लाल किले की प्राचीर से जब भी प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो केवल झंडा ही नहीं लहराता, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए भारत की दिशा और दृष्टि भी स्पष्ट होती है। इस 79वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का जोर आत्मनिर्भरता पर था और यह कोई संयोग नहीं है। स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्त होना नहीं, बल्कि अपने भविष्य की बागडोर स्वयं के हाथों में लेना भी है। यदि स्वतंत्रता शरीर है, तो आत्मनिर्भरता उसकी आत्मा है।
भारत एक विकासशील राष्ट्र है जिसकी जनसंख्या विशाल है और संसाधन सीमित। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने हर बार चुनौती को अवसर में बदला है। चाहे 1960 के दशक का खाद्यान्न संकट हो या 1970 के दशक का दूध की कमी, भारत ने हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और नीली क्रांति के ज़रिये आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की। आज भी यदि हम विश्व के सबसे बड़े दूध उत्पादक देश हैं, तो इसका श्रेय इसी आत्मनिर्भरता को जाता है। यदि हम 1965 के अकाल के बावजूद खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुए, तो यह भी इसी दृष्टिकोण का परिणाम है।
लेकिन अब समय बदल चुका है। आज की चुनौतियाँ 1960 या 1970 की नहीं, बल्कि 21वीं सदी की हैं। वैश्विक राजनीति में अस्थिरता, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, महामारी और तकनीकी प्रभुत्व की होड़ ने आत्मनिर्भरता का स्वरूप बदल दिया है। अब प्रश्न यह नहीं है कि भारत खाना उगा सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत अपने रक्षा उपकरण, उर्वरक, चिकित्सा उपकरण और ऊर्जा संसाधन खुद बना सकता है या नहीं।
आज दुनिया ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि साइबर और तकनीकी युद्ध भी उतने ही घातक हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए यह शर्म की बात होगी यदि उसे अपने ही सैनिकों के लिए हथियार, विमान, टैंक और गोला-बारूद आयात करना पड़े। प्रधानमंत्री का यह कहना कि “भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना है”, केवल भाषण नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त है। भारत को रक्षा क्षेत्र में न केवल मेक इन इंडिया को गति देनी होगी, बल्कि इनोवेशन इन इंडिया का मार्ग भी अपनाना होगा।
हरित क्रांति के बाद भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया, लेकिन आज भी हम उर्वरक के लिए विदेशी आयात पर निर्भर हैं। यह एक बड़ी विडंबना है कि अनाज में आत्मनिर्भर देश अपनी मिट्टी को उर्वरक देने में आत्मनिर्भर नहीं। आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी पूरा होगा जब किसान खेत में बोते समय जान सके कि बीज, खाद और सिंचाई की हर ज़रूरत उसके अपने देश से पूरी होगी।
कोविड-19 महामारी ने हमें सिखाया कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता कितनी जरूरी है। जब पूरी दुनिया वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए जूझ रही थी, तब भारत ने अपने वैज्ञानिकों और उद्योगों की बदौलत कोवैक्सिन और कोविशील्ड जैसी वैक्सीन तैयार कर दुनिया को चौंका दिया। यह आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण था। लेकिन यह शुरुआत भर है। भारत को आने वाले समय में कैंसर, हृदय रोग, और दुर्लभ बीमारियों की दवाइयों और उपकरणों में भी आत्मनिर्भर होना होगा।
ऊर्जा क्षेत्र में भी यही चुनौती है। भारत अपनी 80 प्रतिशत से अधिक तेल और गैस की ज़रूरत आयात से पूरी करता है। अक्षय ऊर्जा में प्रगति हुई है, लेकिन सौर पैनल और बैटरी के लिए हम अब भी चीन पर निर्भर हैं। यदि आत्मनिर्भरता की दिशा में सचमुच बदलाव लाना है तो भारत को न केवल उत्पादन, बल्कि सप्लाई चेन, रिसर्च और वितरण प्रणाली तक आत्मनिर्भर होना होगा।
हमें हर बार अंतरराष्ट्रीय बाजार की उठा-पटक के सामने कमजोर बनाती है। आत्मनिर्भर भारत तभी संभव है जब हम नवीकरणीय ऊर्जा—सौर, पवन और जलविद्युत—में न केवल आत्मनिर्भर बनें, बल्कि दुनिया के लिए मॉडल पेश करें। प्रधानमंत्री का “ग्रीन हाइड्रोजन मिशन” इसी दिशा का संकेत है।
आज का युग तकनीक का है। यदि मोबाइल, चिप्स, सॉफ्टवेयर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए आई) के क्षेत्र में भारत पिछड़ा रहा, तो आत्मनिर्भरता का सपना अधूरा रह जाएगा। प्रधानमंत्री ने लाल किले से कहा कि हमें आत्मनिर्भरता के लिए तकनीकी क्रांति चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार की बुनियादी संरचना को मज़बूत किए बिना यह सपना पूरा कर सकते हैं? हमारे विश्वविद्यालय आज भी वैश्विक स्तर पर पीछे हैं, शोध के लिए पर्याप्त निवेश नहीं है, और प्रतिभाएँ विदेश चली जाती हैं। ‘ब्रेन ड्रेन’ को रोककर ही तकनीकी आत्मनिर्भरता संभव होगी।
रक्षा क्षेत्र का उदाहरण लें। भारत ने चंद्रयान और गगनयान जैसी परियोजनाओं में वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई, लेकिन हथियारों के मामले में अब भी विदेशी तकनीक पर आश्रित है। यह विडंबना है कि एक ओर हम “मेक इन इंडिया” का नारा लगाते हैं, दूसरी ओर रक्षा सौदों के लिए विदेश पर झुकते हैं। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल उत्पादन नहीं, बल्कि अनुसंधान और बौद्धिक संपदा पर अधिकार भी है। यदि डिज़ाइन और पेटेंट विदेशी कंपनियों के पास हैं तो ‘मेड इन इंडिया’ का अर्थ केवल असेंबली तक सीमित रह जाएगा। प्रधानमंत्री का बल इस बात पर था कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीकी उत्पादक बने। यह आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा स्तंभ होगा।
प्रधानमंत्री के भाषण में ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ की उपलब्धियों का ज़िक्र हुआ। निश्चित ही इससे युवाओं को अवसर मिले हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या स्टार्टअप्स को सचमुच सरकारी संरक्षण और पूँजी तक आसान पहुँच मिल पा रही है? भारत के अधिकांश स्टार्टअप्स का फंडिंग स्रोत विदेशी निवेशक हैं। ऐसे में आत्मनिर्भरता के नारे का असली अर्थ खो जाता है।
आत्मनिर्भरता का एक सामाजिक पक्ष भी है। यह केवल रक्षा और तकनीक तक सीमित नहीं हो सकती। रोज़गार का संकट, बढ़ती बेरोज़गारी, कृषि में लागत और दाम का असंतुलन, छोटे उद्योगों पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दबाव—ये सब आत्मनिर्भरता के दुश्मन हैं। जब तक हर नागरिक को गरिमा से काम करने का अवसर नहीं मिलेगा, आत्मनिर्भरता अधूरी ही रहेगी।
दरअसल, आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं है, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था में सम्मानजनक और बराबरी की हिस्सेदारी निभाना है। चीन का उदाहरण सामने है जिसने पहले ‘मेड इन चाइना’ से दुनिया भर को सस्ता माल दिया और धीरे-धीरे तकनीकी श्रेष्ठता हासिल कर ली। भारत को भी यही रास्ता अपनाना होगा, लेकिन इसके लिए नीति में निरंतरता, शिक्षा और अनुसंधान में निवेश, और भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन की सख़्त ज़रूरत है।
आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा जब राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी “जनशक्ति” का सही उपयोग हो। लेकिन आज करोड़ों हाथ काम की तलाश में भटक रहे हैं, जबकि सरकार योजनाओं और नारों की गूंज में अपने दायित्व से बचती दिखती है। असली प्रश्न संसाधनों की कमी का नहीं, बल्कि उपलब्ध साधनों को सही दिशा में लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का है।
सच्ची आत्मनिर्भरता की पहली शर्त है – हर हाथ को काम देना। तकनीकी ज्ञान रखने वाले युवाओं को अनुसंधान और उत्पादन में लगाया जाए, और मजदूरों को स्वच्छता व बुनियादी ढांचे में। लेकिन वर्तमान व्यवस्था बेरोजगारों को केवल आंकड़ों तक सीमित कर देती है।
स्थिति को निजीकरण ने और जटिल बना दिया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रेल और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों से सरकार पीछे हट रही है और निजी कंपनियों को बढ़ावा दे रही है। नतीजा यह है कि रोजगार घट रहे हैं, कीमतें बढ़ रही हैं और जनता पर दोहरी मार पड़ रही है। सवाल है—क्या यही आत्मनिर्भरता है या विदेशी व निजी पूंजी पर नई निर्भरता?
जरूरत है कठोर आत्ममंथन की। आत्मनिर्भर भारत सिर्फ उत्पादन बढ़ाने का नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने का संकल्प है। कृषि, ऊर्जा, शिक्षा और कचरा प्रबंधन—हर क्षेत्र में रोजगार की असीम संभावनाएँ हैं, जबकि हमारी युवा शक्ति घरों में निष्क्रिय बैठी है। लेकिन यह तभी संभव है जब सरकार नारों और भाषणों से आगे बढ़कर ठोस नीतियाँ बनाए और उन्हें ईमानदारी से लागू करे। बेरोजगार युवा आंकड़े नहीं, खोई हुई संभावनाओं का प्रतीक हैं। असली कमी संसाधनों की नहीं, बल्कि सही दृष्टि और इच्छाशक्ति की है। जब तक यह कमी दूर नहीं होती, आत्मनिर्भर भारत केवल मंचों पर गूंजने वाला नारा ही रहेगा।आत्मनिर्भरता केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है। यह महज़ “मेड इन इंडिया” की टैगलाइन से बड़ा सवाल है। यह प्रश्न है कि क्या भारत 140 करोड़ लोगों की बुनियादी जरूरतें अपने दम पर पूरी कर सकता है? क्या भारत अपने युवाओं को रोजगार दे सकता है ताकि वे विदेश जाने के बजाय यहीं अपना भविष्य बनाएं? क्या भारत की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो सकती है कि कोई वैश्विक संकट हमें तोड़ न सके?
प्रधानमंत्री ने लाल किले से आत्मनिर्भरता की बात कही है, लेकिन यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। यह जिम्मेदारी किसान की है, जो खेत में बोता है। यह जिम्मेदारी वैज्ञानिक की है, जो लैब में दिन-रात शोध करता है। यह जिम्मेदारी उद्यमी की है, जो जोखिम लेकर नया उद्योग खड़ा करता है। यह जिम्मेदारी उपभोक्ता की भी है, जो “विदेशी ब्रांड” की चमक से पहले अपने देशी उत्पाद का मूल्य समझे।
प्रधानमंत्री के भाषण का संदेश प्रेरक है, लेकिन इसे केवल भावनात्मक अपील बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह सवाल जनता का भी है—क्या हम स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देंगे? क्या हम शिक्षा, स्वास्थ्य और शोध को राजनीतिक भाषणों से निकालकर जमीनी हकीकत बना पाएंगे? आत्मनिर्भरता का अर्थ है नारे नहीं, निरंतरता।
आज़ादी की 79वीं वर्षगाँठ पर यह समझना होगा कि आज़ादी एक इवेंट नहीं, बल्कि निरंतर जिम्मेदारी है। हर स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से भाषण होता है, लेकिन आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा जब सरकार और समाज दोनों इसको अपने रोज़मर्रा के फैसलों में उतारें। केवल लाइक्स और तालियों से इतिहास का मंदिर नहीं बनता—संघर्ष, निवेश और ईमानदार प्रयास ही असली स्मारक खड़े करते हैं।
स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह संकल्प का क्षण है। प्रधानमंत्री का यह संदेश कि “भारत को आत्मनिर्भर बनना है” हमें यह याद दिलाता है कि 1947 में मिली राजनीतिक आज़ादी अधूरी है यदि हम आर्थिक और तकनीकी रूप से दूसरों पर निर्भर रहें।





