( मनहरण कवित्त छन्द )
छैल छबीला छौरा
परिवर्तन प्रकृति का कहा नियम नित्य,
मूलभूत मूल्यों में बदलाव नहीं होता।
माहौल मानवीय मूल्यों का कलित दीजिए,
संस्कारहीन सुत दीन दिन-रैन रोता।
अथाह अमीरी आई अक्ल आज तक नहीं,
अमीरी अन्धी अली आदमी है होश खोता।
छैल छह फेरे खाके कहे करूँगा न ब्याह,
“मारुत” मानव सच्चे संस्कार काहे खोता।।
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काले-काले कमरे
घूरती घरघराती घुटन घायल करे,
कुण्ठा कलेजे को कलुषित कर जाती है।
गुस्ताख़ गुर्राती गहरी गरज गरज के,
घातक घबराहट घनी घिर आती है।
“मारुत” मारती मुझे मनचली मतवाली,
देती उलाहना उद्वेग ऊब उकताती है।
कमरे क्यों कहो-कहो कैदख़ाना कातिलाना,
उबाती उन्मुनी उदासी उतर आती है।।
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काका
चाचाजी को काका कहते करौली जिले जन,
काका की छत्रच्छाया छुप जीवन जिया है।
प्यारे पिता पधारे परलोक बचपन में,
पितृ-काका का काका पवित्र प्यार दिया है।
प्यारा प्राणों-सा रखा अपनापन अत्यधिक,
मायूसी में सहला सिर सहारा दिया है।
“मारुत” मन कहता कल्पतरु काकाजी को,
सर्वस्व सुख विधाता वरदान दिया है।।
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परिणाम पता कर लीजिए
तुनकना तजो बात-बात पर प्यारे प्राणी,
क्रोध क्षणिक पागलपन प्रिय होता है।
तपाता तुमको लाल लोहे सम संसार में,
कोप कारण पुत्र पिता-प्रसू को खोता है।
कोह कराता हत्या हमजोली हमराही की,
परिणाम पाओ कुत्सित करुण होता है।
“मारुत” मनुष्यता महीन धागा धरती पे,
जोड़ो जन-जन को क्रोधी कल क्यों खोता है।।






