यह लेख किसी मृत्यु की आधिकारिक सूचना नहीं है और न ही किसी व्यक्ति के देहांत की घोषणा। यह लेख उस मानसिकता के विरुद्ध एक आलोचनात्मक हस्तक्षेप है, जिसमें युद्ध को तमाशा और मृत्यु को मनोरंजन में बदल दिया गया है। हाल के दिनों में जिस प्रकार ईरान, अमेरिका और इज़राइल से जुड़ी ख़बरें, वीडियो और पुष्ट-अपुष्ट दावे सोशल मीडिया पर फैलाए गए और जिस तरह एक वर्ग ने उनमें हँसी और उत्सव खोजा, वह आधुनिक वैश्विक समाज के नैतिक पतन का गहरा संकेत है।
कल्पना कीजिए और केवल कल्पना कीजिए कि यदि किसी युद्ध में ईरान का सर्वोच्च नेतृत्व समाप्त हो जाता है, तो क्या वह क्षण मनुष्यता के लिए हर्ष का कारण होता है? और ख़ामेनेई ही क्यों उसकी जगह कोई भी हो फिर। अली ख़ामेनेई वैचारिक रूप से कोई भी हों, उनसे सहमति या असहमति अलग विषय है, लेकिन किसी भी व्यक्ति की मृत्यु पर सार्वजनिक उपहास, वीडियो बनाकर ठहाके लगाना, सोशल मीडिया में प्रतिक्रियाएं हास्य के रूप में देना और उसे वैचारिक जीत समझना, दरअसल अपने ही नैतिक दिवालियापन की घोषणा है। यह श्रद्धांजलि किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस विवेक को है जो आज युद्ध की चीख़ में दबता जा रहा है।
यथार्थ यह है कि ईरान और भारत के संबंध केवल सामयिक राजनीतिक नहीं रहे हैं। ऊर्जा सहयोग, व्यापारिक साझेदारी, चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएँ और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संवाद ये सभी भारत-ईरान रिश्तों की गहराई को दिखाते हैं। फ़ारसी और भारतीय सभ्यताओं का संवाद सदियों पुराना है, जिसे किसी एक युद्ध या अफ़वाह के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। इसलिए ईरान से जुड़ी किसी भी हिंसक घटना पर ताली बजाना, दरअसल भारत की अपनी ऐतिहासिक दृष्टि से मुँह मोड़ना है।
दूसरी ओर, भारत के अमेरिका और इज़राइल के साथ संबंध भी उतने ही यथार्थपरक और जटिल हैं। अमेरिका भारत का बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है, जबकि इज़राइल के साथ रक्षा, कृषि और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है। भारत की विदेश नीति किसी एक ध्रुव से बँधी नहीं रही, बल्कि वह संतुलन, बहुपक्षीयता और राष्ट्रीय हित पर आधारित रही है। ऐसे में किसी एक नेता की यात्रा या कूटनीतिक संवाद को युद्ध की साज़िश से जोड़कर देखना, वैश्विक राजनीति की अपरिपक्व समझ का परिणाम है।
आज का सबसे खतरनाक हथियार मिसाइल नहीं, बल्कि अफ़वाह है। एक अपुष्ट वीडियो, एक झूठा दावा और एक उत्तेजक शीर्षक और पूरा समाज बिना जाँच-पड़ताल के निर्णय सुना देता है। यह अफ़वाहों की हिंसा है, जिसमें न खून दिखता है, न बारूद, लेकिन भरोसा, विवेक और सामाजिक संतुलन चुपचाप नष्ट हो जाते हैं। युद्ध से पहले सच मरता है यह कथन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब युद्ध पर शोक नहीं, हँसी होती है। किसी राष्ट्र, किसी नेता या किसी समाज की तबाही पर ठहाके लगाना यह दर्शाता है कि हमने मनुष्य को नहीं, केवल पक्ष चुना है। आज यदि ईरान पर हँसा जा रहा है, तो कल वही हँसी किसी और के हिस्से आएगी। युद्ध की यह संस्कृति अंततः किसी भी सीमा या पहचान को नहीं मानती।
भारत की चुप्पी या संतुलित प्रतिक्रिया को कायरता समझना भी एक सतही निष्कर्ष है। भारत जानता है कि तात्कालिक उत्तेजना से नहीं, दीर्घकालिक विवेक से राष्ट्र चलते हैं। वह न युद्ध का उत्सव मनाता है, न मृत्यु का उपहास करता है। यही उसकी सभ्यतागत पहचान रही है।
अंततः यह लेख किसी व्यक्ति, किसी सत्ता या किसी राष्ट्र के लिए नहीं, बल्कि उस समाज के लिए एक चेतावनी है जो मृत्यु पर हँसना सीख रहा है। यदि यह लेख असहज करता है, तो शायद वह अपना उद्देश्य पूरा करता है, क्योंकि असहजता ही अभी मनुष्यता के जीवित होने का अंतिम प्रमाण है।
हँसी के समय में शोक …….
कहा गया
कि रात के नक़्शे पर
आग की लकीरें खिंचीं,
कि आकाश में धातु ने
प्रार्थनाओं को चीर दिया।
कहा गया
कि एक नाम
जो सदियों के इतिहास में
सत्ता और आस्था के बीच
एक भारी परछाईं था,
अब ख़ामोशी में बदल गया।
और उसी क्षण
मोबाइल की नीली रोशनी में
दुनिया हँसने लगी।
किसी ने लिखा
“अच्छा हुआ”
किसी ने कहा
“इंसाफ़”
किसी ने तालियाँ बजाईं
किसी ने मीम बना दिया।
हँसी वायरल थी,
मृत्यु बस एक नोटिफ़िकेशन।
उधर
किसी गली में
एक बूढ़ी माँ ने
दीवार से सिर टेक दिया,
किसी बच्चे ने पूछा
“अब अज़ान कौन देगा?”
लेकिन ये सवाल
ट्रेंड नहीं करते।
कुछ लोग जश्न में थे
क्योंकि उन्हें सत्ता से
नफ़रत थी,
कुछ रो रहे थे
क्योंकि उन्हें इंसान से
लगाव था।
और भारत
जिसकी दोस्ती
ईरान से इतिहास में
इत्र की तरह दर्ज है,
जो इज़राइल से
तकनीक सीखता है,
जो अमेरिका से
बाज़ार समझता है
वह भारत
इस बार
चुप था।
शब्द नहीं गिरे,
श्रद्धांजलि नहीं आई,
न शोक, न समर्थन
बस मौन।
कूटनीति शायद यही है
कि जब दुनिया जल रही हो
तो बयान तौल कर दिया जाए,
या न दिया जाए।
पर कविता पूछती है
क्या मौन भी
कभी-कभी
एक पक्ष नहीं बन जाता?
और जो लोग हँसे—
उनसे यह व्यंग्य कहता है
आज तुम किसी और की
मौत पर हँसे हो,
कल तुम्हारी पीड़ा पर
कोई और
रील बनाएगा।
इतिहास बहुत धैर्यवान है,
वह सब दर्ज करता है
बम भी,
मौन भी,
और हँसी भी।






