विधाता छंद
कहाँ तुम खो गए प्रियतम, तुम्हें दिल याद करता है।
सुनो बेचैन दिल मेरा, तड़प फ़रियाद करता हैं।
निकलता दर्द अश्कों में, सदा दिल में पिघलता है।
ज़रा-सा देखने को दिल, बना पागल मचलता है।
तुम्हारे प्यार का चंचल, इशारा याद आता है।
बिताये थे जहाँ घंटों, किनारा याद आता है।
सुहाना झील का मंजर, शिकारा याद आता है।
ठिठुरती रात में टूटा, सितारा याद आता है।
कभी तुम मुस्कुराती थी, कभी तुम रूठ जाती थी।
कभी तो दूर जाती फिर, पलटकर पास आती थी।
किनारे पे समंदर के, कभी जो नाम लिखते थे।
हमारे प्यार का कितना, मधुर पैगाम लिखते थे।
चले आओ तुम्हारे बिन, कहीं अब जी नहीं बसता।
विरह का पल मुझे साजन, सदा नागिन बना डसता।
बसायें इक नयी दुनिया, जहाँ बस प्यार पलता हो।
जहाँ खुशियाँ बरसती हों, न कोई दर्द मिलता हो।
लगी थी ठेस दिल पे जो, अचानक सामने आयी।
पुराने दर्द उभरे हैं, बने जो आज दुखदायी।
उबरना चाहती कितना, उबर मैं हूँ नहीं पाती।
तड़पती आह भरती हूँ, किसी को कह नहीं पाती।
मुझे आकर वही सूरत, डराती नींद में अक्सर।
सिहर जाता बदन मेरा, अचानक चौंकती डरकर।
भयानक चेहरे दिखते हैं, धरे वो भेस अपनों का।
घरौंदा टूट जाता है, करा अहसास सपनों का।।
– सुनंदा झा





