वर्तमान में खड़ा किया है। मैं चाहता हूँ कि अब तुम उन्हें इस घर में, अपनी दिल में वह स्थान दो जो आज की पीढ़ी देने से चूक जाती है। उनका सम्मान मेरा अपना सम्मान होगा रोचना!” और रोचना ने बात को गाँठ बाँधकर अपने आचरण से माँ को स्नेह आदर का दर्जा देते हुए तन मन से उनका बढ़पन बरक़रार रखा। आज अपने अतीत के झरोखे से उन पलों की खलाओं में बस निहारती रही।
यह दर्द भी अजीब है, अपने इज़हार के ज़रिये ढूँढ ही लेता है, वरना एकांत के इस कोहरे की घुटन में जीना मुहाल होता। “माँ हम ‘माल’ जा रहे है, आप भी हमारे साथ चलिए!” सुनते ही रोचना के दिल की दहलीज़ पर आशा के दिए झिलमिलाने लगे। हर्षो-उल्लास की भावनाएँ मन ही मन में लिए वह बहू-बेटे के साथ माल पहुंची। पर वहाँ पहुँचकर शैली एक ट्रॉली लेकर दुकानों की भूल भुलैया में खो गई और साथ देने के लिये बेटा राहुल भी चला गया। काफी देर तक राह जोहती रही रोचना, पर कोई पीछे मुड़कर देखने नहीं आया। बस एक बार फिर उस शोर में वह एकल भीड़ का हिस्सा बनकर रह गयी। यह पहली बार नहीं हुआ था, पहले भी कई बार वे उसे भीड़ में यूं अकेला छोड़कर घंटों ग़ायब हो जाते। इस बार-बार के छलावे से उचाट होकर रोचना उनके आने के इंतज़ार में एक बेंच पर बैठ जाती और ख्यालों में अपनी उदासियों को झूठे दिलासों से बहलाती। उस दिन जब वह घर लौटी तो तन के साथ-साथ उसका मन भी बीमार सा हो गया।
मन कहाँ किसी का खाली बैठता है, साथ देने के लिये सोचों के खज़ाने लुटा देता है। रोचना का मस्तिष्क भी तेज़ रफ्तार से उसके चोट खाये हुए मन की उलझनों से जुड़ा रहता। उसे पता ही नहीं पड़ा कि वह उन उलझी हुई सोचों की सेज पर कब सो गई। जब आँख खुली तो एक शफ़ाक़ सोच उसके साथ थी। अब उसे बाहर जाने की बजाय घर की तन्हाई में पड़े रहना ज़्यादा गवारा लगा। जब कभी भी बेटा आकर साथ चलने के लिये कहता तो वह साथ न जाने का कोई न कोई बहाना बताकर घर में रह जाती। कम से कम अनचाही चोट के आघात से तो बची रहती।
“माँ कभी हमारे साथ भी बाहर चला करो, हमेशा घर में बैठी रहती हो।” एक दिन बेटे राहुल ने आकर कहा। जवाब में रोचना का फिर एक नया बहाना दोहराया। अब शैली को अहसास हुआ जा रहा था कि उसकी सास जो उसकी हाँ में हाँ मिलाने के लिए हमेशा आतुर रहती थी, जाने किस कारण बहुत कहने पर भी उनके साथ कहीं आती जाती नहीं। एक दिन शैली ख़ुद सास के पास जाकर उनको साथ चलने के लिए अनुरोध करने लगी। लेकिन रोचना का मन अब एकांत में ठहराव पाने लगा था। वह मन की भावनाओं में हलचल के उतार-चढ़ाव से किनारा करने की आदी होने लगी थी। इसलिए शैली की ओर देखते हुए शांत स्वर में कहने लगी- “नहीं बेटे तुम और राहुल दोनों हो आओ। मैं तुम दोनो के पीछे चलते-चलते बहुत थक जाती हूँ।” सूनी आँखो से अपने बेटे राहुल, जो उसी वक़्त आकर शैली के पीछे खड़ा, उसकी ओर निहारते हुए कहा। रोचना को ऐसे लगा जैसे वह अपने आप से बात करती रही, ख़ुद कहती रही, ख़ुद सुनती रही।
“माँ चलिये न!” अब राहुल ने शैली के सुर में सुर मिलाया।
“बेटे न जाने क्यूँ इस चार दीवारी में मुझे सुकून सा मिलता है।” और अपनी सोच की भीड़ में गुम सुम रोचना अपने आप सिमटती चली गई। शायद वह बखूबी जान गई थी कि बाहर की भीड़ में अकेली पड़ जाने से घर में अकेला रहना बेहतर है।
सपनों का भव्य भवन पलकों में सजाये रखने की हद तक तो सब ठीक है, खुली आंखें सिर्फ टूटे हुए सपनों के बोझ को ढोती है। इन टूटे हुए सपनों के दर्द से खुद को बचा पाना, उस अन्तःहीन पीढ़ा से गुज़रना मुश्किल है। ज़िन्दगी नामुराद ही सही, पर हर किसी को दुबारा मौका देती है। ये अलग बात है कि कोई पदचाप सुन लेता है तो कोई दस्तक भी नहीं सुनता। लेकिन अब उन अनकहे शब्दों की गूँज शैली के दिल पर दस्तक देती रही। वह इतनी भी नासमझ नहीं थी, जो बात की गहराई में लिपटे नंगे सच को न जान पाती। अपने आचरण की उपज के बोए बीजों के कोंपल देख रही थी, अपने नादान रवैये की उपज को देख रही थी, जो लहलहाने की बजाय, सूखकर, मुरझाकर, कुम्हला रही थी। ये भाव नागफनियों की तरह उसकी आँखों में, उसके ज़ेहन में उग रहे थे। अब वह जब कभी भी अपने पति और नन्हे बचे के साथ शॉपिंग माल में जाती, तो उसका मन उसे इस क़दर कचोटता कि वह उस डंक से खुद को बचा न पाती। अपनी ही सोच के तानों से बुने हुए जाल में वह फंसती जा रही थी। उसे आभास होने लगा जैसे उसकी सास रोचना अब उसकी आवाज़ सुनती ही नहीं या सुनना नहीं चाहती। उसके मन के चक्रव्यूह में घुसना शैली के लिये मुश्किल हुआ जा रहा था।
एक दिन रोचना ने एक थैले में कपड़े और ज़रूरत का सामान रखते हुए शैली से कहा- “बहू आज मैं अपनी सहेली कान्ता के घर कीर्तन के लिए जा रही हूँ, दो दिन उसके पास रहकर लौटूँगी।”
शैली ने खाली नज़रों से उनकी ओर देखा पर उसके कुछ कहने के पहले रोचना ने अपने कपड़ों का थैला उठाया और थके हारे क़दमो से घर के बाहर जाने लगी। शैली को लगा जैसे वह अपना भविष्य दरवाज़े से बाहर जाता हुआ देख रही है। अपने मन में मची हलचल के उत्तर चदाव भी वह महसूस कर रही थी। समय के परिवर्तन के साथ जीवन मूल्यों में जो बदलाव आया उसका असली स्वरुप उसके सामने था। काल चक्र शायद इसी को कहते हैं, जहाँ कुछ पुराना मिटता है वहीँ कुछ नया पनपता है। यह सब परिवर्तन का एक हिस्सा है। अगर इन्सान अपने बड़ों में अपना भविष्य देखे तो शायद बेहतर समाज के निर्माण में कोई एक नयी ईंट लगे। सहरा की तपती चट्टान पर गर आज का वृद्ध बैठा हुआ है तो सच मानिये, जवानों के गुलशन का रास्ता भी कल इसी सहरा से होता हुआ गुजरेगा। गुज़रा हुआ कल ‘आज’ बनकर हमारे सामने अगर खड़ा है तो वही आज जब आनेवाले बीते हुए कल में तब्दील होगा तो इतिहास खुद को दोहराएगा। अपनी सोच के चक्रव्यूह से जैसे शैली अचानक जाग उठी।
“माँ रुकिए, में आपको कार में छोड़कर आती हूँ।” अधखुले अधर कहकर भी कह न पाये। उसकी धीमी आवाज़ रोचना के कानों तक न पहुँच पाई। इस एकाकी दुख ने उसके कलेजे में खलल पैदा कर दिया, जहां घुटन के सिवा कुछ न था। उस घुटन का धुआँ धीरे धीरे उसके अस्तित्व को घेरता रहा। धुंध के इस चक्रव्यूह को वह तोड़ना चाहती थी। पर रोचना ने अपने आपको इस क़दर शांत और एकाकी माहौल में ढाल लिया था कि उसे परिवार की हलचल में भी सन्नाटा लगने लगा। उसे तन्हाई से लगाव हो गया था और वह अकेले रहने के मौक़े को तलाशती, बहू से दूर, अपने बेटे से भी दूर, जहाँ उसकी आँखे कभी उनमें अपनेपन की आस न टटोले, जो उसे कहीं भी, किसी भी जगह अकेला छोड़कर चले जाने की हिमाकत कर सकते हैं।
यह सिलसिला कई महीने चलता रहा। रोचना आए दिन अकेली कभी कीर्तन में चली जाती, कभी बाहर बगीचे में घंटो जा बैठती और कुदरत की सुंदरता की अनुपम छवि के साथ घुलमिल जाती। अब शैली को सास का इस तरह घर में होकर भी न होना खलने लगा। उसकी गैर मौजूदगी और भी ज़्यादा खलने लगी। उसे अहसास हुआ कि वह सास को कभी भी अपनी माँ समझ नहीं पाई। यही सोच शायद दूरियां बढ़ाने में मददगार हुईं। हालांकि रोचना हमेशा घर के काम में, रसोई में उसका हाथ बंटाया करती, गैर मौजूदगी में खाना बनाकर रखती। काम वह अब भी करती रही और हो जाने पर अपने कमरे में अकेली पड़ी रहती। घर में इन्सान हो और न हो, कोई आस-पास हो और न हो, तो कैसा महसूस होता है? शैली को इस बात का पूरी तरह आभास हुआ। अपनी नादानियों का नतीजा सामने सर उठाकर उसका मुंह चिढ़ा रहा था।
एक दिन अचानक वह अपनी सास रोचना के कमरे में चले गई, जो उस वक़्त कीर्तन पर जाने की तैयारी में लगी हुई थी।
“माँ आज मैं भी आप के साथ कीर्तन में चलूंगी।”
और रोचना उसकी नम आवाज़ सुनकर चौंकी। सर उठाकर उपर देखा, शैली का पूरा अस्तित्व भीगा भीगा सा था। वह चुनरी के कोने को लपेटते हुए जवाब की प्रतीक्षा में खड़ी रही। कुछ सोचकर रोचना ने कहा ‘अच्छा बहू, मुझे रोहित के कपड़े ला दो, मैं उसे तैयार करती हूँ और तुम जाकर जल्दी तैयार हो आओ। समय हो गया है।’
कीर्तन स्थान पर पहुंच कर रोचना ने एक उचित स्थान ग्रहण किया तो बिल्कुल पास में ही शैली भी बैठ गयी। अपने बेटे रोहित को सास के पास बिठाने की कोशिश की तो रोचना ने झट से पोते को बाहों में लेकर अपनी गोद में बिठा लिया।
शून्य का अर्थ वही जानता है जो उसके सही स्थान का मूल्यांकन कर पाता है । फिर तो एक अनकही, अनसुलझी उलझन ने जैसे निशब्दता में खुशगवार समाधान पा लिया।







