छंद-संसार
फागुनी दोहे
फसलें पककर झुक गईं, छूने लगीं ज़मीन।
हवा बही जब फागुनी, गोरी हुई हसीन।।
लहरें फगुआ गा रहीं, चूम-चूम तटबंध।
छत पर कुछ बातें हुईं, टूट गए अनुबंध।।
बच्चों की नादानियाँ, और बड़ों के घात।
भूलें सब हैं माफ जब, फागुन की हो बात।।
धूप खिली किरणें हँसीं, शरमाई जब छाँव।
भाँग छानकर मस्त है, देखो सारा गाँव।।
झाँझ-मँजीरे-ढोल के, जाग उठे सौभाग।
गली-मुहल्ले गूँजते, बेलवरिया औ फाग।।
होली के उन्माद में, बहका हरसिंगार।
तोता-मैना के हृदय, उमड़ा दूना प्यार।।
मन भौंरा बन उड़ चला, गया फूल के पास।
बोल-बोल मीठे बचन, लेने लगा सुबास।।
सजीं तितलियाँ आँख में, डाले काजल आज।
रह-रह भौंरों को सभी, देती हैं आवाज़।।
संकेतों का व्याकरण, पढ़ने लगा समाज।
उन्मादों के शोर में, फागुन का आगाज।।
बच्चे-बूढ़े या युवा, सबके हाथ गुलाल।
मलने को आतुर हुए, खोजें कोई गाल।।
यह उत्सव आनंद का, प्रेम भरा उपहार।
आपस में सौहार्द हो, तभी सफल त्योहार।।
– अरविन्द अवस्थी




