ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
कभी होते थे जो बस तीरगी में
वो सौदे हो रहे अब रोशनी में
न जाऊँ मैं किसी की ज़िन्दगी में
न आये कोई मेरी ज़िन्दगी में
कोई माने न माने सच यही है
ख़ुदा ही छुपके बैठा है ख़ुदी में
अमावस में भी आकर मिल कभी तू
तू मिलता है हमेशा चाँदनी में
किसी को ये न अन्दाज़ा था ‘साहिल’
बयां कर देगा सच तू बेख़ुदी में
********************
ग़ज़ल-
बढ़ी जाती है रेती इस सदी में
कभी पानी बहुत था जिस नदी में
वो नेकी ढूँढता है हर बदी में
वो सतयुग चाहता है इस सदी में
मेरे सब दोस्त आगे बढ़ गये हैं
मैं उलझा ही रहा नेकी बदी में
नहाकर ताज़ादम हो जाओ तुम भी
मेरे अहसास की मीठी नदी में
ये बस्ती किस तरह की है कि जिसमें
नहीं अंतर सुदी में और बदी में
– धर्मेन्द्र गुप्त ‘साहिल’




