निशिंग अरुणाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण जनजाति है। अरुणाचल के लोअर सुबनसीरी, अपर सुबनसीरी, पापुम पारे और ईस्ट कामेंग जिलों में इनका निवास है। ईस्ट कामेंग जिले के निशि को बेंगनी, लोअर सुबनसीरी जिले के निशि को निशांग तथा पापुमपारे जिले के निशि को निश कहा जाता है। पहले इनको ‘दफ़ला’ कहा जाता था, परंतु अब इनको ‘न्यिशी’ के नाम से संबोधित किया जाता है। नि+शिंग के योग से बना ‘निशिंग’ का शाब्दिक अर्थ स्थानीय भाषा में ‘मनुष्य’ होता है। ये लोग आबो तानी के वंशज माने जाते हैं। निशिंग लोग बहादुर और ईमानदार होते हैं। अपनी संस्कृति तथा परंपराओं के प्रति अगाध श्रद्धा रखनेवाले निशिंग लोगों में भाईचारे की प्रबल भावना होती है । इनके पास अपनी संस्कृति, भाषा, धर्म और उन्नत परंपरा है। इनका शरीर सुगठित, रंग गोरा और नाक चपटी होती है। संस्कृति, धर्म और भाषा की दृष्टि से अरुणाचल की आदी एवं हिलमीरी जनजातियों से इनकी समानता है। ऐसा कहा जाता है कि एक समय में निशिंग लोग असम के राजा भगदत्त के सैनिक थे एवं युद्ध में इन लोगों ने अपने अद्भुत साहस और युद्ध कौशल का परिचय दिया था। निशिंग लोगों के मूल निवास और देशांतरगमन के संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है क्योंकि इनके पास कोई साहित्य अथवा कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इनके इतिहास के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए हमें पौराणिक आख्यानों, लोकगीतों और लोककथाओं का सहारा लेना पड़ता है। इनके मूल निवास और देशांतरगमन से संबंधित अनेक आख्यान प्रचलित हैं जिनमें से एक सर्वाधिक प्रचलित आख्यान के अनुसार इनका मूल निवास स्थान ‘सुपुंग’ था जो पूर्वी हिमालय क्षेत्र में किसी स्थान पर स्थित था। बाद में वे लोग ‘नारबा’ नामक स्थान पर आकर रहने लगे। तदनंतर सुबनसीरी नदी को पारकर आगे बढ़ गए।
चावल, मक्का, बाजरा, मांस, मछली एवं जंगली कंद-मूल निशिंग लोगों का मुख्य भोजन है। इस समुदाय के सभी लोग मांसाहारी होते हैं। येलोग मिथुन, सूअर, बकरा, मुर्गी एवं कुछ अन्य जंगली जानवरों के मांस खाते हैं। मांस और मछली हमेशा उपलब्ध नहीं होता है I इसलिए ये लोग मांस-मछली को सुखाकर अथवा भूनकर रख लेते हैं और अभाव के दिनों में उनका उपयोग करते हैं। चावल और मांस इनके प्रमुख आहार हैं। सब्जियों को तेल-मसाले में भूनने का रिवाज नहीं है I उबालकर और उसमें नमक, मिर्च डालकर उनका उपयोग किया जाता है। मदिरा इनका दैनिक पेय है। सभी सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में मदिरा पीना-पिलाना अनिवार्य है। मदिरा के बिना तो किसी उत्सव की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह चावल, मक्के या बाजरे से बनती है। स्थानीय भाषा में इसका नाम ‘अपो’ अथवा ‘अपोंग’ है। वे लोग कुछ जंगली कंद-मूल का भी अपने आहार के रूप में उपयोग करते हैं। जंगली कंद-मूल से ये लोग भली-भांति परिचित होते हैं। बांस की नई कोपलों को भी उबालकर खाया जाता है। निशि परिवार में पिता, उनकी पत्नी या पत्नियाँ और अविवाहित बच्चे एक साथ रहते हैं। इस समाज में बहुपत्नी विवाह सामान्य है। किसी-किसी परिवार में चाचा-चाची और दादा-दादी भी एक साथ रहते हैं। पुत्री विवाह के बाद अपने पति के घर रहने चली जाती है। पुरुष एक से अधिक विवाह कर सकता है। दो-तीन पत्नियाँ रखना इस समाज में सामान्य बात है। पति अपनी सबसे छोटी पत्नी के साथ रहता है, लेकिन बारी-बारी से सभी पत्नियों के साथ सोता है। इस स्थिति के अपवाद भी मिलते हैं। परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है। बच्चे पिता की आज्ञा का पालन करते हैं। निशि समाज पितृप्रधान है। पुत्र पिता के नाम से जाना जाता है। इस समुदाय में पत्नी के अधिकार सीमित हैं। महिलाएं धार्मिक उत्सवों में भाग नहीं ले सकती हैं। सामाजिक कार्यों में भी उनका भाग लेना प्रतिबंधित है। उनका अधिकार मात्र उत्सवों के लिए मदिरा निर्माण तक ही सीमित है। वे राजनैतिक मामलों में न तो भाग ले सकती हैं और न ही अपनी राय दे सकती हैं। महिलाएं अपने घरेलू मामलों में स्वतंत्र होती हैं। इस समाज में ज्येष्ठ पत्नी को कुछ विशेष अधिकार प्राप्त है। वह गृह प्रबंधन में अन्य पत्नियों से अधिक अधिकारों का उपभोग करती है।
मिथुन निशि समाज का सबसे प्रमुख पशु है। इसका उपयोग देवी-देवताओं को बलि देने तथा विवाह के अवसर पर वधू-मूल्य अदा करने के लिए किया जाता है। समुदाय के किसी व्यक्ति द्वारा अपराध करने पर अपराधी को आर्थिक दंड दिया जाता है। जुर्माने के रूप में उससे मिथुन लिया जाता है। मिथुन इस समुदाय का विशिष्ट पशु है। उसके कान पर परिवार का पहचान चिह्न बनाकर आस-पास के जंगलों में छोड़ दिया जाता है। पहचान के आधार पर मिथुन को आसानी से पहचाना जाता है। मिथुन के अतिरिक्त गाय, सुअर, बकरी, मुर्गी आदि भी इस समुदाय के पालतू पशु हैं। विभिन्न त्योहारों के अवसर पर इन पशुओं की भी बलि दी जाती है। सुअरों का उपयोग भी वधू-मूल्य अदा करने के लिए किया जाता है। गाय की भी बलि दी जाती है। गाय से दूध निकालने का रिवाज नहीं है। कुत्ते भी निशि समाज के पालतू पशु हैं। प्राचीनकाल में शिकार निशि जनजाति का मुख्य व्यवसाय एवं आजीविका का साधन था, लेकिन शिक्षा के प्रचार-प्रसार और जीवन निर्वाह के साधनों के विस्तार के कारण आखेट करना इस समुदाय की आजीविका का साधन न होकर एक शौक बन गया। निशिंग समुदाय के लोग कुशल शिकारी होते हैं। तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियारों से ये लोग जंगली जानवरों का शिकार करते हैं। आजकल बंदूकों का भी प्रयोग होने लगा है। ये लोग व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर शिकार करते हैं। शिकार करते समय अनुभवी और शिकार करने में कुशल व्यक्ति उनका नेतृत्व करते हैं एवं युवा लोग उनके निर्देशों का पालन करते हैं। शिकार में पालतू कुत्ते भी उनकी सहायता करते हैं। ये लोग विभिन्न जानवरों की प्रकृति और उसकी आक्रामकता से पूर्ण परिचित होते हैं। मछली पकड़ना निशिंग समुदाय का एक प्रमुख व्यवसाय है। मछलियों को पकड़ने के लिए अनेक विधियों का उपयोग किया जाता है। अरुणाचल में नदियों एवं झीलों की अधिकता है। नदियों में बांध बनाकर मछलियों को पकड़ना सबसे लोकप्रिय विधि है।
निशिंग लोग हस्तशिल्प और खासकर बेंत व बांस के सामान बनाने में अत्यंत दक्ष होते हैं। निशिंग क्षेत्र में बेंत और बांस पर्याप्त मात्र में उपलब्ध है। इसलिए ये लोग अनेक प्रकार के गृहोपयोगी वस्तुओं को बनाने में इस कच्चे माल का उपयोग करते हैं। ये लोग अपने घरेलू उपयोग की सभी सामग्रियों का निर्माण करते हैं जिसकी नयनाभिराम कारीगरी मन को मोह लेती है। बांस-बेंत से निर्मित वस्तुओं में इनके कुशल हाथों का जादू देखते ही बनता है। यह इनकी पैतृक कला है जिसे पुत्र अपने पिता से सीखता है और वह अपने पुत्रों को सिखाता है। इस प्रकार यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। घरेलू वस्तुओं को बनाने के अतिरिक्त बाँस का उपयोग धान्यागार, पुल और घर बनाने के लिए भी किया जाता है। बाँस से जलपात्र, मदिरा रखने के लिए मग, चम्मच और थाली भी बनाई जाती है। निशिंग समाज एक कृषि निर्भर समाज है। अधिकांश लोगों की आजीविका का साधन खेती है। इस समाज में खेती की लोकप्रिय विधि झूम खेती है। जंगलों को काटकर-जलाकर उसमें तीन-चार वर्षों तक खेती की जाती है। उसके बाद उस खेत को छोड़ दिया जाता है। पेड़ों को काटने और जलाने का कार्य सहकारी आधार पर संपन्न होता है। पेड़-पौधों को काटने-जलाने का कार्य प्रायः शरद ऋतु में किया जाता है। खेत साफ हो जाने के बाद उसमें बीज डाले जाते हैं। रसायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया जाता है। यद्यपि झूम कृषि के कारण पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है और भूक्षरण भी होता है तथापि झूम कृषि अधिकांश निशि लोगों के लिए खेती की प्रचलित पद्धति है। कुछ गांवों में निशिंग लोग स्थायी खेती भी करते हैं। स्थायी खेती उस ज़मीन पर की जाती है जो जमीन समतल होती है। पर्वतघाटियों में जहां समतल ज़मीन होती है वहाँ भी स्थायी खेती की जाती है। स्थायी खेतों में सिंचाई भी की जाती है। बीज बोने का कार्य फरवरी से मार्च तक किया जाता है। बीज बोने का कार्य मुख्यतः औरतें करती हैं। खेतों में मुख्य रूप से धान, बाजरा और मक्का बोए जाते हैं। इनके अतिरिक्त आलू, सरसों इत्यादि सब्जियों की भी खेती की जाती है। दाव, कुल्हाड़ी, कुदाल, फावड़ा, खुरपी आदि इनके कृषि औज़ार हैं I अच्छी फसल और समृद्धि के लिए निशिंग लोग अन्नदेवी की पूजा करते हैं एवं सुअर आदि जानवरों की बलि देते हैं। निशिंग लोगों के घर लकड़ी और बाँस के बने होते हैं। जमीन से 5-10 फीट ऊपर लकड़ी या बाँस के खंभों पर बाँस के मचान बिछाकर फर्श बनाया जाता है। उसके ऊपर घर बनता है। घर की लंबाई-चौड़ाई परिवार के सदस्यों की संख्या पर निर्भर करती है। घर प्रायः 50 से 250 फीट लंबा और 16 से 20 फीट चौड़ा होता है। घरों में अलग-अलग कमरे नहीं होते हैं। दो-तीन दरवाजे होते हैं, खिड़की नहीं होती है। घर में कई जगह अंगीठी की व्यवस्था होती है। घरों के छप्पर केले अथवा धान के सूखे पत्तों के बने होते हैं। घर के पीछे थोड़ी दूर पर धान्यागार बनाया जाता है।
निशिंग समुदाय में बहुपत्नी विवाह प्रचलित है। यहाँ तक कि कुछ निशि पुरुष दस से भी अधिक पत्नियाँ रखते हैं। इस समाज में अधिक पत्नियाँ रखना समृद्धि और सम्मान का सूचक है। निशि समाज में चार प्रकार की शादियाँ प्रचलित हैं–1॰बाल विवाह 2.नियोजित विवाह 3.प्रेम विवाह 4.बलात विवाह I निशिंग समुदाय में अधिकतर नियोजित शादियाँ होती हैं जिन्हें निशिंग भाषा में ‘नींग्ने न्यीदा’ कहा जाता है। इस समाज में लड़के के माँ-बाप लड़की के माँ-बाप के सम्मुख शादी का प्रस्ताव रखते हैं। यदि लड़की के माता-पिता शादी की स्वीकृति दे देते हैं तब लड़की का परामर्श लिया जाता है। उसकी स्वीकृति के उपरांत शादी की तैयारी आरंभ होती है। मुर्गी के यकृत का परीक्षण कर यह पता लगाया जाता है कि दोनों का दांपत्य जीवन कैसा बीतेगा। इस परीक्षण से पता चलता है कि दोन्यी-पोलो शादी के पक्ष में हैं अथवा नहीं। प्रेम विवाह भी इस समाज में प्रचलित है। लड़का-लड़की के बीच प्रेम संबंध स्थापित होने पर लड़का अपने पिता को प्रेम के संबंध में अवगत कराता है। वह अपने पिता से वधू-मूल्य अदा करने का अनुरोध करता है। शादी का प्रस्ताव वर पक्ष तथा वधू पक्ष दोनों को मंजूर होता है तो वधू-मूल्य निर्धारण किया जाता है। अस्वीकृति की स्थिति में लड़का-लड़की को लेकर भाग जाता है। अंततः दोनों पक्षों को राजी होना पड़ता है एवं वधू-मूल्य अदा करने के बाद शादी की रस्म पूरी होती है। पहले निशिंग समाज में बाल विवाह अधिक होते थे, लेकिन शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण बाल विवाह में कमी आयी है। कभी-कभी तो बच्चों के जन्म के पूर्व ही उनकी शादी तय कर दी जाती है। ऐसा विश्वास है कि बच्चों की शादी करना माँ-बाप का कर्तव्य है। यदि वे अपने बच्चों की शादी अपने जीवनकाल में संपन्न नहीं कर देते हैं तो मरने के बाद उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। सभी प्रकार की शादियों में वर पक्ष द्वारा वधू-मूल्य अदा करना अनिवार्य है। वधू-मूल्य का निर्धारण लड़की के पिता की हैसियत के अनुसार किया जाता है। धनी लोगों के पास वधू-मूल्य देने की आर्थिक क्षमता होती है। इसलिए वे लोग अधिक पत्नियाँ रखते हैं। जिनके पास वधू-मूल्य अदा करने का सामर्थ्य नहीं होता उनके लिए एक पत्नी लाना भी कठिन हो जाता है। अरुणाचल की अन्य जनजातियों की ही भांति निशि समुदाय में भी गोत्र के भीतर विवाह करना प्रतिबंधित है। बुआ की लड़की से शादी करना भी वर्जित है। मातृ-पक्ष की किसी लड़की से वैवाहिक संबंध स्थापित करना सामाजिक रूप से मान्य है। माँ की बहन अथवा माँ की भतीजी भी जीवन साथी बन सकती है। इस समाज में विधवा को पुनर्विवाह का अधिकार है। तलाक के संबंध में इस समाज का कोई पारिभाषित नियम नहीं है, परंतु पति-पत्नी में तलाक होता है। यदि पति अपनी पत्नी से असंतुष्ट हो अथवा पत्नी का किसी अन्य पुरुष से संबंध हो तो पति अपनी पत्नी को घर से निकाल सकता है या उसे अलग रहने के लिए कह सकता है। तलाक़शुदा पत्नी का पति की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता है।
अरुणाचली समाज की आजीविका का मुख्य आधार कृषि है। इसलिए इस प्रदेश के अधिकांश पर्व-त्योहार कृषि से संबंधित हैं। यहाँ के निवासी अपने सुख-वैभव और समृद्धि की आकांक्षा से असंख्य देवी-देवताओं की आराधना करते हैं। निशि समाज का सबसे प्रमुख त्योहार न्योकुम युल्लो है। यह एक कृषि पर्व है। फरवरी माह में इसका आयोजन किया जाता है। इस पर्व का संबंध निशि समुदाय के आदि पुरुष आबो तानी से है। आबो तानी इस समुदाय के सर्वाधिक पूज्य मिथक पुरुष हैं। ऐसा माना जाता है कि आबो तानी ने लोक कल्याण के लिए असीम दुख सहे थे। उन्होंने परोपकार में ही अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था। वे दिव्य शक्तियों से मंडित ऐसे महापुरुष थे जिनके लिए कोई कार्य असंभव नहीं था। उन्होंने एक बार भीषण बाढ़ में लोगो की रक्षा की थी। न्योकुम से जुड़ी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। ‘न्योकुम’ दो शब्दों के योग से बना है–नयो+कुम अथवा उम। ‘न्यो’ का अर्थ है ‘पृथ्वी के सभी देवी-देवता’ और ‘कुम’ अथवा ‘उम’ का अर्थ है ‘माँ पृथ्वी के आँचल में सिमटे सभी मानव।‘ इस प्रकार न्योकुम का बहुत व्यापक और उदात्त अर्थ होता है। इससे पृथ्वी के सभी देवी-देवताओं का बोध होता है। यह एक कृषि पर्व है। बीज बोने के समय इस त्योहार का आयोजन किया जाता है। इस त्योहार का कृषि के साथ गहरा संबंध है। इसमें न्योकुम देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी प्रार्थना की जाती है I आगामी वर्ष में अनाज का अधिक उत्पादन हो, अकाल का प्रकोप नहीं हो, बाढ़ से फसलों का विनाश नहीं हो और कीड़े एवं जानवर फसलों और पौधों को नष्ट नहीं करें। निशिंग समाज का यह सर्वाधिक लोकप्रिय त्योहार है। लोग वर्ष भर इसका बेसब्री से इंतजार करते हैं। इस पर्व के पहले लोग अपने घरों और धान्यागारों का पुनर्निर्माण करते हैं और उन्हें सजाते हैं। पर्व के लिए चावल, मांस और अपो (मदिरा) तैयार किया जाता है और इससे अतिथियों का स्वागत किया जाता है। घर धन-धान्य से परिपूर्ण रहे इसके लिए देवी से प्रार्थना की जाती है। यह त्योहार दो से चार दिनों तक चलता है। पूजा के लिए एक प्रधान वेदी और उसके आसपास कई अन्य वेदियाँ बनाई जाती हैं। इन वेदियों को गाँव के मध्य में अथवा किसी मैदान में विधिपूर्वक स्थापित किया जाता है। ये वेदियाँ विभिन्न देवी-देवताओं का प्रतीक होती हैं। पुजारी अपने सहायक पुजारियों के साथ देवता की स्तुति कर पूजा का शुभारंभ करते हैं। सभी ग्रामवासी अपने पारंपरिक परिधान धारण कर पूजा स्थल पर आते हैं। स्त्री, पुरुष, युवक, युवती सभी देवी को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना करते हैं। सुख-समृद्धि, फसलों की रक्षा तथा पशुओं और मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए सामूहिक रूप से प्रार्थना की जाती है। आसपास का वातावरण नृत्य और गीतों से झूम उठता है। अपो (मदिरा) पीने-पिलाने का दौर शुरू होता है। त्योहार के अंतिम चरण में आसपास के गाँवों के लोग अपने-अपने गाँवों में पूजा करने के उपरांत एकत्रित होकर जुलूस निकालते हैं। मुख्य बलिपशु मुख्य वेदी पर बंधा रहता है। सभी लोग वेदियों और बलिपशुओं पर चावल का आटा छींटते हैं। अंत में पुजारी का संकेत पाने के बाद पशुओं की बलि देने का कार्य आरंभ होता है। बलि कर्म इस पर्व का मुख्य आकर्षण होता है। पहले मुख्य पशु की बलि दी जाती है, उसके बाद अन्य पशुओं की बलि दी जाती है। इसका मांस सभी लोगों में वितरित किया जाता है। ‘न्यीब’ (पुजारी) के मंत्रोच्चारण के साथ त्योहार का समापन होता है। निशिंग के सबसे बड़े पर्व का नाम ‘सिरोम मोलो सोचम’ है। यह त्योहार प्रत्येक वर्ष प्रायः दिसंबर में मनाया जाता है। इस पर्व के पहले सभी आवासों और धान्यागारों का पुनर्निर्माण किया जाता है तथा धान, मक्का, बाजरा आदि सभी अनाजों को सुखाकर धान्यागारों में रख दिया जाता है। लोग अपने-अपने खेतों से धान को साफ कर टोकरी में रखकर गीत गुनगुनाते हुए घर आते हैं। पर्व के लिए गृहणियाँ चावल, मांस, अपो तैयार करती हैं और इन पदार्थों से अपने अतिथियों का स्वागत करती हैं। आगामी वर्ष में और अधिक उत्पादन और अच्छी फसल के लिए ये लोग अतिथियों से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह त्योहार भी कृषि से संबंधित है। लोग अन्न देवी की स्तुति कर अपनी समृद्धि एवं अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करते हैं। इनका विश्वास है कि इनकी पूजा को स्वीकार करने के लिए ही अन्न देवी धरती पर आती है। सभी लोग नाच-गाकर अपना उल्लास प्रकट करते हैं।
संदर्भ:
1.सुबनसिरी जिला गजेटियर (1981)–संपादक श्री एस.दत्ता, अरुणाचल प्रदेश सरकार
2.श्री वीरेन्द्र परमार-अरुणाचल प्रदेश के आदिवासी और उनका लोक साहित्य (2009)-राधा पब्लिकेशन, नई दिल्ली
3.श्री बी.के.शुक्ला-द दफलाज ऑफ़ द सुबनसिरी रिजन
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