उभरते-स्वर
सोचने लगे अगर कलम
सोचने लगे अगर कलम
तब शब्दों का दम घुटता है
काग़ज़ की हथेली रह जाती है सूनी
गर कलम रुक-रुक कर चलती है
लोगों को आईना दिखाने के लिए
बार-बार कलम को रोना पड़ता है
अंगारे अगर बिखरे हो पथ में
तो भी कलम को चलना पड़ता है
फूल अगर मिले राहो में
तो कलम को हँसना पड़ता है
परिस्थिति कैसी भी हो अगर सोचने लगे कलम
तो शब्दों का दम घुटता है।
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घायल
घायल है मन अंदर भी और बाहर भी
घाव हुआ बाहर भी और कहीं अंदर भी
देखो तो अंतरात्मा के घाव भी हैं रिसते
लेकिन वो घाव किसी को भी नहीं दिखते
कितना दर्द भरा है दिल में
मैं दिल में ही छुपा लेता हूँ
कितना भी हर्ष भरा चेहरा दिखा लूँ
पर जो घाव लगे हैं मन मे वो नहीं भरते
घायल है मन अंदर भी और बाहर भी
घाव हुआ बाहर भी और कहीं अंदर भी
– नीरज त्यागी




