उन दिनों जबकि हम समाचारों की ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीतिक उठा-पटक, सोशल मीडिया की सनसनी और डिजिटल दुनिया की तमाम बेसिरपैर की रीलों में अपना समय जाया कर रहे थे, तब एक कर्मठ युवा अपने स्वप्न को साकार करने के लिए जी-तोड़ मेहनत में लीन था। उसका स्वप्न भी कोई ऐसा स्वप्न नहीं था जिसमें बड़ी गाड़ी, बड़ा घर या कोई विदेश यात्रा हो! ये तो आम लोगों की इच्छाएँ हुआ करती हैं पर वह तो ख़ास है न! उसे तो इतिहास रचना था । हम धरती से आसमान को ताका करते हैं लेकिन उसे तो आसमान से हमारी पृथ्वी देखनी थी। उसे अंतरिक्ष में पहुँचकर यह भी बताना था कि “दुनिया तो एक ही है,अंतरिक्ष से सीमाएँ नहीं दिखतीं!”
हम सब देशवासियों को गौरवान्वित कर देने वाला यह स्वर्णिम पल मिला, शुभांशु शुक्ला के कारण जो कि 25 जून, 2025 को एक्सिओम मिशन 4 के तहत अंतरिक्ष में गए। यह मिशन फ्लोरिडा स्थित नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हुआ था। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिन बिताने के बाद शुभांशु 15 जुलाई, 2025 को पृथ्वी पर लौट आए। जब अन्य अंतरिक्ष यात्रियों को साथ लिए उनका स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान कैलिफ़ोर्निया तट के पास प्रशांत महासागर में उतरा, तब पूरा देश उनके लिए तालियाँ बजा रहा था। उस समय कुछ चेहरे एक अद्भुत आत्मिक संतोष से भरे थे, कुछ जोड़ी आँखें आँसुओं से भीगी जा रहीं थीं। ये उन माता-पिता की थीं जिन्होंने अपने बेटे के इस स्वप्न को सींचा। ये शुभांशु की पत्नी की थीं जिन्होंने उन्हें यह आश्वस्ति दी कि “परिवार की चिंता न करना! मैं हूँ न!” ये उस ख़ुशी से बरस रहीं थीं जहाँ उनका कोई अपना विश्व पटल पर तिरंगा लहराता है और सकुशल मुस्कुराता अपनी धरती, अपनी मातृभूमि पर लौट आता है। यह परिवार भी मानसिक रूप से शुभांशु के साथ ही अंतरिक्ष में रहा होगा और जब तक वे सुरक्षित न आ गए तब तक इनमें से शायद ही किसी ने चैन की नींद ली होगी। इनका योगदान भी अविस्मरणीय रहेगा।
हम उस समाज के साक्षी हैं जहाँ कोई किसी को सड़क पार करा दे, निर्धन की जरा सी सहायता कर दे, किसी भूखे इंसान को भोजन खिला दे; तो हर स्थान पर अपना प्रचार करता फिरता है कि देखो! कितना बड़ा समाजसेवक हूँ! लेकिन इधर देखिए कितनी सादगी है, इस परिवार में कि कहीं कोई दिखावा, शोर-शराबा या सनसनीखेज वक्तव्य देकर वायरल हो जाने का प्रयास भी नहीं करता। प्रसिद्ध होने की कोई चाहत नहीं और न ही वैसी मानसिकता है। एक सहज मुस्कान है और अपार आत्मीयता से भरे मौन चेहरे। इन सबकी आँखें ही उनके भीतर की प्रसन्नता की गाथा कह जाती हैं और शब्द अपने होने का औचित्य खो बैठते हैं। यह परिवार सिखाता है कि जो प्रत्यक्ष है, उसे चिल्ला-चिल्लाकर कहना नहीं पड़ता। प्रपंच और ढकोसलों में वे ही लोग उलझते हैं जिनमें आत्मविश्वास की कमी है लेकिन दुनिया को अपनी महानता दिखाने से उन्हें चूकना भी नहीं है।
शुभांशु ने यहाँ तक पहुँचने के लिए न जाने कितनी प्रतीक्षा की होगी पर उसके साथ ही वे पूरी लगन से लक्ष्य साधना में भी जुटे रहे। अपनी सफ़लता की चमचमाती कहानी गढ़ने में यही सतत कर्म ही सीढ़ियाँ बनता है। तभी तो इस कर्मयोगी ने प्रारम्भ से ही स्वयं को तैयार रखा, अथक मेहनत की, लड़ाकू विमान उड़ाए। वे गगनयान मिशन के लिए चुने गए और फिर ISRO और रूस में गहन प्रशिक्षण लिया। ऐतिहासिक एक्सिओम मिशन 4 उनकी यात्रा की परिणति थी।
शुभांशु की कहानी सिर्फ़ वैज्ञानिकों की नहीं, बल्कि उन सभी की कहानी है जो किसी विशेषाधिकार में नहीं पले। जिन्होंने अपने सीमित जीवनक्षेत्र और सुख-सुविधाओं से आगे निडर हो स्वप्न देखने का साहस रखा। इस मिशन और इससे जुड़े प्रयोगों के बारे में तो जानकारी सर्वसुलभ है पर हमें सीखना यह है कि शुभांशु जैसा, कैसे बना जा सकता है? अंतरिक्ष यात्री नहीं, इंसान!
हम सबने देखा कि शुभांशु कभी भी, किसी नारेबाज़ी में नहीं उलझे। उन्होंने न ट्रेंडिंग मुद्दों का पीछा किया, न किसी मंच का इस्तेमाल किया। जब देश के हजारों युवा सोशल मीडिया पर निरर्थक बहसों, नेतागण अनर्गल चर्चाओं और तथाकथित बुद्धिजीवी विचारधाराओं की अंतहीन लड़ाई में उलझे थे, तब शुभांशु तैयारी कर रहे थे। कौशल अर्जित कर रहे थे। इस दौरान वे कई बार गिरे होंगे, सम्भले होंगे और फिर सीखा होगा। संघर्ष को आत्मसात कर आगे बढे होंगे। कह सकते हैं कि यह उनकी दृढ़ता की उड़ान है।
उन्होंने बढ़-चढ़कर किस्से नहीं सुनाए बल्कि बड़ी ही सरलता से छात्रों को कह दिया कि यदि मेहनत करने का साहस रखते हो तो अंतरिक्ष, अजनबी नहीं सुलभ है। ऐसी सफलता के बाद इतनी विनम्रता, विरले ही देखने को मिलती है।
उन्होंने राष्ट्रवाद का प्रदर्शन नहीं किया बल्कि उसे जिया। उनकी देशभक्ति प्रदर्शन से कोसों दूर, शांत मन से कर्म में रची-बसी थी। सार यह कि देशभक्ति नारों से नहीं, देश के लिए निःस्वार्थ दिये गए योगदान से महत्वपूर्ण और प्रभावशाली होती है।
शुभांशु यह भी सिखाते हैं कि पहले अपने हुनर में महारत हासिल करें, फिर उस पर बात की जा सकती है। अर्थात महत्वाकांक्षा जब प्रयास में निहित हो, तो वह किसी को अहंकारी नहीं होने देती।
वे उस कठोर अनुशासन के भीतर बसी मृदुलता की ओर भी इंगित करते हैं कि नीले अम्बर को जाने वाली यात्रा उबाऊ न होकर, प्रसन्नता और उत्साह से भरी होती है। बस, काम को सम्पूर्णता और गहराई से किया जाना आवश्यक होता है।







