लंबे समय से हमारे समाज में, विवाह को एक पवित्र बंधन, सभ्यता की आधारशिला, मूल्यों को पोषित करने और अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने की संस्था माना जाता रहा है। शास्त्र इसकी प्रशंसा से भरे हुए हैं, अनुष्ठानों में इस रिश्ते का भरपूर मान है। कानूनों द्वारा भी यह रिश्ता मान्य है और संरक्षित किया जाता है। लेकिन इक्कीसवीं सदी के ठीक मध्य में, जब समाज बदलती लिंग भूमिकाओं, व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता और अनियंत्रित पितृसत्ता के स्याह पक्ष से जूझ रहा है, तो यह पूछना आवश्यक हो जाता है कि क्या विवाह अभी भी वह महान संस्था है जो इसे होना चाहिए था? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह कुछ अहंकारी ‘मर्दों’ के अन्याय को परंपरा के पीछे छिपाने का एक सुविधापूर्ण मंच बन गया है?
इससे भी ज़्यादा आवश्यक प्रश्न यह है कि सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिकता को बनाए और बचाए रखने की ज़िम्मेदारी सीधे स्त्रियों के कंधों पर ही क्यों डाल दी जाती है जबकि सामाजिक विमर्श में उनका दर्द और शोषण अदृश्य रहता है?
आइए, सर्वप्रथम इस असहज सच्चाई को स्वीकार करें कि आजादी की प्लेटिनम जुबली मना लेने के बावजूद भी आधुनिक समाज में स्त्रियाँ अभी भी असुरक्षित हैं। तकनीकी प्रगति, आर्थिक विकास और बढ़ती शिक्षा के बावजूद, लिंग आधारित हिंसा एक गंभीर वास्तविकता बनी हुई है। वैश्विक आँकड़ों के अनुसार, हज़ारों स्त्रियाँ हर दिन यौन शोषण, बलात्कार, घरेलू हिंसा और यहाँ तक कि हत्या का सामना करती हैं और फिर भी इक्का-दुक्का छोड़कर ये मामले शायद ही कभी सामूहिक आक्रोश को जन्म देते हैं। इन अपराधों के इर्द-गिर्द की शर्मनाक चुप्पी बहरा कर देने वाली है।
अब जब स्त्रियों द्वारा झूठे आरोप लगाने या सुरक्षात्मक कानूनों के दुरुपयोग के कुछ मामले सामने आते हैं, तो अपनी प्रतिक्रिया देखें। सार्वजनिक विमर्श नाटकीय रूप से बदल जाता है। मीडिया की सुर्खियाँ चीखने लगती हैं कि ‘पुरुषों को पीड़ित किया जा रहा है’। सोशल मीडिया पुरुषों की पीड़ा के बारे में हैशटैग से भर जाता है और अचानक स्त्रियों के संघर्षों की वैधता पर प्रश्न उठने लगते हैं। यह आक्रोश गलत नहीं लेकिन इसके केंद्र में स्त्रियों को घसीटकर, आप उनकी बीते सात-आठ दशकों से चल रही लड़ाई को एक ही झटके में जमींदोज़ कर देते हैं।
यह स्पष्ट रूप से कहना महत्वपूर्ण है कि कोई भी पुरुष बिना सबूत के झूठे आरोप लगाने या सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा होने का हकदार नहीं है। सोनम या मुस्कान जैसी घटनाएँ जहाँ कथित रूप से झूठे आरोपों के कारण पुरुषों का जीवन नष्ट हुआ, अत्यंत निंदनीय हैं। ऐसी घटनाएँ किसी भी स्थिति में दोहराई नहीं जानी चाहिए। लेकिन मूल मुद्दा यह है कि जो समाज ऐसे मुट्ठी भर मामलों से इतना परेशान हो उठता है वह स्त्रियों के खिलाफ रोजाना होने वाले अपराधों की बाढ़ पर सहजता से आँखें क्यों मूंद लेता है?
यह प्रतिक्रिया एक गहरे सामाजिक पाखंड को दर्शाती है। स्त्रियों के दर्द को इस हद तक सामान्य बना दिया गया है कि अब यह मुश्किल से ही दर्ज होता है। सड़क पर किसी स्त्री को परेशान किया जाना, घर में उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाना या अदालत में न्याय से वंचित किया जाना आम बात जो हो गई है। दूसरी ओर, पुरुषों के दर्द को असाधारण, असहनीय, निंदनीय और तत्काल निवारण लायक माना जाता है। सहानुभूति में यह असंतुलन न केवल लिंग पूर्वाग्रह को दर्शाता है, बल्कि हमारे नैतिक ढांचे में एक बुनियादी दोष का भी पर्दाफाश करता है।
सोशल मीडिया पर स्त्रियों की पोस्ट पर कमेंट्स देखिए किसी भी स्त्री को ‘वैश्या’ कह देना इनके लिए आम है लेकिन कहते हुए वे यह भूल जाते हैं कि वेश्यागमन की प्रवृत्ति के केंद्र में एक पुरुष ही आता है। वहाँ से सुधार क्यों नहीं शुरू करते? कई फिल्म स्टार या खिलाड़ियों की वॉल पर भी कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं इस हद तक गंदगी और अश्लीलता से भरी होती हैं कि घिन आती है और यह भी लगता है कि जो व्यक्ति खुलेआम अपनी गंदी सोच का प्रदर्शन करता है ऐसी कुत्सित मानसिकता वाले पुरुषों के घरों, मोहल्लों की बच्चियाँ और स्त्रियाँ कैसे और कितनी सुरक्षित रह पाती होंगी । इन पुरुषों की भद्दी भाषा और अश्लील सामग्री पर सोशल मीडिया के स्टैन्डर्ड भी मेंटेन रहते हैं, चाहे कितना भी रिपोर्ट करो; जवाब यही आता है कि ‘हमने कम्यूनिटी स्टैन्डर्ड के खिलाफ कुछ नहीं पाया!’
इस तथ्य को भी थोड़ी हिचक के साथ ही सही पर स्वीकार लेना चाहिए कि एक महान संस्था के रूप में विवाह का आदर्श भी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कई स्त्रियों के लिए, विवाह अब एक आश्रय नहीं बल्कि एक जाल है, एक ऐसी संस्था जहां दुर्व्यवहार को आंतरिक रूप से स्वीकार किया जाता है और चुप्पी को पुरस्कृत किया जाता है। जबकि पुरुषों को अक्सर नेतृत्व करने, हावी होने और निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, स्त्रियों को समझौता करने, अपनी इच्छाओं की तिलांजलि देने और बलिदान करने के लिए कहा जाता है। अब तक तो चल जाता था लेकिन अब आत्मनिर्भर स्त्री, आत्मसम्मान से जीने की इच्छा रखती है तो उसमें कष्ट क्यों है? क्या वह सिर्फ स्नेह और सम्मान देने को ही बनी है स्वयं उसकी अधिकारी नहीं? यदि विवाह विफल हो जाता है, तो समाज तुरंत स्त्री के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। कुछ लोग परिवार को एक साथ रखने की उसकी क्षमता या परंपरा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठाने लगते हैं। इस सबके बीच पुरुष की शायद ही कभी उसी तरह से जांच की जाती है। क्या यह असंतुलन साझेदारी है? फेरों पर लिए गए सात वचनों को निभाने की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की नहीं होती?
यदि है तो फिर स्त्रियों को ही संस्कृति को बनाए रखने का बोझ क्यों उठाना चाहिए? बेटियों को ही परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए क्यों प्रशिक्षित किया जाना चाहिए? यदि यही प्रशिक्षण बेटों और घर के पुरुषों को दे दिया जाता तो न जाने कितनी पीढ़ियाँ धन्य हो चुकी होतीं! अब समय बदलता दिख रहा है लेकिन अब तक तो बेटों को अधिकार और मालिक होने की भावना के साथ पाला जाता रहा है। बिना यह सोचे कि संस्कृति किसी एक लिंग की संपत्ति नहीं है। इसे सामूहिक रूप से बनाया जाता है और इसे सामूहिक रूप से ही संरक्षित किया जा सकता है। दुर्भाग्य यह कि हम जिस समाज का हिस्सा हैं, वहाँ पुरुषों को हिंसा, विश्वासघात या अन्याय के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता है बल्कि बलात्कारी की आरती उतारी जाती है। इन्हें नहीं मालूम कि उनके इस कृत्य से केवल स्त्रियाँ ही पीड़ित या दुखी नहीं होती हैं बल्कि एक पूरे समाज का पतन होता है। साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए भी दर्द की पटकथा लिख दी जाती है।
न्याय का तो क्या ही कहा जाए! स्त्रियों के खिलाफ अपराध प्रायः सिद्ध ही नहीं होते और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ की कहानी हाथ आती है। कहीं न्याय में ऐसी अंतहीन देरी होती है कि यह स्पष्ट संदेश समझ आ ही जाता है कि आपकी पीड़ा मायने नहीं रखती। यह दुख तब और बढ़ जाता है जब किसी पुरुष पर झूठा आरोप लगाने का दुर्लभ मामला राष्ट्रीय जुनून बन जाता है। एक भ्रम पैदा किया जाने लगता है कि स्त्रियों के पास तो बहुत अधिक शक्ति है और वे एक ही आरोप से पुरुषों के जीवन को खराब कर सकती हैं। बल्कि यह भय भी फैलाया जाता है कि इन्हें कंट्रोल करो नहीं तो सम्पूर्ण पुरुष जाति ही नष्ट हो जाएगी। सदियों से निरंतर चले आ रहे पितृसत्तात्मक समाज में इतनी बिलबिलाहट इसलिए नहीं है कि उसे स्त्री से भय लगने लगा है बल्कि वह तो इसलिए घबराया हुआ है कि अब उसे, स्वयं के अपराधों पर लगाम लगानी होगी! किसी को छेड़ने से पहले सौ बार सोचना होगा क्योंकि जिसे वह कोमलांगी समझ धौंस जमाता आया था और जिस पर अत्याचार करके ही उसका पौरुष पूर्णता प्राप्त करता था, वह आधिपत्य थोड़ा सरक रहा है। लेकिन वास्तव में, एक स्त्री पर अविश्वास किया जाना, उसे परेशान किया जाना या उसके खुद के उत्पीड़न के लिए उसे दोषी ठहराया जाना अभी भी कहीं अधिक आम है।
हमें इन आख्यानों को आकार देने में मीडिया, सोशल मीडिया और कानूनी व्यवस्था की भूमिका पर भी विचार करना होगा। सनसनीखेज कवरेज अक्सर लिंगों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देता है, जिससे जटिल सामाजिक मुद्दे कोर्टरूम ड्रामा और सोशल मीडिया बहस तक सीमित हो जाते हैं। यहाँ तो हर कोई न्यायाधीश बना बैठा है। जबकि सच्चाई कहीं मध्य में है। हर कोई अपराधी नहीं। स्त्री और पुरुष दोनों ही गलत काम करने में सक्षम हैं। दोनों ही अच्छे भी हैं।
कानून की आँखों पर बँधी पट्टी भी यही कहती थी कि न्याय को निष्पक्ष रह लिंग, जाति, धर्म के प्रति अंधा हो जाना चाहिए। लेकिन यह समानता तभी प्राप्त की जा सकती है जब सहानुभूति, विश्वसनीयता और ध्येय भी समान हों।
समाधान, एक लिंग को बदनाम करने या दूसरे का आँख मूंदकर बचाव करने में नहीं है। यह एक ऐसे समाज के निर्माण में है जहाँ स्त्री और पुरुष दोनों ही जवाबदेह हों, जहाँ लिंग की परवाह किए बिना पीड़ितों की बात सुनी जाए और जहाँ सांस्कृतिक मूल्यों का इस्तेमाल उत्पीड़न के लिए ढाल के रूप में न किया जाए। विवाह, यदि इसे एक महान संस्था बना रहना है, तो इसे समानता, सम्मान और सहमति के आधार पर एक सच्ची साझेदारी में विकसित होना चाहिए न कि पुरानी लिंग आधारित भूमिकाओं में।
अब आधुनिक समाज में लिंग, न्याय, नैतिकता का बोझ उठाने और सांस्कृतिक अपेक्षाओं पर पुनर्विचार का समय आ गया है। यह बताने की बजाय कि क्या स्त्रियाँ अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही हैं, हमें यह पूछना चाहिए कि व्यवस्था अभी भी उनके खिलाफ़ क्यों है? यह चिंता करने की बजाय कि क्या आधुनिकता विवाह को नष्ट कर रही है, हमें उन हज़ारों मौन, बेमेल, नाक की खातिर जबरन कराए गए विवाहों के बारे में चिंता करनी चाहिए जहाँ पीड़ित पत्नियाँ अपने पति की अय्याशियों, उससे रोजाना मार खाने के बाद भी चुपचाप निभाए जा रहीं!
पुनश्च कहूँगी कि अन्याय का सामना करने वाले पुरुष के दुर्लभ मामलों को अवश्य संज्ञान में लिया जाना चाहिए। इनमें संलिप्त लोगों पर पर कड़ी कार्रवाई भी होना चाहिए लेकिन इतना चौंकने की जरूरत भी नहीं। इसकी बजाय हमें उन अनगिनत मामलों से भी ताउम्र नाराज़ रहना चाहिए जहाँ स्त्रियों को अपराधियों के खिलाफ कभी बोलने का मौका ही नहीं मिला। जहाँ वे कभी तेजाब, कभी आग, कभी खाई, कभी तंदूर और कभी नदी के हवाले कर दी गईं। जहाँ रोज उनकी अस्मिता से खिलवाड़ होता रहा और हमने ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी’ बुदबुदाकर मौन धर लिया।
जहाँ तक संस्कार, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा की बात है तो जिस दिन इस समाज के सभी पुरुष और खासतौर से नेता संस्कारी होना शुरू कर देंगे, स्थिति अपने आप बेहतर हो जाएगी। मानव जाति का संतुलन तब सर्वश्रेष्ठ हो जाएगा, जब लोग अपराधी को अपनी राजनीतिक विचारधारा से नहीं बल्कि उसके अपराध के आधार पर देखना शुरू कर देंगे। हम तभी एक न्यायपूर्ण, दयालु और विकसित समाज होने का दावा कर सकते हैं जब अपराधियों के विरोध में सभी देशवासी एक साथ खड़े होंगे। देश तब सुंदर होगा जब राजनीतिक दल अपने समर्थकों को अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे। दुनिया तब सुकून से रहने लायक हो जाएगी जब अपराधियों को प्रश्रय देने वाली राजनीति की काली पट्टी आम जनता की आँखों से उतार दी जाएगी।
स्त्रियाँ तो सदैव ही सभ्यता की पोषक रही हैं और वे यह भी खूब जानती हैं कि इस दुनिया की सुंदरता भी उन्हीं से है। खास बात यह है कि उन्हें यह भरोसा उन पुरुषों से मिला है जिन्होंने स्त्रियों का यह विश्वास अब भी जीवित रखा है कि सारे पुरुष बुरे नहीं होते!







