हिंदी साहित्य में कविता को अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम माना गया है, सदियों से ही मानव-भाव और मानवीय मूल्य की रक्षा करने की विधा है। हिंदी साहित्य में नागार्जुन और युद्ध प्रसाद मिश्र की कविताएँ मानवीय मूल्य और मुक्ति की चेतना का एक सफल उदाहरण है। नागार्जुन और युद्ध प्रसाद मिश्र की कविताओं में भारतीय-नेपाली जन-जीवन की विभिन्न छवियां अपना रूप लेकर प्रकट हुई हैं। दोनों कवियों ने कविता के विषय-वस्तु के रूप में प्रकृति से लेकर जन साधारण के जीवन को, उनकी विभिन्न समस्याओं को, शोषण-उत्पीड़न की अटूट परंपरा को व जनता के संघर्ष-शक्ति को अत्यंत सशक्त ढंग से इस्तेमाल किया है। नागार्जुन और युद्ध प्रसाद मिश्र की कविताएँ अपने समय की हर महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रहार करती हैं। दोनों ही ऐसे हरफ़नमौला शख्सियत थे जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं और भाषाओं में लेखन के साथ-साथ जनान्दोलन को भी साहित्य का हिस्सा बनाया था। दोनों कवियों के व्यक्तित्व और कृतित्व में काफ़ी समानता थी, यही वजह है कि युद्ध प्रसाद मिश्र को ‘नेपाल का नागार्जुन’ माना जाता है।
साहित्य में नागार्जुन और युद्ध प्रसाद मिश्र की कविताएँ भारत और नेपाल की उन समस्याओं पर चोट करती है जो मानव मुक्ति व मानव सरोकार से जुड़े प्रश्न हैं। इन दोनों कवियों की कविताएँ भारत और नेपाल की साहित्यिक संबंधों को आपस में जोड़ने व मजबूत करने में विशिष्ट भूमिका निभाते हैं। दोनों ही कवि ग़रीब जनता और बेबस लोगों की बात करने से जरा भी नहीं कतराते हैं। प्रो. अरुण होता लिखते हैं- “नागार्जुन और युद्ध प्रसाद मिश्र की कविताओं में व्यक्त मुक्ति की चेतना को रेखांकित करते हुए कहा कि ‘सत्ता हर काल में दमनकारी होती है।’ दोनों रचनाकारों के परिवर्तनकारी कामनाएँ एक तरफ आम आदमी की दयनीय दशा और दूसरी तरफ सत्ता के दमन चक्र से लड़ाई करती हैं। इनकी कविताओं में प्रतिरोध का स्वर और उम्मीद की किरण दोनों ही लक्षित होते हैं जिनमें जनतांत्रिक मूल्यों का सर्वाधिक स्थान है।”1
दोनों ही कवि अपनी कविताओं के ज़रिये साफगोई और जन सरोकार के मुद्दे को बड़ी मुखरता के साथ उठाया है। वैसे केवल अगर नागार्जुन की कविताओं की ओर ग़ौर करें तो उनकी कविताओं का प्रभाव आज भी प्रभावशाली और प्रासंगिक दिखाई देता है। वे हिंदी साहित्य के छायावाद, प्रगतिवाद, हालावाद, प्रयोगवाद, नयी कविता, जनवादी कविता, नवगीत, बीट कविता, अकविता जैसी कई धाराओं के समकालीन होकर गुज़रे हैं, लेकिन उनकी कविताएँ जन-जन के व्यापक सरोकारों के चलते अपनी आधारभूत प्रतिबद्धता के धरातल पर अडिग रही है। वे मार्क्सवाद से बेहद प्रभावित थे; पर बौद्ध विचारधारा के भी प्रबल पक्षधर थे। नागार्जुन ने अपनी लेखनी से केवल हिंदी ही नहीं, संस्कृत, बांग्ला व मैथिली भाषा के साहित्य को भी समृद्ध किया है। उनकी ख़ुद की अपनी एक दर्शन शैली रही है जिसका केन्द्रबिन्दु निश्चित तौर पर मानव और मानवोचित जीवन की उत्कट चाह ही रहा है। उनके काव्य की अंतर्वस्तु का दायरा इतना वृहत था कि वे सामंती व्यवस्था-सोच, जीवन की विसंगतियाँ-अंतर्विरोध, राजनीतिक व्यंग्य, निजी जीवन-प्रसंग, प्रकृति चित्रण जैसे तमाम विषयों अपनी कविताओं में विशेष स्थान देते हैं। उनके रचना संसार का शुभारंभ मैथिली में ‘पत्रहीन नग्न गाछ (काव्य-संग्रह) से हुआ। उनका पहला काव्य-संग्रह, ‘युगधारा’ (1953), जिसमें उनके युवावस्था की विचारधारा और काव्य क्षेत्र में नयेपन की पहचान है। इसके बाद उन्होंने कई काव्य संग्रह प्रकाशित किए, जिनमें ‘सतरंगे पंखोवाली’ (1959), ‘प्यासी पथराई आँखें’ (1962), ‘तालाब की मछलियाँ’ (1974), ‘तुमने कहा था’ (1980) और ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ (1980), ‘हजार-हजार बाहोंवाली’ (1981), ‘पुरानी जूतियों का कोरस’ (1983), ‘ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या’ (1985), ‘आखिर ऐसा क्या कह दिया मैनें?’ (1986), ‘इस गुब्बारे की छाया में’ (1990), ‘भूल जाओ पुराने सपने’ (1994), ‘भष्मांकुर’ (1983), और ‘रत्नगर्भ’ (1974) खण्ड काव्य शामिल हैं। इन रचनाओं में नागार्जुन ने सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों, प्रेम, भाईचारा, भ्रष्टाचार, न्याय, और आधुनिक जीवन के विविध पहलुओं को बड़ी संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है।
नागार्जुन की अधिकांश कविताएं ग्रामीण जीवन और उनके यथार्थवादी जिंदगी पर आधारित है। जनता से गहरे लगाव और अपने स्वछन्द स्वभाव के कारण ज़मीनी हक़ीकत से जुड़े रहे हैं। नागार्जुन की कविताओं में राजनीतिक हस्तक्षेप दिखाई देता है। वे जहां नेहरू और इन्दिरा की जनहितकारी नीतियों की प्रशंसा करने से नहीं कतराते हैं वहीं उनके गलत कामों के प्रति हमेशा ही सख्त रुख भी इख़्तियार करते हुए नज़र आते हैं। वे रघुवीर सहाय की तरह महानगरीय बोध तक सीमित रहने वाली कविता नहीं रचते हैं। अकाल की परिस्थिति में लिखी गई कविता ‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास’ से उन्हें बखूबी समझा जा सकता है-
‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआं उठा आंगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आंखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद।’
बिहार में साठ के दशक के दौरान अकाल की स्थिति बनी हुई थी, जब स्थितियां सुधरने लगीं तो यह कविता उनके ज़हन से निकली। भूख के दर्द को अपनी कविता के माध्यम से शब्दबद्ध करके मुक्ति की चेतना जागृत करने का प्रयास किया है। नागार्जुन की प्रस्तुत कविता में चूल्हा रोता है, चक्की उदास होती है। यहां ‘दुख’ अकेला नहीं रहता है, वह एकता का भाव पैदा करता है, जिसमें कानी कुतिया को भी इंसान के पास सोने की जगह मिलती है। यहां घर में अन्न के दाने के आगमन के साथ ही परिवार के लोगों के साथ आस-पास के जीव जन्तुओं में भी ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ती है और उनमें एक उम्मीद की किरण दिखाई देती है। आम लोगों की ख़ुशी को कवि ने बड़ी सहजता के साथ अभिव्यक्त किया है। बाबा सही मायने में गरीब,शोषित,वंचित, किसान व जनसाधारण की बुलंद आवाज थे।
नागार्जुन छायावादोत्तर काल के एक मात्र ऐसे कवि हैं जिनकी कविता चौपालों से लेकर विद्वत जन तक, छंद बद्ध से लेकर छंद मुक्त तक, धारदार से लेकर तीखी से लेकर चटपटी तक, तत्सम से लेकर जनपदीय भाषा तक, जीवन्त से लेकर ज़ोश-ख़रोश तक ऐसी रवानगी है कि मानों दिलो-दिमाग़ की गहराइयों में सीधे समा जाए। उन्हें जन-मन की गहरी समझ थी। इसी वजह से उनकी प्रतिबद्धता जन-मन और उसके शोषित-उपेक्षित सरोकारों से थी। तभी तो न केवल कवियों-साहित्यकारों ने अपितु स्वयं बाबा नागार्जुन ने डंके की चोट पर स्वयं को ‘जनकवि’ के रूप में घोषित किया है। ‘जनकवि’ होने का एहसास कवि इस अंदाज में बताते हैं-
‘जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊँ?
जनकवि हूँ मैं, साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊं!’
(कविता: भारत भूमि में प्रजातंत्र का बुरा हाल है)
यही ‘साफ़ कहूँगा’ की साफ़गोयी ‘जनकवि’ की कविता की ‘रूह’ है। व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो बाबा नागार्जुन का रचना काल कई साहित्यिक धाराओं एवं वादों का विस्तृत फ़लक को समेटे हुए है।
बाबा ने असाधारण व्यंग्य शैली का इस्तेमाल अपनी कविताओं में किया है, जिसके चलते आज भी उन्हें याद किया जाता है। नामवर सिंह नागार्जुन को कबीर के बाद सबसे बड़ा व्यंग्यकार स्वीकार करते हैं। प्रकृति और गाँव-शहर से जुड़ी कविताओं में भी व्यंग्य का स्वर दिखाई देता है। गाँव और शहर पर लिखी उनकी व्यंग्य कविता का उदाहरण—
‘दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे, अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत?
जी तो नहीं कुढता है?
घिन तो नहीं आती है?’
नागार्जुन ने अपने काव्य में सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य का भरपूर इस्तेमाल किया है। इसी को इंगित करते हुए सुभाष जी कथन है- “नागार्जुन जैसा सार्थक और तीक्ष्ण व्यंग्य बहुत कम कवियों में देखने को मिलता है। सामाजिक प्रश्न हो या आर्थिक समस्या, कवि ने यथास्थितियों का आकलन करते हुए बड़े सजग ढंग से विनोद और व्यंग्य के माध्यम से उसे सुलझाने का प्रयास किया है। आर्थिक स्थिति आज जितनी शोचनीय है उतनी पहले कभी नहीं थी। इसी संदर्भ में देश की आर्थिक स्थिति दिन पर दिन कितनी भयानक होती जा रही है तथा गरीब और गरीब तथा धनिक और धनिक होते जा रहे हैं। इसका अत्यन्त वास्तववादी चित्रण कवि ने अपनी प्रसि( कविता “मन करता है” में किया है।”२ उनके काव्य में जहाँ एक तरफ़ सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य है वहीं दूसरी तरफ़ प्रेम, वात्सल्य, करुणा और सौंदर्य हैं। नागार्जुन निरे व्यंग्य कवि नहीं है बल्कि वे इससे अधिक कुछ है। ठीक इसी प्रकार आम लोगों की समस्या को केंद्र में लाते हैं और उन्हें जागृत करने का प्रयत्न करते हैं। ‘लक्ष्मी’ नामक कविता में महल-झोंपड़ी को आमने सामने रखकर बेकारी, मजदूरों की छंटनी, ऋणग्रस्तता जैसे सामाजिक समस्याओं का वर्णन किया है —
‘बेकार है जनबल। हाथों पर चल रही है अँटनी की आरी
ओर है न छोर है। अपव्यय का जोर है।
कब तक चलेगा ऋण कब तक उधारी |
झुकाकर व्यथित माथ। खाली मन खाली हाथ ।
पूजे तुम्हें कैसे कोटि नर-नारी।’
ग्रामीण परिवेश की गरीबी-बेबसी एवं लाचारी का नग्नरूप यहाँ पूरी मानवीय संवेदना से चित्रित हुआ है। कवि ने यहां गरीब व्यक्ति की अभावग्रस्त जिन्दगी का चित्रण किया है। इसमें जीवन की विसंगतियाँ, विषमताएँ, विद्रुपताएँ बड़ी मार्मिकता से चित्रित हैं।
नागार्जुन की तरह युद्ध प्रसाद मिश्र भी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे और उनकी साहित्यिक रचनाओं ने नेपाली साहित्य को समृद्ध करने में विशिष्ट भूमिका निभाई है। युद्ध प्रसाद मिश्र अपने दृढ़ संकल्प-विश्वास पर खरा उतरने में यकीं रखते थे जिसकी वजह से वह एक ईमानदार एवं आत्मविश्वासी व्यक्तित्व के रूप में परिचित थे। मिश्र जी की काव्य-सृजन की प्रवृत्तियों में विविधता सहज ही देखा जा सकता है। वह जिस देश ,काल व वातावरण में रहें हैं उन्हीं परिस्थितियों ने उन्हें विविधता प्रदान की हैं। बचपन का संघर्षमय जीवन, प्रकृति के प्रति लगाव, सामाजिक-संस्कृतिक जुड़ाव, शिक्षा-दीक्षा, राजनीतिक जुड़ाव, तथा विद्रोही-स्वाभिमानी स्वभाव आदि ने मिश्र जी की रचना-विधाओं में प्रवृत्ति-मूलक विविधता को प्रभावित किया है। उनकी कविताएं जीवन में देखे गए, जीवन में महसूस किए गए तथा जीवन में लोगों द्वारा सुने गए संदर्भों की प्रतिक्रिया है। युद्ध प्रसाद मिश्र की काव्य-सृजन प्रवृत्तिगत धाराएं समय के साथ बदलती गई। वह काव्य-सृजन के शरुआती फ़ेज में प्रकृति से प्रेरित होकर काव्य को रचे आगे चलकर सामाजिक यथार्थवादी बने और फिर आलोचनात्मक यथार्थवादी धारा की ओर अग्रसर हुएं। मिश्र जी नागार्जुन की भांति जन-जन की आवाज़ को बुलंद करने और जन पक्षता को मजबूत करने के लिए अपनी कलम को तलवार की तरह धारदार बनाया था। ‘भोका र नाङ्गा उठ’ कविता में युद्धप्रसाद मिश्र लिखते हैं-
ए कंकाल दरीद्रता बीच डुबेका जाग भाइ अब
ए लाखौं झुपडी भई उठ लडका देशबासी सब
तोडी दुर्ग दिने महाप्रलयको दुधर्ष आँधी उठ
व्यक्तिवाद समूल नष्ट गरने ब्याधी उपाधी उठ।
खोक्रा पेट अनाज भेट नहुने भोका र नांगा उठ
कोदाला उठ बञ्चरा र हँसिया नाम्ला र डोका उठ
साहूका करकापका कठिनता भोग्नेहरू हो उठ
ताकेका जिमिदारले युवतीका लोग्नेहरू हो उठ।
बाँच्ने साधन अन्नपात लुटिएका ए दिवाला उठ
शोषेका अरुले रगत् र पसिना हड्डी र छाला उठ
हुर्मत छोप्न परेर केवल भिरेक जिर्ण टाला उठ
रित्ता वर्तन जाग जाग चुहने नङ्ला र डाला उठ।
पाशो मस्किन राजनैतिक गई मर्नेहरू हो उठ
आर्थिक संकटले जुनी तल तलै झर्नेहरू हो उठ
गर्नु साग र सिस्नुबाट जिविका पर्नेहरू हो उठ
शत्रुका हितमा शरीर पसिना गर्नेहरू हो उठ।
आर्थिक संकटों में फंसे नेपाल की जनता को मुक्ति दिलाने के लिए अपनी कविता ‘भोका र नाङ्गा उठ’ के माध्यम से जागृत करने का प्रयत्न करते हैं। वह प्रस्तुत काव्य के माध्यम से यह कहना चाहते हैं कि देश की जनता आर्थिक विपन्नता से जब तक मुक्त नहीं हो जाते तब तक उनका जीवन नरकीय बना रहेगा। वह महिलाओं, मजदूरों, किसानों तथा ख़ून-पसीना एक करने वाले हरेक श्रमिक वर्ग की आवाज़ बनते हुए नज़र आते हैं। युद्धप्रसाद मिश्र की कविताएं पारंपरिक शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध जोरदार आवाज़ उठाती है; जो लोगों में मुक्ति की चेतना और क्रांतिकारी जोश भरने का कार्य करती है। वह ‘हुँ म यौटा र्सवहारा’ कविता में कहते हैं-
‘क्रुर यी अस्तिकहरूले रक्त चुसिएको छु सारा
पेट भोको पीठ नाङ्गो हूँ म यौटा सर्वहारा।
झोपडीतक छनै पथको ज्यूँदोछु पक्री किनारा
रातभर चम्किरहन्छन् नेत्रमा नौ लाख तारा।
खून पसिना बेच्दा काहीँ पाउँछु केही सहारा
वर्ग शत्रु जित्न लिन्छु विश्व जनमतको सहारा।
देशमुक्ति गर्न दिन्छु खुनका अनमोल धारा
पेट भोको पीठ नाङ्गो हूँ म यौटा सर्वहारा।’
वामपंथी विचारों को मार्गदर्शक मानकर लिखी गई कविताएं तत्कालीन सामाजिक परिवेश को उजागर करती है तथा उससे मुक्ति दिलाने का आह्वान करती है। युद्धप्रसाद मिश्र की वामपंथी सोच-विचार प्रस्तुत कविता में स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। वह अपने आप को र्सवहारा जनता से जोड़कर जनता की आवाज को मज़बूती के साथ रखते हैं। वह बताते हैं कि पूंजीवादी शक्तियों ने देश की जनता का ख़ून चूसकर उन्हें खोखला कर दिया है। देश की जनता का ख़ून चूसकर उन्हें लाचार-बेबस बना दिया है। कवि हर हालत में इससे मुक्ति दिलाना चाहते हैं और देश को पूंजीवादी शोषण व्यवस्था से आजादी दिलाना चाहते हैं। भले ही इसके लिए देश की जनता को जान की बाज़ी और ख़ून की होली खेलना क्यूँ ना पड़े। देश को शोषणकारी व्यवस्था से आजादी दिलाने की सोच और विचार नागार्जुन की कविताओं में भी देखने को मिलती है। वह भी जनता की आवाज को पुरजोर तरीक़े से उठाते हैं और देश को आगे ले जाने की बात करते हैं। युद्धप्रसाद मिश्र नेपाल राष्ट्र और वहां की जनता को सर्वोपरी स्थान देते थे। वह नेपाल को निरंकुश शासन व्यवस्था से मुक्ति दिलाने का आह्वान करते हैं। युद्धप्रसाद मिश्र ‘बढ्दै जाओ बढ्दै जाओ’ के माध्यम से जनजागृति कर नेपाल की जनता में मुक्ति की चेतना का अलख जगाना चाहते हैं। उनकी विशेष पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं-
‘नयाँ निसाना, नवजागृति, नवचेतनाका साझा हो
हलो, कोदालो, खुकुरी, हँसिया, खुर्पि खुँडाका ताजा हो
पीडित जनले नगरी नहुने घोर क्रान्तिका बाजा हो
दलित गलित हुन बाध्य भएका जनमानसका राजा हो।
तिम्रा जयकार विक्रमतामा देशवासीका लोलुप आँखा
हाम्रा झुपडी झुपडीका तिमी युवक विश्व लडाका
मानवताको श्री लुटिएका जाग्रत जनका प्यारा हो
झलमल दुनियाँ उदित-विदित युग जन्मभूमिका तारा हो।’
वह नेपाल के प्राकृतिक सौन्दर्य, सीधे-सादे मिलनसार लोग और प्यारे से देश को देखा है और भोगा है। राष्ट्र और लोगों के प्रति प्रेम, स्वतंत्रता, लोकतंत्र प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा और मुक्ति की अद्भुत इच्छा ने उन्हें कविता लिखने के लिए अभिप्रेरित किया है। नागार्जुन भारत के राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध अपना मोर्चा खोलते हैं ठीक उसी प्रकार की राह पर चलते हुए युद्धप्रसाद मिश्र भी राजशाही की दमनकारी शासन व्यवस्था के विरुद्ध, सामाजिक असंतोष, गरीबी, वर्गभेद और देश की अविकसित स्थिति पर कड़ा प्रहार करते हैं।
निष्कर्ष : नागार्जुन और युद्धप्रसाद मिश्र में सकल-सूरत, चाल-चलन से लेकर रचना संसार तक काफ़ी समानताएं थीं जिसे प्रस्तुत लेख के माध्यम से जानने-समझने के लिए प्रयास किया गया है, ताकि दोनों देशों के साहित्य और साहित्यकारों का तुलनात्मक अध्ययन व विश्लेषण किया जा सके। नागार्जुन को भारतीय साहित्य में जो दर्जा दिया जाता है ठीक वही दर्जा नेपाली साहित्य में युद्धप्रसाद मिश्र को दिया जाता है। युद्धप्रसाद मिश्र के साहित्य का अध्ययन व विश्लेषण के ज़रिए ही हम नेपाल के साहित्य और तत्कालीन परिथिति को जान सकते हैं और समझ सकते हैं। अपनी बातों को समेटते हुए यह कह सकते हैं कि दोनों देशों के साहित्यकारों का भाषा-साहित्य पठन-पाठन होने से साहित्य और समाज का दायरा बढ़ेगा साथ ही भारत और नेपाल के आपसी सम्बन्ध और ज्यादा मजबूत होंगे। अतः यह कहा जा सकता है कि नागार्जुन और युद्धप्रसाद मिश्र कविताएँ सामाजिक यथार्थ, मानवता, प्रेम की भावना, सामाजिक चेतना, देशभक्ति, वैचारिक स्पष्टता-प्रतिबद्धता, विद्रोह-क्रांतिकारी चेतना तथा शांति-मुक्ति की खोज का प्रतीक बन गयी है।
संदर्भ सूची-
1. https://www.himalini.com/196374/08/19/03/
2. क्षीरसागर डॉ. सुभाष, नागार्जुन के काव्य में जनचेतना, शुभम् पब्लिकेशन, कानपुर, प्रकाशन, संस्करण – 2011, पृष्ठ संख्या -180.






