(स्मृति शेष)
हँसना आसान है, दूसरों पर हँसना और भी आसान। लेकिन अपने ऊपर हँसना, खासकर उस पर जिसे समाज ने “कमज़ोरी” बना दिया हो जैसे कि गहरा साँवला रंग। यह साहस का काम है। यह सिर्फ हास्य नहीं, हास्य के भीतर छुपी हुई आत्म-स्वीकृति और सामाजिक चोट का एक बेहद जटिल मिश्रण है।
सुरेन्द्र दुबे, छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित हास्य-व्यंग्य कवि, हिन्दी कविता मंच के ऐसे हस्ताक्षर थे, जिनकी रचनाएँ सुनते हुए श्रोता पहले हँसते थे और फिर भीतर से थोड़ा-थोड़ा चुप होते जाते थे। उनका व्यंग्य केवल चुटीला नहीं था, वह एक आत्मिक दस्तक भी था, जो रोज़मर्रा के सामाजिक ढोंग, दिखावे, राजनीति और जातिगत–सांस्कृतिक रूढ़ियों पर विनोदपूर्ण प्रहार करता था।
सुरेन्द्र दुबे के व्यंग्य की सबसे प्रभावशाली विशेषता यह थी कि वे अपने आप पर भी उसी पैनेपन से हँसते थे, जैसे समाज पर। उनकी साँवली रंगत पर किए गए स्वयं के कटाक्ष सिर्फ “स्वीकार” नहीं थे, बल्कि वे समाज के सौंदर्य-बोध पर व्यंग्य की मिसाइल थे। “हम तो इतने काले हैं कि डार्क चॉकलेट ने हमें अपने ब्रांड एम्बेसडर का ऑफर दिया।” ऐसे वाक्य न सिर्फ श्रोताओं को गुदगुदाते थे, बल्कि यह भी बताते थे कि कवि हँसी को आत्मबल में बदलने की कला जानता है।
सुरेन्द्र दुबे के व्यंग्य में राजनीति बार-बार आती है, पर वह कभी ज़हरीली नहीं लगती। उनका तंज ऐसा होता था कि नेताओं की चालाकियों पर सीधा वार करते हुए भी, श्रोता को लगता कि यह तो हँसी में छुपी सच्चाई है। वे राजनीति को मंच पर एक करप्ट कॉमिक पात्र बना देते थे, और जनता को उसके भ्रम से बाहर निकालने का कार्य करते थे, बिना नारेबाज़ी के, बिना शोर के।
सुरेन्द्र दुबे जी जब मंच पर मुस्कराते हुए कहते थे, “टाइम नहीं है…”, तो वह सिर्फ एक वाक्य नहीं होता था, बल्कि समय के नाम पर समाज के ढोंग पर सधा हुआ व्यंग्य होता था।
जब वे कहते, “टाइम नहीं है तो जनसंख्या के ये हाल हैं, अगर लोगों के पास वक़्त होता तो क्या होता…”, तो वहाँ श्रोता हँसते ज़रूर थे, पर उनकी हँसी के भीतर कहीं न कहीं सभ्यता के अधूरेपन की झलक साफ़ झलकती थी। यह उस व्यंग्य की पराकाष्ठा थी जहाँ एक पंक्ति में पूरी सामाजिक संरचना की विडंबना समाई होती थी -नैतिकता, नियंत्रण और निरर्थकता। सबकुछ एक ही मुस्कान में ढह जाता था। दुबे जी का “टाइम नहीं है” कहना उस समाज पर आईना था जो हमेशा व्यस्त है पर कभी विवेकशील नहीं। इस जटिलता को मंच पर इतनी सहजता से निभाते थे कि श्रोता हँसते-हँसते कहीं भीतर तक कट जाते थे और फिर कुछ बदल भी जाते थे।
भारतीय समाज में रंग को लेकर गहरे पूर्वाग्रह हैं। गौर रंग को सुंदरता का प्रतीक और साँवले रंग को हीनता का पर्याय बना देना एक मौन सामाजिक भेदभाव है — जिसे हम अक्सर विज्ञापनों, रिश्तों और रोज़मर्रा की बातों में पनपते देखते हैं।
सुरेन्द्र दुबे ने अपने हास्य कवित्व में अपने ही गहरे साँवले रंग को आधार बनाकर जिस तरह से हँसी का मंच रचा, वह दरअसल समाज के रंगवादी रवैये का सबसे तीखा व्यंग्य बन गया। वे जब कहते थे—“हम तो इतने काले हैं कि रात को खुद को आईने में ढूंढना पड़े…” तो लोग हँसते थे, पर वही हँसी धीरे-धीरे एक सच को उजागर करती थी —कि जो रंग वह खुद पर हँस कर स्वीकार रहा है,वही रंग किसी और की आत्महीनता का कारण बन चुका है।
अपने रंग पर हँसना कोई हल्का काम नहीं। यह मानसिक शक्ति, गहरी संवेदना और रचनात्मक विवेक की माँग करता है। क्योंकि जब आप खुद को ही विषय बना देते हैं, तो आपके पास हँसी के सीमित रास्ते होते हैं —लेकिन व्यंग्य के अनगिनत मोड़ होते हैं।
सुरेन्द्र दुबे ने इन्हीं मोड़ों को अपनी कविताओं में इस तरह पिरोया कि वह रंग पर नहीं, समाज पर कटाक्ष बन गई। उनकी हँसी एक सामाजिक दर्पण थी — जिसमें लोग अपने चेहरे के साथ अपने विचारों का रंग भी देख पाते थे। जब कोई कवि अपने साँवलेपन को मंच की रोशनी बना देता है, तो वह केवल हास्य नहीं रचता —वह समाज के सौंदर्य-बोध पर सवाल उठाता है।
सुरेन्द्र दुबे की हँसी कोई साधारण गुदगुदी नहीं थी, वह एक बौद्धिक और सांस्कृतिक चुभन थी, जिसमें कवि खुद को हथियार बना लेता था —ताकि समाज की बनावटी गोरी मुस्कान के पीछे छुपी काली सोच को उजागर कर सके। उनकी कविताएँ हमें यह सिखाती हैं कि हास्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वह सबसे प्रामाणिक प्रतिरोध है — जब कोई अपने ‘कालेपन’ को सत्य की मशाल बना लेता है।
हास्य, जब आत्म-स्वीकृति से उपजता है, तो वह सिर्फ गुदगुदाता नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को झिंझोड़ देता है। छत्तीसगढ़ के प्रख्यात कवि सुरेन्द्र दुबे ने अपने साँवले रंग को हास्य और व्यंग्य का ऐसा माध्यम बनाया कि उनकी हर कविता मंच पर तो हँसी का तूफ़ान लाती थी, पर श्रोता के भीतर चुपचाप एक प्रश्नवाचक चिन्ह भी छोड़ जाती थी।
हमारे समाज में रंग को लेकर जो रूढ़ियाँ हैं, वे सौंदर्य के नाम पर गढ़ी गई सूक्ष्म परंतु विषैली दीवारें हैं। गोरी त्वचा को सुंदरता का मानक मान लिया गया, जबकि साँवले या गहरे रंग को उपेक्षा, हीनता और मज़ाक का पात्र बना दिया गया। कवि सुरेन्द्र दुबे इस सामाजिक सोच को बहुत गहराई से समझते थे। उन्होंने अपने गहरे साँवले रंग को छुपाया नहीं, बल्कि उसे मंच पर इस अंदाज़ में रखा कि वह एक हास्य का विषय होकर भी, विचार का मुद्दा बन गया।
सुरेन्द्र दुबे के कविता-पाठ में सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि वे अपने साँवलेपन पर इस तरह कटाक्ष करते थे कि श्रोता पहले हँसते थे —पर फिर उसी हँसी के बीच कुछ असहज महसूस करने लगते थे। उदाहरण के लिए— “हम इतने काले हैं कि चंद्रग्रहण में हमें चाँद पर छाया समझ लिया गया…” यह पंक्ति सुनते ही माहौल ठहाकों से भर जाता, लेकिन क्षण भर बाद यह हँसी श्रोता के भीतर सवाल छोड़ जाती — कि हमने रंग को कितना बड़ा मुद्दा बना दिया है? और यही था सुरेन्द्र दुबे की रचना का मनुष्यता से जुड़ा हुआ पक्ष।
यह केवल हास्य नहीं था, यह प्रतिरोध था उनकी कविताओं में न तो शिकायत थी, न कोई आत्मदया का भाव —बल्कि एक संवेदनशील स्वाभिमान था, जो खुद को विषय बनाकर सामाजिक सोच की परतें उधेड़ता था। वे जब अपनी त्वचा के रंग को हास्य की भाषा में ढालते थे,
तो वह व्यंग्य गोरी त्वचा के प्रति समाज की गुलामी पर होता था — न कि रंग के प्रति खुद की अस्वीकृति पर। उनकी कविताएँ हमें सिखाती थीं कि व्यंग्य सबसे ईमानदार तब होता है जब वह अपने ही अनुभव से उपजता है, और सबसे शक्तिशाली तब जब वह दूसरों को उनके भेदभाव का आइना दिखा सके।
दुबे जी की भाषा थी — देसी, बेलौस और जनमानस से जुड़ी हुई। उनका व्यंग्य शुद्ध हिन्दी में नहीं, बल्कि हिंदी की आत्मा में होता था — जिसमें स्थानीय मुहावरे, सांस्कृतिक प्रतीक और आमजन की आवाज़ गूंजती थी। सुरेन्द्र दुबे का व्यंग्य हँसी से शुरू होकर चिंतन पर समाप्त होता था। वह हास्य के बहाने विचार देने वाले रचनाकार थे। उनके कटाक्ष में तलवार नहीं, सुई थी — जो चुभती भी थी और सिलती भी थी। वे अपने श्रोताओं को सिर्फ हँसाने नहीं, जगाने आए थे — और वे यह कार्य बड़ी सादगी से कर गए।
सुरेन्द्र दुबे मंच के कवि थे, और मंच पर उनकी उपस्थिति एक कविता नहीं, एक पूरा दृश्य-नाटक होती थी। उनके व्यंग्य में हाव-भाव, विराम, मुस्कान और मौन —सबका उतना ही योगदान होता था जितना उनके शब्दों का। उनका व्यंग्य ‘कहा हुआ’ नहीं होता था, ‘जीया हुआ’ लगता था।
छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य का समृद्ध बनाने वाले, राज्य और हर छत्तीसगढ़िया को विश्वभर में सम्मान दिलाने वाले पद्मश्री (2010), छत्तीसगढ़ रत्न, हास्य रत्न, काका हाथरसी(2008) जैसे कई सारे सम्मान से नवाजे जाने डॉ. सुरेन्द्र दुबे देशभर के लाखों श्रोताओं, प्रशंसकों, साहित्यकारों, कवियों के जेहन में उनके किस्से-कहानी व यादें कविताओं के रूप में हमेशा जिंदा रहेंगी। संयुक्त राज्य अमेरिका में लीडिंग पोएट ऑफ इंडिया सम्मान, और वाशिंगटन में हास्य शिरोमणि सम्मान 2019 से सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं पर देश के तीन विश्वविद्यालयों ने पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया है।
वर्ष 2018 में अपनी मौत की अफवाह पर उन्होंने एक कविता लिखी थी – मेरे दरवाजे पर लोग आ गए / यह कहते हुए की दुबे जी निपट गे भैया / बहुत हंसात रिहीस…. मैं निकला बोला- अरे चुप यह हास्य का कोकड़ा है, ठहाके का परिंदा है/ टेंशन में मत रहना बाबू टाइगर अभी जिंदा है।
उनका व्यंग्य आज के उस दौर में और अधिक प्रासंगिक लगता है जहाँ सत्ताएँ संवेदनशीलता को हास्य में बदल देना चाहती हैं, और कवि — उसे फिर से व्यंग्य में बदलकर प्रश्न बना देता है। सुरेन्द्र दुबे का व्यंग्य, हमारे समय की वह मुस्कान है, जो केवल चुटकुला नहीं —एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप भी है। उनकी कविताओं में शब्द नहीं, लोकजीवन हँसता था। यह गुण ही उन्हें विद्यापति की लय, कबीर की धार और हरिशंकर परसाई की सामाजिक दृष्टि का उत्तराधिकारी बनाता है।
सुरेन्द्र दुबे की साँवली हँसी, वास्तव में एक उजली चेतना की दस्तक थी। उन्होंने हँसते-हँसते हमें हमारी पूर्वाग्रहों की दीवारों से टकराया, और यह दिखाया कि साहित्य, जब हास्य के मार्ग से चलता है, तो वह सबसे गहरे सामाजिक प्रश्नों से टकरा सकता है। उनके शब्दों में हँसी थी, लेकिन उसका प्रतिध्वनि थी- हमारे भीतर छुपे रंगभेद की चुप्पी को तोड़ने की पुकार।
कवि सुरेन्द्र दुबे चले गए, पर उनकी कविताओं में वह हँसी आज भी गूंजती है – जो सिर्फ़ हँसाती नहीं, बल्कि जगाती भी है। सुरेन्द्र दुबे जी जाते-जाते यह सिद्ध कर गए कि श्याम रंग केवल छाया नहीं, एक गहन आभा भी होता है। उन्होंने अपनी हँसी में वह तीखापन रखा जो केवल दुर्लभ रत्नों में होता है- ब्लैक डायमंड की तरह अनमोल और अपराजेय। वे चले गए, पर व्यंग्य की भूमि पर उनका रंग अब भी एक दुर्लभ ध्वनि की तरह प्रतिध्वनित होता है। स्मृति में वे नहीं रहेंगे —बल्कि स्मृति स्वयं उनकी भाषा में ढल जाएगी।






